Showing posts with label बांग्ला classic से अनूदित. Show all posts
Showing posts with label बांग्ला classic से अनूदित. Show all posts

Sunday, 19 March 2017

अनाधिकार प्रवेश :रबिन्द्रनाथ टैगोर

मूल कहानी : अनाधिकार प्रवेश
लेखक : रबिन्द्रनाथ टैगोर
बाँग्ला भाषा से अनुदित



किसी एक सुबह सड़क के पास खड़े हो कर एक लड़का एक दूसरे लड़के के साथ एक अतिसाहसिक कार्य से सम्बंधित शर्त रख रहा था। ठाकुरबाड़ी के पुष्पवाटिका से फूल तोड़ सकेगा या नहीं, यही उनके तर्क का विषय था। एक लड़का बोला, ‘सकेगा’ और दूसरा लड़का बोला ‘कभी नहीं सकेगा’।
ये काम सुनने में तो बहुत आसान है लेकिन करना उतना सहज नहीं, ऐसा क्यों है ये समझाने के लिए थोड़ा और विस्तार से बताना आवशयक है।
स्वर्गवासी माधवचन्द्र तर्कवाचस्पति की विधवा पत्नी जयकाली देवी राधानाथ जी के मन्दिर की उत्तराधिकारिणी हैं। अध्यापक महाशय को तर्कवाचस्पति उपाधि मिली ज़रूर थी लेकिन वो कभी अपनी पत्नी के सामने ये सिद्ध नहीं कर पाये थे। कुछ पंडितों का कहना था कि उनकी उपाधि सार्थक हुई थी क्योंकि सारे तर्क और वाक्य सबकुछ उनकी पत्नी के हिस्से ही आये थे और वो पतिरूप मे इसका फलभोग कर रहे थे।
सत्य तो यह था कि जयकाली ज़्यादा बात नहीं करती थी लेकिन बहुधा सिर्फ दो बातों में, कभी-कभी तो नीरव रह कर भी बड़ी-बड़ी बात करनेवालों की बोलती बन्द कर देती थी।
जयकाली दीर्घाकार, बलिष्ठ देहयष्टि, तीक्ष्णनासिकायुक्त प्रखरबुद्धि महिला थी। उनके पति के जीवित रहते ही उन्हें प्राप्त देवोत्तर संपत्ति उनके हाथ से निकली जा रही थी। किन्तु विधवा जयकाली ने अपनी समस्त बक़ाया संपत्ति वसूल कर उसकी सीमा-सरहद भी तय कर दी, जो उसका प्राप्य है कोई भी उसमें से एक रत्ती भी उसे वंचित नहीं कर सकता था।
इस महिला में बहुमात्रा में पौरुष होने के कारण उसका कोई संगी-साथी नहीं था। दूसरी स्त्रियां उससे भय खाती थीं। परनिंदा, छोटी बात या फिर बात-बात पर रोना-धोना उसके लिए असहनीय था। इतना ही नहीं पुरुष भी उससे भय ही खाते थे; क्योंकि ग्रामवासी चण्डीमण्डप में बैठ कर आलस्य से भरे गपबाजी में जो दिन बिताते थे उसे वो नीरव घृणापूर्ण कटाक्ष द्वारा धिक्कारती थी जो उनके स्थूल जड़त्व को भी भेद कर उनके ह्रदय में छेद कर देती थी।
प्रबल रूप में घृणा करना और उसी रूप में उसे प्रकट करने की असाधारण क्षमता थी उस प्रौढ़ा विधवा में। उनके विचारदृष्टि में यदि कोई अपराधी ठहरता तो उसे बातों से बिना बातों के भी भाव-भंगिमा से ही दग्ध कर देती थी।
गाँव के सारे कार्यक्रमों, आपदा-विपदा में उपस्थिति रहती। हर जगह वो अपने लिए एक गौरवपूर्ण सर्वोच्च स्थान बिना चेष्टा के ही प्राप्त कर लेती थी। जहां भी उनकी उपस्थिति रहेगी सबके बीच उन्हें ही प्रधान-पद मिलेगा इस विषय में न उनको और न ही दूसरों को कोई संदेह रहता।

रोगी सेवा में सिद्धहस्त थी लेकिन रोगी उनसे यमराज की भांति डरता। रोगमुक्त होने के लिए नियमपालन में लेशमात्र भी उल्लंघन जयकाली देवी की क्रोधाग्नि रोगी के बुखार से भी अधिक तप्त कर देती थी। दीर्घाकार ये महिला गाँव के मस्तक पर विधाता के कठोर नियमदंड की तरह सदैव उपस्थित रहती; कोई उनकी अवहेलना नहीं कर सकता था और न ही उनसे प्रेम करता था। गाँव के प्रत्येक व्यक्ति से उनका योगसूत्र था लेकिन फिर भी उनके जैसी एकाकी महिला और कोई नहीं थी।

जयकाली देवी निसंतान थी। मातृ-पितृहीन अपने भाई की दो संतानों को लालन-पालन के लिए अपने घर ले आई। घर में कोई पुरुष अभिभावक न होने के कारण उन दोनों पर कड़ा अनुशासन नहीं था और स्नेहान्ध बुआ के प्रेम से दोनों बिगड़ते जा रहे हैं ऐसी बात कोई नहीं कह सकता था। उन दोनों में से बड़े की उम्र अठारह वर्ष थी। कभी-कभी उसके विवाह के प्रस्ताव भी आने लगे थे और परिणयसूत्र में बंधने के प्रति उस किशोर का मन भी कदाचित उदासीन नहीं था लेकिन उसकी बुआ ने इस सुखवासना को एक दिन के लिए भी प्रश्रय नहीं दिया। अन्य महिलाओं की भांति किशोर नवदम्पत्ति के नवप्रेमोदगम दृश्य उनकी कल्पना में बहुत उपभोग्य, मनोरम जैसा कुछ नहीं था। और उनका भतीजा विवाह कर दूसरे पुरुषों की तरह दिनभर घर में पड़े रह कर पत्नी के प्रेम आह्लाद में खा-पी कर मोटा होता रहे- ये सम्भावना उनके सम्मुख असंभव प्रतीत होती थी। वो बहुत कड़े शब्दों में कहतीं- पुलिन पहले उपार्जन करना शुरू करे, उसके बाद ही बहू घर आएगी। बुआ के इतने कठोर वाक्य सुन आगंतुकों का हृदय फट जाता।
ठाकुरबाड़ी (मन्दिर) जयकाली देवी के लिए सर्वप्रमुख और यत्नशील धन था। भगवान के शयन, स्नान-आहार में तिलमात्र की त्रुटि भी असहनीय थी। पुजारी ब्राह्मण भी अपने दो देवताओं की अपेक्षा इस मानवी से सबसे ज़्यादा भय खाते थे। पहले, एक समय था जब स्वंय देवता के नाम से निकला हिस्सा भी उन्हें पूरा नहीं मिलता था। कारण; पुजारी ब्राह्मण की एक और पूजक-मूर्ति गोपनीय मन्दिर में थी; उसका नाम निस्तारिणी था।छुपा कर घी-दूध, छेना, मैदा, नैवेद्य स्वर्ग और नर्क में बराबर बाँट दिया करता था।लेकिन आजकल जयकाली के सामने देवता को उनके हिस्से का सोलह आना पूरा ही भोग चढ़ा दिया जाता है, उपदेवता को जीविका के लिए अब अन्यत्र उपाय देखना पड़ रहा है।
जयकाली की सेवा और यत्न से मन्दिर प्रांगण साफ-सुथरा झकझक करता है– कहीं एक तिनका भी पड़ा नहीं रहता। प्रांगण के पार्श्व में माधवी लता उग आयी है। उसके यदि एक भी सूखा पत्ता गिरे तो जयकाली तुरन्त उसे उठा कर बाहर फेंक देती है। मन्दिर की परिपाटी, शुद्धता और पवित्रता में लेशमात्र भी व्यवधान होने पर जयकाली देवी उसे सहन नहीं कर पाती थी। पहले गाँव के लड़के छुपा-छुपी खेलते हुए इसी प्रांगण में आश्रय लेते थे लेकिन अब ये सुयोग सम्भव नहीं। पर्व-उत्सव के अतिरिक्त मन्दिर प्रांगण में ऊधम मचाने की अनुमति किसी को नहीं। कभी-कभी बकरी शावक भी घुस आते थे पौधे लता-पत्ता खा कर अपनी भूख मिटाने के लिए, लेकिन अब यहां पाँव धरने पर दंड प्रहार खा कर मीमियाते हुए भागना पड़ता है।
अनाचारी व्यक्ति चाहे वो परम आत्मीय सम्बन्धी ही क्यों न हो उसका मन्दिर प्रांगण में प्रवेश नहीं हो सकता था। जयकाली की एक भगिनी का पति, जो खान-पान में धर्मच्युत, मांस लोलुप था आत्मीयतापूर्वक भेंट करने आया, किंतु जयकाली के त्वरित प्रवेश-विरोध प्रदर्शन पर सगी बहन से सम्बन्ध विच्छेद हो गया। इस मन्दिर से सम्बंधित अनावश्यक अतिरिक्त सतर्कता सामान्य व्यक्तियों के बीच पागलपन ही माना जाता था।
जयकाली बाकि हर जगह कठोर, दृढ और स्वतन्त्र थी, मात्र इस मन्दिर में वो सम्पूर्ण आत्मसमर्पित थी। इस मूर्ति के सामने जयकाली जननी, पत्नी, दासी—इनके सामने वो सतर्क, सुकोमल, सुंदर और नम्र थी। एकमात्र इस मन्दिर प्रस्तर और अंदर विराजे देवता के सामने ही जयकाली का निगूढ़ नारीस्वभाव चरितार्थ होता था, यही उसका स्वामी, पुत्र और समस्त संसार बन गया था।
इतना जानने के बाद पाठक अब समझ सकते हैं कि मन्दिरप्रांगण से फूल तोड़ कर दिखाने की प्रतिज्ञा करनेवाले लड़के के साहस की सचमुच कोई सीमा नहीं थी। वो जयकाली का छोटा भतीजा नलिन था। वो अपनी बुआ को बहुत अच्छी तरह जानता है फिर भी उसकी दुर्दांत प्रकृति, बुआ के अनुशासन के वश में नहीं आयी। जहाँ भी विपदा हो उसका आकर्षण भी वहीं होता, और जहाँ अनुशासन वहीं उसका मन उसे लंघित करने को चंचल हो उठता। जनश्रुति है, नलिन की बुआ भी अपने बाल्यकाल में उसी के स्वाभाव की अभिरूप थी।
जयकाली उस समय मातृ स्नेहमिश्रित भक्ति भाव सहित देवता की ओर दृष्टि टिकाये दालान में बैठ कर माला जाप कर रही थी।
लड़का दबे पाँव चुपचाप पीछे से आ कर माधवी लता के निचे खड़ा हो गया। देखा, निचली शाखाओं के फूल देवता को चढाने के लिए तोड़ लिए गए हैं, तब बहुत ही धीरे धीरे सावधानी से मंच पर चढ़ गया। ऊँची डाल पर छोटी-छोटी कलियाँ लगी हुई थीं, उन्हें ही तोड़ने के लिए उसने अपने शरीर और बाहों को ऊपर उठाना शुरू ही किया था की जीर्ण मंच मचमच की आवाज़ के साथ टूट कर टुकड़े हो गया। मंच से झूलती लताएँ और नलिन दोनो ही एक साथ भूमिसात हो गए।
जयकाली दौड़ कर आयी और अपने भतीजे के काण्ड की दर्शक बनी। ज़ोर से उसकी बाँह पकड़ उसे ज़मीन से उठाया। नलिन को काफी चोट आयी थी लेकिन उन चोटों को पर्याप्त सजा नहीं कहा जा सकता क्योंकि वो अज्ञात ही मिल जाता है ऐसा जयकाली देवी का विचार था, इसलिए उस चोटिल लड़के पर बुआ की कठोर मुष्टि का प्रहार भी पड़ने लगा। लड़के की आँख से एक बून्द आंसू नहीं टपका तब उसे खींचते हुए एक कमरे में ला कर बन्द कर दिया गया इतना ही नहीं आज शाम का नाश्ता भी न देने का आदेश हो गया।
खाना बन्द होने का आदेश सुन दासी लीलामति छलछलाती आँखों के साथ बच्चे को क्षमा कर देने का अनुरोध करने लगी किन्तु जयकाली का मन नहीं पसीजा। उस घर में ऐसा कोई दुःसाहसी नहीं था जो ब्राह्मणी के आदेश की अवमानना कर उस भूखे बच्चे को कुछ भी छुपा कर खिला सके।
जयकाली नया मंच बनाने का आदेश दे पुनः माला जाप करने दालान में आ कर बैठ गयी। कुछ देर बाद लीलामति पुनः उपस्थित हुई, बोली लड़का भूख से रो रहा है उसे कुछ खाने के लिए दे दूँ?
अविचलित एक शब्द में उत्तर मिला, नहीं! लीलामति चुपचाप लौट गयी। पास ही एक कमरे में बन्द नलिन के रोने का करुण स्वर धीरे-धीरे क्रोध गर्जना में परिवर्तित होने लगा—अंत में बहुत देर बाद उसका कातर रुद्ध कंठस्वर माला जपती हुई बुआ के कान तक पहुंचा।
नलिन का रुदन जब परिश्रांत और मौनप्राय हो आया ठीक तभी एक दूसरे प्राणी की डरी हुई कातर ध्वनि सुनाई पड़ने लगी और उसके साथ ही एकसाथ दौड़ते हुए चीत्कार करते कुछ लोगों की कलरव ध्वनि मन्दिर के सम्मुख उपस्थित हुई।
सहसा मन्दिर प्रांगण में पदध्वनि हुई। जयकाली पीछे मुड़ कर देखी, भूमि तक माधवी लता हिल रही है।
मृदु स्वर में जयकाली आवाज़ दी, ‘नलिन!’
कोई उत्तर नहीं मिला। समझी, किसी प्रकार बन्दीगृह से पलायन कर फिर से उन्हें तंग करने यहां पहुँच गया है।
अपनी मुस्कान होंठों को दबा कर छुपाते हुए प्रांगण में उत्तर आयी।
लताकुंज के पास जा कर पुनः आवाज़ लगायी, ‘नलिन!’
कोई उत्तर नहीं मिला। एक शाखा हटा कर जयकाली ने देखा, एक शूकर प्राणभय से आक्रांत हो घने लताकुंज में आश्रय ले कर छुपा है।
जो लताकुंज इष्टदेवता के वृन्दावन का प्रतिरूप, जिसकी खिली हुई कलियों की सुगन्ध गोपियों के श्वास सुरभि की याद दिलाती है और कालिंदी तट के सुखविहार, सौंदर्यस्वप्न को जागृत करती है--- जयकाली के प्राणों से भी अधिक यत्न से पवित्र बनाये रखे इस नंदनभूमि पर अकस्मात ऐसी वीभत्स घटना घट गयी!
पुजारी लाठी हाथ में ले दौड़ा आया।
जयकाली तुरंत ही अग्रसर हो उसे रोक दी और द्रुतगति से मंदिर का मुख्यद्वार अंदर से बन्द कर दी।
सुरापान से उन्मत डोम दल मन्दिर द्वार पर आकर चिल्लाने लगे उन्हें उनका बलि-पशु वापस चाहिए!
जयकाली बन्द द्वार के पीछे से ही चिल्ला कर बोली, ‘जाओ, यहाँ से भाग जाओ! मेरा मंदिर अपवित्र मत करो!
डोम दल वापस लौट गया। जयकाली ब्राह्मणी अपने राधानाथ जी के मन्दिर में एक अशुचि प्राणी को आश्रय देगी, ये प्रत्यक्ष देख कर भी किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
इस सामान्य सी एक घटना ने अखिल जगत के महादेवता को भले ही परम प्रसन्न किया होगा किन्तु समाज नामधारी अतिक्षुद्र देवता बहुत क्षुब्ध हो गए।

Tuesday, 7 March 2017

मौलिक अधिकार और भिखारी दुसाद, (बांग्ला) लेखिका : महाश्वेता देवी

मूल कहानी : मौल अधिकार ओ भिखारी दुसाद  (बांग्ला)
लेखिका : महाश्वेता देवी
रचनावली :  महाश्वेता देवीर छोटो गोल्पो संकलन


ये स्थान है नवागढ़ के सीमान्त और बस-पथ के ऊपर. नवागढ़ एक छोटा-मोटा स्टेट या एक बड़ी ज़मींदारी थी. वहाँ के जमींदार को ‘राजा’ का ख़िताब मिला था और उस जमींदार की उम्र स्वाधीनता वर्ष में थी मात्र एक साल, फिर भी वो राजा साहेब ही पुकारे जाते थे. रजवाड़ी खत्म होने के बाद भी राजा साहेब सम्बलहीन नहीं हुए थे, राज्य हस्तांतरण के दौरान बहुप्रचलित नियम के अंतर्गत बीस-पचीस देवी-देवताओं के नाम से खास ज़मीन अलग की गयी थी जो उन्ही के अधीन हुई. फिर भी राजा साहेब पर चरम अन्याय घटित हो ही गया, राज्य सरकार एक पाप कर बैठी. बस और रेल पथ योजना के तहत राज्य और केंद्र सरकार ने वो ख़ास ज़मीन अधिग्रहण कर ली.

राजा साहेब की किशोरावस्था में ये घटना होती है, तब राजमाता और उनका काबिल वकील इस दुःख से विह्वल हो कर रांची, पटना के वकीलों से परामर्श करते हैं साथ ही राजा साहेब की गुज़र-बसर की व्यवस्था के प्रयास में आबादी-जंगल-कटाई-ठेकेदारी और टिम्बर कारखाना, लॉरी-ट्रांसपोर्ट व्यवसाय की नींव रखी जाती है फिर शुरू होती है अन्याय के विरुद्ध कानूनी लड़ाई.

लगता है, राजा साहेब का छह सालों से चल रहा विरोध रंग लाया है, आज नवागढ़ में धूम मची है, प्राथमिक विद्यालय, राजमाता ट्रांसपोर्ट की छुट्टी है. राजा साहेब के आवास “सुर निवास” से नाना मिष्ठान की थालियाँ रंगीन कागज़ से ढ़क कर टेहरी कचहरी, मंदिर आदि जगहों पर सौगात भेजी जा रही है.
बहुत दिनों बाद आज नवागढ़ के लोग स्वच्छंद अनुभव कर रहे हैं राजा साहेब ने घोषणा की है ख़ुशी मनाओ, धूम मचाओ घर-घर दीप जलाओ –- अपने अपने खर्चे पर. खुशी का वैसा रूप न होने पर भी आज लोग हल्का महसूस कर रहे है.


पिछले आठ सालों से राजा के आदमियों और बटाईदारों के बीच भीषण तनातनी दिखायी देती आयी है. पहले राजा के आदमी उन्हें पिटते हैं फिर पुलिस आती है जो बटाईदार, नेता-अगवाई करने वाला लगता, उसे पुलिस उठा कर ले जाती लेकिन पिछले दस महीनों से कुछ बदल सा गया है, पहले यहाँ पुलिस पहरे पर नहीं बिठायी जाती थी, अब पुलिस बैठ गयी है.

ऐसा ही होता आ रहा है, होता ही रहता है. नवागढ़ की मिट्टी जितनी पुरानी है ये घटनाएं भी उतनी ही पुरानी हैं. इस बीच बटाईदारों की संख्या भी बढ़ी है और खेत-बट्टा अधिकार विषय में उनकी चेतना भी बढ़ी है. उनकी इस चेतना के पीछे किसी तीसरी शक्ति का ही हाथ है ये पुलिस का संदेह है... “तीसरी शक्ति है बाकि कोई एक दल-संगठन नहीं.... कौनो कमनिस, कौनो आदिबासी स्वार्थ संरक्षक, कौनो उग्रपंथ, जौनो रहे साला सबे इ गरीब किसानों का ही मदद देत है.”
इसी में सब गड़बड़ लगता है, तीन महीने पहले बटाईदारों ने जो लड़ाई की उसमे वो लोग एक कपड़े पर लिखे थे – “मेहनत की फसल के आधा बट्टा पर, हमलोगों का मौलिक अधिकार है”
उस कपड़े को दोनों छोर से बाँध उसे हाथ में ले कर जुलूस में घूम रहे थे.
लिखी हुई बातें बहुत ही आपत्तिजनक थीं. बटाईदार, ये बटाईदार किसान राजा साहेब से कहेंगे श्रमोत्पादित फसल पर उनका न्यायिक अधिकार है? ये तो ठीक नहीं, और उनमें से लिखना कौन जानता है? किसने लिखा ये सब?
राजा साहब खुद को घोर वंचना का शिकार मान रहे. अन्याय! अन्याय हुआ है उनके साथ. वो शोषित, अत्याचारित हैं. सरकार ने उनकी ज़मीन ले कर बस और रेल पथ बना दिया जिसकी वजह से ही आज उनकी राजमाता ट्रांसपोर्ट की लॉरी से उसी रास्ते पर लकड़ी-कोयला,अनाज- उनके कुली ढ़ो रहे है. रेलगाड़ी वैगन से उनके कारखाने में चिरी हुई लकड़ियाँ जाती है , ये कितनी ओछी बात है. अभी इस अन्याय का प्रतिकार हुआ ही था कि अब इन बटाईदारों ने सरकारी श्रम-विभाग के नियमानुसार फसल में हिस्सा चाहिए का नारा लगाना शुरू कर दिया!

इस बार बटाईदारों ने राजा साहेब के आदमियों को फसल उठाने नहीं दिया, कहा ... मारो सालों को! और मारते-मारते मथुरा सिंह को जख्मी कर दिया तब चन्दनमल के हाथों से बन्दूक छिन कर खुद राजा साहेब को गोली चलानी पड़ी और उनके दल के बहुत से लोग मारे गये.

ये तो होता है, होता ही रहता है. नवागढ़ की मिट्टी जितनी पुरानी ,उतनी ही पुरानी ये घटनाएँ भी है.
यहाँ बच्चों को सुलाते हुए दादी परीकथा की तरह ये कहानी सुनाती है.... उसके बाद आये राजा साहेब, बोले... का बुधिया, इ का खचड़ाई है रे? तोहार दादा बोले, का खचड़ाई, फसल दिया करो और अपना हत्यारा सिपाही लोगन को जाने बोलो. उसके बाद राजा साहेब की गोली चली. मार दिए तोहार दादा के, फट गईल कलेजा और खून निकला ऐसे जैसे भादो म गंगा जी में पानी.

यही होता है, होता ही रहा है. ज़मीन के धनी मालिक और खेत मजदूर किसानों की कहानी में ऐसा ही होता है. कोई इस कहानी को बदल नहीं सकता.

लेकिन इस बार कहानी में थोड़ा फर्क था. मारते- मारते, मार खाते-खाते भी स्लोगन दे रहे थे;
“मेहनत की फसल पर
आधा बट्टा पर
हमलोगों का
मौलिक अधिकार है...”
ऐसी घटना नवागढ़ की माटी के जीवनकाल में कभी नहीं घटी थी, फलस्वरूप पुलिस बैठा दी गयी. दुखिया की लाश चालान हो गयी, जख्मी लोग अस्पताल में भर्ती कर दिये गए. शांतिभंग और क़ानून उल्लंघन का केस बटाईदारों के नाम हो गया. अचानक ही एक और नया काण्ड घट गया; बटाईदार यूनियन ने भी अदालत में केस लड़ने की अर्जी दाखिल कर दी.
इन सब कारणों से नवागढ़ तीन महीने तक पुलिस पहरा के दबाव में रहा. इसी बीच राजा साहेब को उनके ऊपर हुए अन्याय का प्रतिकार मिला, घुटन भरी हवा मानो कुछ हल्की हुई. क्या हुआ इस केस में अब चारों ओर यही चर्चा है.

इन सबके बीच भिखारी दुसाध हो कर भी नहीं है , कोई उसे नहीं पूछ रहा. पूछने जैसा कुछ है भी नहीं अत्यंत ही भीरु और निरीह है. घूम-घूम कर बकरी चराना ही उसका काम है. ये मवेशी ही उसके जीने का एकमात्र सहारा हैं. इनकी देखभाल और खाना भी अत्यंत साधारण है. बकरियां हर तरह के पत्ते और घास खा लेती हैं. साल में एकाधिक बार और एकाधिक बच्चे भी पैदा करती हैं. कोई और होता तो इन्ही मवेशियों से अपनी किस्मत संवार लेता लेकिन भिखारी दुसाध की किस्मत! उसकी बकरी परिवार की परिकल्पना – दो बकरी एक बकरा, नहीं तो एक बकरी दो बकरा—इससे ज्यादा बढ़ती ही नहीं.
क्या करे! भिखारी की किस्मत —-- जंगल में चराने जाये तो सियार, लकड़बग्घा ले जाये. बाज़ार में बेचने जाये तो कोई सही दाम ही न दे. भिखारी लोगों के बीच से ऐसे चला जाता है मानों अपने अवांछित अस्तित्व पर वो खुद ही लज्जित हो.

कभी-कभी भिखारी को अपने मवेशी उठा कर भागते हुए जंगल की तरफ जाते भी देखा जाता है. चेहरे पर डर की गहरी छाप. आतंक से उसकी जीभ सूख जाती है, होठों के कोने में झाग जम जाता है. पहले-पहल लोग उसकी हालत देख अवाक् रह जाते थे.
का हुआ रे, भिखारी?
पुलिस आई - पुलिस
तो इससे तुझे का?
बकरा उठा ले जायेगा उ लोग.
पुलिस के डर से भागा-भागा फिरता है. मवेशी के दुश्मनों के बीच ही जंगल में लकड़ी काट झोपड़ा तैयार कर के उन्हें अंदर रख खुद उसके मुहाने पर बैठा डर से काँपता रहता.
सम्पत्ति के नाम पर और तो कुछ भी नहीं है उसके पास, न घर न ज़मीन-जायदाद न बीवी-बच्चे बस यही जो कुछ बकरी है. पहनने को एक टुकड़ा धोती और दिन भर मवेशी के पीछे भागना यही उसका काम. ये भी कुछ बुरा नहीं इसमें भी वो सपने देखता है --- अगर उसके पास दस-पंद्रह बकरियां हो जाये तो वो उन्हें सुमाडी हाट में बेच आएगा बहुत अच्छे दाम पर सिर्फ एक गाभिन बकरी रख लेगा. उसके बाद एक बड़ी धोती और एक गमछा साथ में एक कंघी खरीदेगा. दुसाध टोला में खोज कर एक अच्छी विधवा, बड़ी उम्र की औरत से शादी भी करेगा दोनों मिल कर मवेशी पालेंगे तब उनकी संख्या और बढ़ेगी. फिर उसका भी एक जमीन और घर होगा.

लेकिन भिखारी का ये सपना कभी पूरा नहीं होता. बाड़ा गाँव में दुसाध लोग अच्छे ही थे, पता नहीं क्या हुआ बाड़ा के गणेशी सिंह के साथ, उन्होंने उसे मार डाला. पुलिस वहाँ बैठा दी गयी, वो लोग भिखारी और दूसरे दुसाधों के बकरा-बकरी उठा कर ले जाने लगे.
भिखारी कितना रोया गिड़गिड़ाया लेकिन पुलिस कुछ नहीं समझती. अंत में राका दुसाध ने कहा अपनी गाभिन बकरी को ले कर दूर भाग जा, नाडा गाँव में कोई गड़बड़ नहीं है वहाँ मैदान में चराना और बरगद के नीचे रहना.
भिखारी बरगद के नीचे झोपड़ी बना कर रहने लगा. नाडा के मालिक राजपूत हैं, सब हट्टे –कट्टे मांस खाने वाले लेकिन वो लोग कभी भिखारी से छिन कर नहीं खाते जब भी बकरा चाहिए पैसे दे कर खरीदते है. आठ रुपया दस रुपया .... लेकिन सबका किस्मत में सुख कहाँ!
फिर एक दिन वहाँ का राजपूत होली के दिन गाना गाने आई एक औरत को गोली मार दिया. बस! पुलिस आ कर बैठ गयी. पुलिस आते ही राजपूत लोग बोला भिखारी के पास से एक बकरा ले आओ. तीन दिन तीन बकरा देने के बाद भिखारी वहाँ से भाग गया.

सबके लिए ये दुनिया बहुत बड़ी न भी हो लेकिन भिखारी के लिए बहुत ही छोटी हो गयी थी. नाडा के बाद डांगा गाँव रहने चला आया. डांगा के शिव मंदिर के पुजारी हनुमान मिश्र को प्रणाम कर आया था.
क्या रूप-रंग!! मानो देह से रौशनी फूट रही हो. हाँ तो ऐसा देखने में कैसे न होई? देउता दूध पीते हैं, दूध में स्नान करते है, रोजे महादेव से बात करते है.

भिखारी वहाँ के जंगल में दुसाध टोली में बहुत खुश था सभी उसको अपना लिए थे, कहते थे यहीं रुक जाओ, शादी भी करा देंगे लेकिन ....
देउता के पास एक दिन दरोगा आया. सात दिन वहीं रह गया, भिखारी के देउता बोले, भिखारी दुसाध! दरोगा को बकरा खाने दो.
ये तो बचने जा रहा था देउता.
क्या? पुलिस दरोगा देव-देवता के स्थान के बाद ही होता है, उसे खिलाने में पैसे की बात करेगा?

बकरा भेंट चढ़ा कर डांगा गाँव भी छोड़ दिया भिखारी दुसाध.
डांगा गाँव के दुसाध लोग दुखी हो रहे थे लेकिन क्या करे भिखारी? उसका तो खेत मजदूरी का काम नहीं है. ये बकरी ही उसकी आजीविका है. पालना, बेचना, फिर पालना और फिर बेचना. पर पुलिस उसकी एक मात्र आजीविका का साधन बार-बार नष्ट कर देती है.
यहाँ के लोग, भिखारी गरीब है इसलिए कभी उसे छोटा नही समझे अपना साथी माना, अपने साथ खिलाया-पिलाया.

सब छोड़ कर अंत में आना पड़ा नवागढ़. यहाँ के प्राइमरी स्कूल मास्टर सुखचाँदजी बहुत अच्छे आदमी है. स्कूल के पास वाले बरगद के पास बैठ कर भिखारी से बहुत बातें करते है. उनकी उमर भी कम है, गाँव की रीती-निति नहीं समझते इसलिए कहते है, रात में तो बड़ा-बुढ़ा को पढना सिखाते हैं तुम उसी में चले आना.

का किया जाये महाराज़? भिखारी को आप पढना सिखायेंगे बस!! भागो भिखारी नवागढ़ से. राजा साहेब भगाएगा, पुलिस चला आयेगा, लाला जी सौदा नहीं बेचेगा, कुआँ से पानी नहीं मिलेगा.
सुखचाँद बोले कैसे?
कैसे नहीं? एक टौर्च देख कर हम पूछल रही, उकर दाम केतना हो, ए लालाजी? त लाला, कितना गुस्सा हो गईल. कहत रहीं, का भिखारी! दुसाध हो कर तू, छोटा काम करनेवाला, अभी का टोर्च जलाएगा?
नवागढ़ में भिखारी का एक नया घर बना है, राजा साहेब के वकील कबाड़ हुए बस, लॉरी लोहा लक्कड़ के दाम बेच देते हैं. जब तक न बेचे तब तक वही घर है और उसके पडोसी हैं कुछ भिखमंगे. वहीं पर बड़े-बड़े घास भी उग आये हैं जो भिखारी की बकरियों के लिए पर्याप्त है.
 जंगल में बैठ कर यही सब सोचता रहता है, सोचता और सोचता ही रहता है. पुलिस लालाजी की दूकान नहीं लुटता, ग्वाला की गाय नहीं छीनता. जिसके पास जो है उसे रहने देता है फिर उसकी बकरियां क्यों छिन लेते हैं! इसके अलावा तो उसके पास और कुछ भी नहीं है.

अपने मवेशियों को जंगल के उस झोपड़ी में राम जी से प्रार्थना कर उनके हवाले रख कर कांपते ह्रदय से नवागढ़ अपने नये डेरा में पहुँच जाता है. ऐसे समय में लंगड़ा, कानी और कुष्ठरोगी लड़का सब उसकी बहुत मदद करते है, उसे बता देते हैं पुलिस यहाँ है तो भाग जाओ.
राम जी जब कृपा करते हैं तब उसके मवेशी सही सलामत मिलते हैं, जब राम जी उसकी अर्जी भूल जाते हैं तब कभी लकड़बग्घा ले जाता है तो कभी सांप काट लेता है. कभी-कभी तीन-तीन महीने नवागढ़ में पुलिस रह जाती है तब भिखारी रोज़ ही जंगल और नवागढ़ आना-जाना करता है.

इस बार तीन महीने तक पुलिस यहाँ रह गयी, भिखारी तो जंगलवासी ही हो गया था, एक दिन जंगल के किनारे-किनारे चलते हुए पहुँच गया बाड़ा गाँव की ओर. वहाँ जंगल में उसे बांका दुसाध मिला, उसने भिखारी की बहुत मदद की. तीन-चार और दुसाध लड़कों के साथ जंगल में घुस कर एक बहुत मजबूत झोपड़ा बना दिया और भिखारी से बोला यहीं रह जाओ, यहाँ उस नाले से पानी भी मिल जायेगा.
खाऊंगा क्या?
पैसे दो, खरीद लाता हूँ.
ये लो.
कुछ दिन बाद बांका बोला, कितने दिन रहना हो क्या पता! उस बकरे को बेच दो।
कहाँ?
हाट में.
भिखारी बोला, लेकिन मैं कभी वहां गया नही.
विश्वास कर सको तो मुझे दो.
बकरा बेच कर बांका उसके हाथ में साठ रूपये पकड़ा दिया। इतने रूपये देख भिखारी खुद को राजा समझने लगा. इन्ही तीन महीनों के बीच उसकी बकरी एक और बच्चा देती है. भिखारी उसे भी बेच कर अपनी खुराकी के इंतज़ाम का पैसा बांका के हाथ देता है.
बांका बोलता है अभी तो पुलिस नहीं है, बीच-बीच में टोली में आ कर सबसे मिल जाया करो.
बाडा टोली में ही एक दिन कनू दुसाध बोला नवागढ़ से पुलिस चौकी उठ रही है.
सुन कर भिखारी सोचा अभी ही चले जाना अच्छा है. बकरी परिवार अभी कुल आठ है—दो बकरी, दो बकरा, बछड़ा चार.
बांका बोला, चले जाने दो, उसके बाद तुम जाना.
पुलिस चली गयी, चौकी उठ गयी। भिखारी भी नवागढ़ के लिए रवाना हो गया. बहुत खुश था अपने बस वाले डेरा में लौटते हुए, उसे देख कर उसके भिखमंगे पड़ोसी भी खूब खुश हुए.
कानी उसकी जगह पर झाड़ू मार कर साफ कर देती है. एक आँख से सब देखने के बाद बोली, देख ले भिखारी सब है न?
हाँ,हाँ! सब है. घास की बनी चट्टी, गली-टूटी बोतल, टिन का पीपा.
खबर है भिखारी!
क्या?
दोरा भाग गया.
कहाँ?
सुमादि। वहां हाट में बैठने पर ज़्यादा पैसा मिलेगा और लँगड़ा क्या किया मालूम? डालि को भगा कर एक दूसरी लड़की लाया है।
और तू?
मुझे कौन लेगा बोल? एक आँख से दिखता नहीं, दोनों आँखे अंधी होतीं तो पैसा मिलता और इतनी बूढ़ी भी नही हुई अभी.
इसलिए इंसान की तरह मेहनत कर के नहीं खा सकती?
कम मेहनत करती हूँ? भीख मांगने तोहरी तक पैदल चल के जाती हूँ, कम मेहनत है क्या?
बाप रे! कितना सारा बकरा-बकरी रे भिखारी!
हाँ कल ही जा कर हाट में बेच आऊंगा.
नवागढ़ की और ... खबर है रे भिखारी!
क्या?
राजा साहेब को क्या तो मिला है सरकार की तरफ से. खूब हुल्लड़ और खुशहाली मना रहा सब. आज रात में पटाखा भी फोड़ेगा.
तुमलोगों का तो मज़ा हो गया.
नहीं, नहीं! ये लोग झूठे पत्तल पर कुछ नहीं छोड़ेंगे कि हमलोग कुछ खा सकें. खाने मिला था तोहरी के बैजनाथ लाल की माँ जब मरी थी. इतना-इतना पूड़ी कचौड़ी.
अरे कहाँ जा रहा भिखारी?
एकबार सुखचांद जी से मिल आएं.
सुखचांद जी भिखारी दुसाध जात और बकरी चराता है इसलिए घृणा नहीं करते. नवागढ़ में आने के बाद से किसी ने भी भिखारी से नही पूछा, भिखारी! कहाँ था इतने दिन? वो जो यहां रहता भी है ये भी कभी किसी की नज़रों में नही आया.

का किया जाये महाराज? ये तो होता ही है, होते ही रहता है. बकरे का मांस और दूध वो भी बहुत सस्ते दाम पर चाहिए तब भिखारी की ज़रूरत होती है. लेकिन इसका मतलब उसे किसी गिनती में रखा जाये ... नहीं, ऐसा क्या कभी होता है! ये कहानी बहुत पुरानी, नवागढ़ के माटी से भी पुरानी.

सुखचाँद जी का स्कूल आज बन्द है. सुखचांद बरगद के नीचे बैठ कर ग्वाल मोतिहार और भकत को बहुत मन से कुछ समझा रहे हैं. नवागढ़ के ग्वालों के पास बहुत धन है. सुखचांद की उम्र कम है समझाने बताने का उत्साह बहुत ज़्यादा.

आओ, आओ भिखारी, कब आये?
आज भोरे सुखचांद जी.
रामजी जैसे रखे। आप ठीक है न?
हाँ भिखारी। बैठो-बैठो.
भिखारी थोड़ा हँस कर, उन सब से दूर जा हाथ जोड़ कर बैठ गया. ग्वालों के पैर में नगड़ा, कान में पीतल की रिंग, हाथ में लाठी, सर पर पगड़ी, उन्हें देखने से ही डर लगता है भिखारी को.

मोतिहार भिखारी के आगमन से बेपरवाह बोला, ना, ना सुखचांद जी, फिर से बताइये.
शुरू से?
हाँ हाँ!
बताया तो....
फिर भी समझ नहीं आया. राजा साहेब की ख़ास ज़मीन पर से रेल लाइन बिछाई गयी, बस के लिए सड़क बनी, ये तो होता ही है। क्या भकत! सरकार क्या आसमान पर लाइन खींच रेल और बस के लिए रास्ता बनाएगी, ऐसा कहीं होता है?
हाँ मोतिहार, एकदम ठीक!
तो फिर राजा साहेब इसके लिए मामला क्यों किये? यही बात समझ नहीं आ रही.
सुखचांद बोला,क्यों नहीं करेगा? देखो, वो ज़मीन किसकी थी? राजा साहेब की थी?
हाँ, तो! अरे कितनी, कितनी सारी जमीन है उनकी.
उस जमीन पर राजा साहेब का हक़ था?
हाँ
अपनी संपत्ति पर जो हक़ है, इसके नाम से भारतीय संविधान में एक मौलिक अधिकार है. मौलिक अधिकार सात प्रकार के हैं और भारतीय संविधान का कर्तव्य है प्रत्येक नागरिक की मौलिक अधिकार की रक्षा करना.
का ताज्जुब? “मौलिक अधिकार” कोनो बुरा बात न है जी? ठीक बात है?
कैसे हो ई बुरा बात, ई ख्याल आपका दिमाग में कैसे आई मोतिहार जी?
मोतिहार बोला, तब बटाईदार लोग चिल्ला रहा था”मौलिक अधिकार” ,उसी से ही न पुलिस आयी?
नहीं, नहीं वो तो कानून-सुशासन का बात आ गया था न इसलिए पुलिस आयी.
मौलिक अधिकार कैसा होता है?
सुखचांद खूब खुश हुआ क्योंकि उसे अपनी विद्या बुद्धी ज़ाहिर करने का मौका मिला. उँगलियों पर गिनते हुए बोलना शुरू किया. पहला हुआ, समानता का अधिकार. जिसमें जात-पात, धर्म कोई कारण नहीं देखा जायेगा सब समान है. इन कारणों से किसी पर अन्याय नही हो सकता.
ये बात लिखा है?
एकदम!
मोतिहार अपने ज्ञात सत्य के ज़ोर पर बोला, ये ज़रूर किसी अँगरेज़ का लिखा होगा. जात-पात धर्म का फरक नही रहेगा? हम और भिखारी दुसाध एक बराबर?
एकदम। संविधान में लिखा है.
फिर भी ये झूठ है, ये तो आँखों के सामने ही दिख रहा है हमेशा ही. जात के कारण ही कोई ऊँचा जात वाला भिखारी को अपने घर में आने नहीं देगा, उसका छुआ पानी नहीं पियेगा. ये ज़रूर किसी दुश्मन का बनाया हुआ बात है. क्यों सुखचांद जी? जवाहरजी प्रधानमंत्री थे, फिर इंदिराजी, हमलोग तो कभी ये बात नहीं सुने और कभी आँख से भी नहीं देखे कि दुसाध और बड़ा जातवाला को कोई बराबर मान दे रहा है.

सुखचांद कभी मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर नहीं मारता. अपनी साध्य सामर्थ्य मुताबिक सरल तरीके से स्वाधीनता और मौलिक अधिकार क्या-क्या है, समझाने की कोशिश करता है.
इस बार भकत बोला, सब झूठ बात!
क्यों?
जो जैसा चाहे काम-काज कर सकता है क्या ये स्वाधीनता है?
बिलकुल है.
मुसलमान जो खाता है, उसका व्यवसाय कोई करने देगा क्या नवागढ़ में?
सुखचांद हँसा, फिर बोला, बाकि सब मौलिक अधिकार भी सुन लीजिये.
मैं तो रोज शाम को प्रौढ़ शिक्षा क्लास लेता हूँ. आपलोग भी आइये और दूसरों को भी लाइए. पढ़ना सीखेंगे तो आपलोग खुद ही पढ़ लेंगे.
ऐसा भी होता है क्या? अब इस उमर में?
लिखने-पढ़ने की भी कोई उम्र होती है भला?
अच्छा! और क्या कहें... आगे सुनिए.
खूब ध्यान से मोतिहार और भकत सुनते हैं। भिखारी एकबार भी मुंह नहीं खोलता. सुनता रहता है मौलिक अधिकारों के बारे में और सुखचांद की ओर बहुत आदर से देखता है.
अब मोतिहार बोला, हाँ वो आखरी बात, जिसकी जो संपत्ति है चाहे वो कुछ भी क्यों न हो उससे कोई छिन नहीं सकता--- हाँ ये बहुत अच्छा लिखा है.
इसीलिए तो राजा साहेब को छः लाख रूपये मिले.
छः लाख!
छः लाख की बात भिखारी के मन में कोई भाव नहीं जगा पायी क्योंकि छः लाख के विषय में उसकी कोई धारणा ही नहीं ये कितना होता है. मोतिहार और भकत लेकिन हैरान हो जाते हैं इतने रूपये सुनकर.

सुखचांद एक प्राइमरी स्कूल शिक्षक है रूपये के अंक ले कर उसे भी कोई सरदर्द नहीं, वो बस मौलिक अधिकार समझाना चाहता है.
यही बात तो कह रहा हूँ. राजासाहेब का था उनकी जमीन पर मौलिक अधिकार, सरकार बिना इजाजत लाइन बिछा दी रास्ता काट दी। तब राजा साहेब के मौलिक अधिकार पर ही चोट हुआ.
हाँ-हाँ फिर....
राजा साहेब वयस्क हो कर केस किये रेल विभाग पर और केस जीत गए.
अच्छा! संपत्ति पर मौलिक अधिकार के लिए तो जमीन होना चाहिए है न?
अरे नहीं, भकत जी! देखिये, आपकी सम्पति घर, गाय-भैंस, बर्तन, सामान-असबाब सबकुछ है. मोतिहारजी का भी वही. मेरी संपत्ति ये कपड़ा-लत्ता, खटिया, किताब आदि और भिखारी का संपत्ति उसके बकरा-बकरी। चल- अचल सबकुछ संपत्ति में ही आता है कोई इसे छीने तो इसके लिए उसे क्षतिपूर्ति देनी होगी.
समझा.. बड़ा अच्छा लगा ई सब जान कर.
फिर आईयेगा.
विदा लेते वक़्त मोतिहार बोला, अब शादी कर लीजिये. आपकी जात की एक लड़की गाँव में ही है और खेत, भैंसा, हल, सायकल सब देगा.
ना-ना...
चलते हैं सुखचांद जी.
वो लोग चले गए. इधर भिखारी एक नया विषय जान कर उसके आघात से घायल है.
सुखचांद जी... जो बात अभी आप बोले वो सब सच है। उ मौला अधिकार?
मौलिक अधिकार, भिखारी!
और उ बटाईदार लोग का नारा... उ लोग भी तो यही बोल रहा था।
हाँ भिखारी.
राजासाहेब की जमीन उनकी संपत्ति फिर मेरा बकरा-बकरी मेरा संपत्ति?
बिलकुल!
राजासाहेब की जमीन सरकार ले ली तो बदले में कितना तो रुपया दी , मेरा बकरा सब पुलिस बार-बार उठा के ले जाती है जिसका डर से हम जंगल भाग जाते हैं .... उसका पैसा तो हमको कोई नहीं देता! तो सरकार क्या पुलिस को ये मौलिक अधिकार की बात बताना भूल गयी है?
वो तो जुल्म करते है, भिखारी.
तब राजासाहेब को जो इतना रुपया मिला सुखचांदजी, सिर्फ बड़ा आदमी को ही मिलता है क्या?
दर्दभरी हँसी हँस कर सुखचांद बोले, व्यावहारिक रूप से शायद ऐसा ही होता है, लेकिन संविधान में अच्छी बातें ही लिखी गयी है.
हम का जाने सुखचांद जी का लिखा है.
राजा साहेब को जो मिला उसके लिए उन्हें मुकदमा करना पड़ा. संविधान में ये भी लिखा है मौलिक अधिकार नष्ट होने पर, करनेवाले के नाम तुम मुकदमा कर सकते हो.
मैं? मैं कैसे मुकदमा कर सकता हूँ. इस बारे में तो कुछ नही जानता और पुलिस अगर बकरा उठा ले गयी तो उनके ऊपर कोई दुसाध मुकदमा कर भी नहीं सकता.
सुखचांद बोला, कर सकता है, ये हक़ है.
कैसे? पैसे कहाँ? हिम्मत कहाँ किसी दुसाध की? उस हक़ को मैं नही समझता सुखचांद जी. उससे कुछ काम नहीं होता.
ये भी सच कहा! अब और क्या कहूँ तुमसे......
सुखचांद को विभ्रांत देख भिखारी थोड़ा हँस कर दिलासा देने के भाव से कहता है.. और का कहियेगा आप? धरती पर जो चलता आया है वो ही चलता रहेगा। है कि नही!
ऐसा नहीं भिखारी. जो लिखा है वही ठीक है. वो सब काम में नहीं लाया जाता क्योंकि गलत हमारे बीच ही है। ये तो हमारा ही काम है न?

सुखचांद खुद भी कभी भिखारी का छुआ नहीं खाता, ऐसा सोच भी नहीं सकता. लेकिन उसकी अपनी धारणा है कि वो जात-पात, छुआछुत नहीं मानता क्योंकि ये सब किताब में लिखा है, लिखी हुई बातों पर अटूट विश्वास है उसे और इसी ज़ोर पर वो कहता है कि ये सब मानना गँवारपना है न तो जवाहर जी विश्वास करते थे और न ही इन्दिरा जी मानती थी.

फिर भी तो छुआछुत है और रहेगा ही। देखिए न, ये तो भगवान की सृष्टि है. रामजी किसी को ब्राह्मण बनाये तो किसी को दुसाध, इसी से तो छुआछुत भी चलता है. मैं तो कुछ भी नहीं जानता लेकिन तोहरी मन्दिर के ब्राह्मण हनुमान मिश्र तो अच्छे आदमी हैं, है न? वो तो कभी दुसाध के परछाई पर भी पाँव नहीं रखते क्योंकि उनकी बातचीत तो महादेव विश्वनाथ से होती है, वो तो भगवान के मन की बात जानते हैं.
सुखचांद लाचार हो कर बहस यहीं छोड़ देता है और बोला, और बताओ भिखारी, कैसे थे इतने दिन?
भिखारी उल्लसित हो कर जवाब दिया, बहुत अच्छा था, इतना अच्छा रहने की बात तो कभी सोचा भी नहीं था. और सबसे अच्छा ये हुआ कि बकरा-बकरी कुल दस हो गए.
दस! क्या बोल रहे हो?
दो बकरा जवान है। पन्द्रह-सोलह सेर मांस तो होगा ही। हाट में आठ रुपया सेर बेच देंगे। दो सौ रूपये तो हो ही जायेंगे.
वाह भिखारी तब तो तुम्हारे पास अच्छे पैसे हो जायेंगे।
भिखारी बोला, आशीर्वाद कीजिये... इतने पैसे मिल गए तो मेरे सब दुःख दूर हो जायेंगे.
कैसे?
कैसे नहीं, देखिये इतने पैसे हो गए तो ब्याह करेंगे दोनों मिल कर बकरी पालेंगे. और कमाई होगा तब घर दुआर, बर्तन बासन भी होगा। घर-संसार में जैसा होता है.
तुम्हारा घर कहाँ है?
बिजुपाड़ा पार कर के....
तुम्हारा कोई नहीं है क्या?
नहीं
सुखचांद को भिखारी से बहुत अपनापन लगता है. वो बोला, तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो भिखारी.
चलता हूँ सुखचांदजी
भिखारी घर की ओर चल पड़ा आज जाने क्यों उसका मन बहुत खुश है. सोच रहा था नवागढ़ में पुलिस चौकी नहीं बैठती तो वो भाग कर बाड़ा भी नहीं जाता. भागा तभी तो आज उसके दिन फिर रहे हैं.

रास्ते में आटा, नमक, सुखा कच्चू खरीद लिया. लाला से बोला, अच्छे हैं न लाला जी?
उसकी किसी बात का जवाब नही दिया लाला ने. रामधारी ठेकेदार की बात सुनने में ही व्यस्त रहा. सौदा लेते हुए ही कान में बात पड़ी कि आज ‘सूरमहल’ में पांच हज़ार की आतिशबाजी होगी. भिखारी भी सोच लिया शाम को जल्दी वहां पहुँच जायेगा.

कच्चू की सूखी सब्ज़ी और कड़ी सेंकी रोटी बनाएगा, दो दिन इसी से चल जायेगा. भिखारी सोच रहा था, लँगड़ा अगर एक और लड़की ले आये तो भिखारी को भी एक औरत मिल जायेगी. पहले बकरी चराना होगा फिर शायद जमीन भी खरीद सके. शादी करने से रिश्तेदार, बन्धु, समाज सब मिलेगा। वो लोग भी मदद करेंगे. अकेले- अकेले और कितना रहा जाये? सबका साहचर्य मिलता है तो हिम्मत भी बढ़ती है.
कपड़े धो कर खाना पकाते हुए सूरज डूब गया। बकरा सब गिन कर बस में चढ़ा लिया कि तभी वो लोग आ गए.
राजासाहेब के सिपाही, दो पुलिस.
पुलिस...
भिखारी बेहद डर गया बस के गेट पर ही पीठ टिका कर खड़ा हो गया. ये क्या हुआ? पुलिस चौकी नहीं, पुलिस नहीं इसलिए तो नवागढ़ लौटा था भिखारी. पुलिस?
का भिखारी डर गईल का?
सिपाही गजानन हँसा, शराब की गन्ध आ रही थी। दो बकरा निकाल। राजा साहेब पूरा थाना को न्योता दिए हैं कहाँ मिले इतना गोश्त?
नाय, नाय!! बकरा ना है.
तब बकरी निकाल.
ऐसा न करिये साहेब, गोड़ लागी आपका. वो ही हमारा जीवन है देवता, ना लियो.
भाग साला दुसाध!
गजानन कस कर एक चांटा लगाया भिखारी के गाल पर, नाक की चमड़ी और होंठ फट कर खून निकल आया. भिखारी तब भी चिल्ला रहा था, ओहि पुलिस के डर से भाग गए हम, न लियो सिपाहीजी.
काहे न ली? राजा साहेब बुलाये तभी तो पुलिस आई. तो गोस्त का अब खरीद के खायेगी? तू राजासहेब के मूलक में रहता है न? तू देगा. अब चल भाग.
भिखारी मुसीबत में पागल हो कर बोलने लगा, बकरा-बकरी पर हमनी का हक़ है, जैसे राजा साहेब के हक़ का जमीन छीन गया तो उसी हक़ से उनको रुपया मिला। हम काहे छोड़ें हमनी का हक़?
का? का बोला रे दुसाध?
सिपाही और पुलिस दोनों मिल कर भिखारी को मारे. दक्ष निपुण पेशेवर, प्रशासन अनुमोदित मार. मारते-मारते उनका दम नहीं निकलता. मारते-मारते वो लोग बोलते हैं, बात सुना इसका भाई गजानन? बटाईदार लोग अपनी लड़ाई लड़ते हुए इनको भी हक़-वक सीखा गए. साला पुलिस बकरा नहीं खायेगी तो कौन खायेगा बता? भाई गजानन, ये तो एक और राजा साहेब है नवागढ़ का, राजा साहेब की जमीन और इसके बकरे का हक़ एक बराबर हो गया?

मार-पीट कर भिखारी को अधमरा कर वो लोग चारो बकरा बकरी ले कर निकल गए महाउल्लास में.
भिखारी पशु की तरह पड़ा रोता रहा, रोता ही रहा. दर्द से हिल भी नहीं पा रहा था. लेकिन वो रो रहा था, वंचना की वेदना में, झूठ- सब झूठ है सुखचांदजी की बातें. बकरा-बकरी पर जो उसका अधिकार, सांतवा मौलिक अधिकार है? अधिकार हनन न हो ये संविधान देखती है? सब झूठ, सब झूठ! भिखारी का मौलिक अधिकार बार-बार छिनता है. राजा साहेब को क्षतिपूर्ति मिलती है, भिखारी को क्यों नहीं मिलता? राजासाहेब को क्षतिपूर्ति के छः लाख देने से ही हो जाता है. भिखारी दुसाध का बकरा-बकरी के जीने के मौलिक अधिकार क्षुण्ण होने पर उसे सुरक्षा देने की क्षमता भारत सरकार में नहीं इसलिए भिखारी को क्षतिपूर्ति भी नहीं मिलती क्या?

भिखारी को कानी, लंगड़ा और लँगड़े की औरत मिल कर उठा लाते हैं.
तीन भिखमंगे भिखारी की देखभाल किये, घाव सूखने और उठ कर खड़े होने में दस दिन लग गया. तब भिखारी लँगड़ा से बोला, चल लँगड़ा बछड़ों को भी बेच आते हैं जो दाम मिल जाए!
बीस रूपये में चार बछड़े बेच आया. भिखारी की कमर अब कभी सीधी नहीं होगी,  सर भी मुंडवाना पड़ा ताकि घाव जल्दी सूख जाए... क्षत-विक्षत हुए चेहरे पर से ये  चिन्ह कभी नहीं जायेंगे,  मौलिक अधिकार की रक्षा हेतु पहला और आखरी प्रतिवाद के परिणाम चिह्न स्वरुप!
अब का करेगा भिखारी?
भीख माँगेंगे.
भीख
हाँ, भीख...
उन सबको तीन-तीन रूपये कर के देता है. लाला की दुकान का उधार चुकाया छः रुपया. बकरा बाँधने की रस्सी का दाम मोतिहार के नौकर को दिया दो रुपया. तीन रुपया अपने पास रखा, पेड़ का डाल तोड़ कर लाठी बनाया अब हाट में जा कर एक कटोरी खरीदेगा, भिक्षापात्र!
सुखचांद उसे देख उसके पास आया, घटना की खबर उसे भी मिली थी.
भिखारी!
जा रहा हूँ सुखचांद जी.
कहाँ? भिखारी कहाँ?
जहाँ भीख मिलेगा.
लेकिन तुम्हारे शरीर में तो अभी भी......
ये बात!! का किया जाए महाराज? आप तो हमनी के झूठ बात बता दिए रहे, हमरे लिए तो उ मौलिक अधिकार है ही नहीं सिरिफ राजा साहेब के लिए है.
चले सुखचांद जी.
लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलता गया भिखारी दुसाध परम निर्भयता से. अब पुलिस देख कर डर नहीं लगेगा. बकरा-बकरी, बासन-बर्तन भी अगर दुसाध की संपत्ति है तब भी पुलिस से डरना पड़ता है. जंगल में भागना पड़ता है, दुसाध देखते ही सब छीन लेगी पुलिस. बेसहारा, लाचार, भिखमंगा दुसाध देखने पर पुलिस कुछ नहीं करेगी. भिखारी को अब लगता है ये बात वो पहले क्यों नहीं जानता था? अपनी मातृभूमि पर यदि एक दुसाध राजा साहेब, लालाजी, पुलिस, हनुमान मिश्र सबकी दया ले कर ज़िंदा रहना चाहता है तो एकमात्र उपाय है भिखमंगा बन कर रहना? जो दुसाध बकरी चरा कर भिखारी दुसाध की तरह इंसान बन कर जीना चाहता है वैसे ही दुसाध से तो सब नाराज़ हो जाते हैं.

अब खुद अकेला भी नहीं पाता. कहाँ नहीं है भिखमंगे? कानी, लगड़ा, डोरा .... जहां भी चले जाओ हर जगह मिलेंगे. अब भिखारी अकेला नहीं, एक बहुत बड़े समाज का हिस्सा है.

सुखचांद भिखारी को देखते और सोचते हैं, भिखारी दुसाध सात नम्बर मौलिक अधिकार से भले ही वंचित हुआ, तीन नम्बर अधिकार की रक्षा ज़रूर हुई है. किसी भी व्यवसाय या काम को चुनने का अधिकार. भिखारी भिक्षाटन आजीविका के लिए चुन लिया. वो जन्म-जन्मांतर तक भिखमंगा ही रहे, भारत सरकार ये अवश्य ही सुनिश्चित करेगी. उसे कोई यदि किसी दूसरे आजीविका के लिए प्रेरित करना चाहे तो? भारत का संविधान उसके मौलिक अधिकार का हनन बरदाश्त नहीं करेगी. भारत के किसी भी कोने में ऐसा अन्याय हुआ तो भारत का संविधान वहां पुलिस, रिजर्व बल, सैन्य बल, टास्क फ़ोर्स, जंगी विमान सब वहां उतार देगी।

भिखारी दुसाध लंगड़ाते-लंगड़ाते सड़क के मोड़ पर अदृश्य हो गया. उसे अब और कुछ भी खोने का डर नहीं।












 

Tuesday, 2 August 2016

कहानी : इच्छापुरण , लेखक : रबिन्द्रनाथ टैगोर



 चित्र साभार गूगल 

सुबलचन्द्र के बेटे का नाम सुशीलचन्द्र है. लेकिन हमेशा नाम के अनुरूप व्यक्ति भी हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं. तभी तो सुबलचन्द्र दुर्बल थे और उनका बेटा सुशीलचन्द्र बिलकुल भी शांत नही बल्कि बहुत चंचल था.

उनका बेटा सुशील पुरे मोहल्ले को परेशान कर रखता था इसलिए कभी-कभी पिता, पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिए भाग कर आते लेकिन पिता के पैर में गठिया का दर्द और बेटा भागता था हिरन जैसा. नतीजा थप्पड़, लात, मार कुटाई कुछ भी सही जगह पर नहीं पड़ता था. लेकिन सुशीलचन्द्र जिस दिन पकड़ में आता उस दिन उसके पिता के हाथों से बचा पाना किसी के सामर्थ्य में नहीं रहता.

आज शनिवार के दिन स्कूल में दो बजे ही छुट्टी हो जाती है लेकिन आज सुशील का किसी भी तरह स्कूल जाने का मन नही हो रहा था. इसके बहुत सारे कारण थे. पहले तो आज स्कूल में भूगोल की परीक्षा है दूसरे, मोहल्ले के बोस निवास में आज पटाखे फोड़ने का कार्यक्रम तय है. सुबह से ही वहाँ धूमधाम चल रही है. सुशील की इच्छा है आज सारा दिन वहीँ बिताये.

बहुत सोचने के बाद सुशील स्कूल जाने के समय अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. उसके पिता ने आकर पूछा- ‘क्या रे, इस समय बिस्तर पर पड़ा है, आज स्कूल नही जाना क्या?’
सुशील बोला, ‘मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे है, आज मैं स्कूल नहीं जा पाऊंगा.’
पिता सुबल उसके झूठ को समझ गये, मन-ही-मन बोले, ‘रुक! आज तेरा कुछ उपाय करना ही होगा.’ सुशील से बोले, ‘पेट में मरोड़ उठ रहे है?’ फिर तो आज कहीं जाने की ज़रूरत नहीं. बोस निवास में पटाखे देखने हरि को अकेले ही भेज देता हूँ, तुम यहाँ चुपचाप पड़े रहो मैं अभी तुम्हारे लिए पाचक तैयार कर के लाता हूँ.’

सुशील के कमरे से निकल कर बाहर सांकल लगा दिया और बहुत कड़वा सा एक पाचक तैयार करने चले गये. सुशील तो अब भारी मुश्किल में पड़ गया. लेमनचूस खाना उसे जितना ही अच्छा लगता था उतना ही बुरा पाचक खाने में लगता था उसे तो अब मुसीबत नजर आने लगी थी. उधर बोस निवास जाने के लिए तो कल रात से ही उसका मन छटपटा रहा था, लेकिन....

सुबलचन्द्र जब एक बड़े से कटोरे में कड़वा पाचक ले कर कमरे में आये तो सुशील तुरंत बिस्तर से उतर गया और बोला, ‘मेरा पेट दर्द एकदम ठीक हो गया है. मैं आज स्कूल जाऊंगा.’

पिता बोलें, ‘न ना! आज जाने की ज़रूरत नहीं.तुम पाचक खा कर चुपचाप सोये रहो.’ ये बोल कर सुबलचन्द्र जबरदस्ती सुशील को पाचक खिला कर बाहर से कमरे में ताला लगा कर चले गये.

सुशील बिस्तर पर पड़े रोते-रोते सारा दिन केवल मन-ही-मन यही कहता रहा, ‘काश, मैं अगर बाबा के जितनी उम्र का होता तो कितना अच्छा होता जो मेरे इच्छा होती वही करता और कोई मुझे ऐसे कमरे में बंद कर के नहीं जा पाता.’

उसके पिता सुबल चन्द्र बाहर अकेले बठे बैठे सोच रहे थे, ‘मेरे माता पिता मुझे बहुत ज्यादा ही प्यार दुलार देते थे इसलिए मैं अच्छी तरह पढाई लिखाई कुछ भी नहीं कर पाया. काश, यदि फिर से बचपन मिल जाता तो फिर कुछ भी हो जाए पहले की तरह समय बर्बाद नही कर के , मन लगा कर पढाई करता.’

इच्छापूरण देव उस समय उनके घर के सामने से जा रहे थे. वो पिता और पुत्र के मन की इच्छा जान कर सोचने लगे. ‘अच्छा कुछ दिन इन लोगों की इच्छा पूरी कर के देखा जाये.’

ये सोच कर वो पिता से बोले, ‘तुम्हारी इच्छा पूरी होगी. कल होते ही तुम तुम्हारे बेटे की उम्र प्राप्त करोगे.’ बेटे से जा कर बोले, ‘कल होते ही तुम तुम्हरे पिता के उम्र के हो जाओगे.’ सुन कर दोनों ही बहुत खुश हो गए.

वृद्ध सुबलचन्द्र रात में ठीक से सो नहीं पाते थे भोर के वक्त थोड़ी नींद आ जाती थी. लेकिन आज पता नहीं क्या हुआ उन्हें भोर होते ही एकदम कूद कर बिस्तर से नीचे उतर आये . उन्होंने देखा कि वो बहुत छोटे हो गये है. उनके दांत जो गिर गये थे सब अपनी जगह पर आ गये हैं, दाढ़ी मूंछ सब गायब. रात में जो धोती और कुरता पहन कर सोये थे वो इतना बड़ा हो गया है की उसकी आस्तीन झूल कर ज़मीन छू रही थी. कुरते का गला छाती तक उठ आया है और धोती इतनी बड़ी की ज़मीन पर ठीक से पाँव रख कर चल भी नहीं पा रहे.
हमारे सुशील बाबू रोज उठते ही दुरात्मा की तरह दौड़ते फिरते है, लेकिन आज उनकी नींद ही नहीं टूट रही; जब अपने पिता सुबल चन्द्र के चिल्लाने की आवाज़ से उसकी नींद खुली तो देखा उसके पहने हुए कपड़े इस तरह छोटे हो कर चिपक गये हैं की उसके चीथड़े हो कर शरीर से अलग हो जायेंगे. पूरा शरीर बढ़ गया है, काले सफ़ेद दाढ़ी-मूंछ के कारण आधा चेहरा दिखाई ही नहीं देता; उसके सर पर कितने बाल थे लेकिन आज हाथ फेर कर देख रहा सामने से गंजा हो गया जो की दिन के उजाले में चमक रहा है. आज सुशील चन्द्र कई बार उठने के प्रयास में इस तरफ उस तरफ करते हुए बार बार सो जा रहा है लेकिन अंत में अपने पिता के इतनी चीख पुकार के मारे उसे उठना ही पड़ा.

दोनों के ही मन की इच्छा पूरी हुई लेकिन बहुत मुश्किलें भी खड़ी हो गयी. पहले ही बताया था कि सुशील चन्द्र की इच्छाएँ थी यदि अपने पिता की उम्र का हो जायेगा तो स्वाधीन होगा, पेड़ पर चढ़ कर तालाब में कूदेगा, कच्चे आम खायेगा, चिड़ियों के बच्चे पकड़ेगा, पूरी दुनियां घुमेगा- फिरेगा और जब इच्छा होगी घर में आ कर जो इच्छा हो वही खायेगा कोई उसे कुछ नहीं कहेगा. लेकिन आश्चर्य! उस दिन सवेरे से उसे पेड़ पर चढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई, पानी देख कर कूदने की इच्छा तो दूर उसे लग रहा था की अगर कूदा तो उसे बुखार आ जायेगा. वो चुपचाप बरामदे में एक चटाई बिछा कर बैठ सोचने लगा.

एकबार मन में आया खेल-कूद एकदम से छोड़ देना ठीक नहीं होता, एक बार कोशिश कर के ही देखा जाये. ये सोच कर पास ही एक आमड़ा पेड़ था उसी पर चढ़ने की कोशिश करने लगा. कल तक जिस पेड़ पर वो गिलहरी की तरह झटपट चढ़ जा रहा था आज इस बूढ़े शरीर के साथ किसी भी तरह संभव नहीं हो रहा था. पेड़ की एक नाजुक डाल पर शरीर का भार देते ही वो डाल भारी शरीर का भार वहन ना कर पायी और टूट कर ज़मीन पर गिर गयी, साथ में बूढा सुशील चन्द्र भी धड़ाम से गिर पड़ा. पास के सड़क पर लोग जा रहे थे उन्होंने जब एक बूढ़े को बच्चे की तरह पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते देखा तो हँसते हँसते बेहाल हो गये. सुशील शर्म से सर नीचा किये हुए फिर से उसी चटाई पर आ कर बैठ गया. नौकर से बोला, ‘सुनो, बाज़ार से एक रूपये  का लेमनचूस खरीद लाओ.’

लेमनचूस का सुशील चन्द्र को विशेष लोभ था. स्कूल के पास के दूकान में वो रंग बिरंगे लेमनचूस सजाया हुआ देखता; दो-चार पैसे जो भी मिलते उसी से लेमनचूस खाता था. सोचता था जब पिता के जितना बड़ा हो जायेगा तब पॉकेट भर भर कर लेमनचूस खरीदेगा और जी भर कर खायेगा. आज नौकर एक रुपये में ढेर सारा लेमनचूस खरीद कर ला दिया उसी में से एक उठा कर उसने अपने दन्त विहीन मुंह में डाल कर चूसने लगा लेकिन बूढ़े मुंह में बच्चों की पसंद का लोजेंस स्वाद मुताबिक नहीं बल्कि बेस्वाद लग रहा था. एक बार सोचा ; ये सब छोटे हो गये बाबा को खिलाया जाये, लेकिन दुसरे ही पल सोचा, ‘ ना! देना ठीक नहीं होगा, ये सब खा कर तबियत ख़राब हो जाएगी.

कल तक जो लड़के छोटे सुशील चन्द्र के साथ कबड्डी खेलने आते थे आज वो बूढ़े सुशील चन्द्र को देख छिटक कर दूर चले गये.

सुशील सोचा करता था पिता की तरह आज़ाद होने पर वो सारा दिन अपने लड़के-दोस्तों के साथ डू-डू आवाज़ करते हुए कबड्डी खेलता रहेगा. लेकिन आज राखाल, गोपाल, निवारण,अक्षय, हरीश को देख कर मन-ही
-मन खीज उठा, सोचा, अभी चुपचाप यहाँ बैठा हूँ  अभी लड़के आयेंगे और अचानक ही हुडदंग मचाने लगेंगे.

पहले ही बताया है, सुबलचन्द्र अपने बरामदे में बैठ कर रोज़ सोचा करते थे मैं जब छोटा था शैतानी कर-कर के केवल समय ही बर्बाद किया है, अगर बचपन दुबारा मिल जाये तो एक बार शांत और अच्छे बच्चे की तरह सारा दिन कमरे का दरवाज़ा बंद कर के सिर्फ पढाई-लिखाई करूँगा.यहाँ तक कि शाम को दादीमाँ के पास कहानी सुनने भी नहीं जाऊंगा, रात दस-ग्यारह बजे तक प्रदीप जला कर पढाई पूरी करूँगा.

लेकिन बचपन वापस पा कर वो किसी भी तरह स्कूल जाने को तैयार नही. सुशील तंग हो कर बोलता, ‘बाबा स्कूल नहीं जायेंगे क्या?’ सुबलचन्द्र मुंह नीचे कर सर खुजाते हुए धीरे-धीरे कहते, आज मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे हैं, आज स्कूल नही जा सकूँगा. सुशील चन्द्र नाराज़ हो कर बोला, जायेंगे कैसे नहीं? स्कूल जाते समय मेरा भी इस तरह खूब पेट दर्द हुआ है, मैं ये सब खूब जानता हूँ.’

छोटा सुशील नित नये उपाय निकाल कर स्कूल से अनुपस्थित रहता था कि इस वक्त सुबल चन्द्र का उसे झांसा देने का कोई भी उपाय व्यर्थ था.सुशील ज़बरदस्ती छोटे पिता को स्कूल भेजने लगा. स्कूल से लौट कर छोटा पिता खेलने-कूदने और उधम मचाने लग जाता लेकिन, उसी समय वृद्ध सुशील चन्द्र एक रामायण की किताब ले कर सस्वर पाठ करना आरम्भ कर देते. सुबल चन्द्र के उधम मचाने के कारण वृद्ध पुत्र के पढने में व्यवधान उत्पन्न होता था इसलिए छोटे पिता को नियंत्रण में रखने के लिए उसे एक स्लेट पकड़ा देता जिसमें बहुत कठिन-कठिन गणित के सवाल होते. इतने कठिन सवालों में से एक ही हल करने में छोटे पिता का एक घंटा निकल जाता. शाम को बूढ़े सुशीलचन्द्र के कमरे में और कई बूढ़े मिल कर शतरंज खेला करते. उस समय सुबलचन्द्र को ठंडा रखने के लिए सुशीलचन्द्र ने एक मास्टर रख दिया, मास्टर रात दस बजे तक उसे पढ़ाता रहता.

भोजन के विषय में सुशील बड़ा कडक था ,क्योंकि उसके पिता सुबलचन्द्र जब वृद्ध थे उन्हें अपना खाना ठीक से हजम नहीं होता था, थोडा सा भी ज्यादा खा ले तो खट्टे डकार आने लगते थे —ये बात सुशील चन्द्र को अच्छी तरह याद थी इसीलिए वो अपने पिता को कैसे भी अधिक खाने नहीं देता था. इधर सुबलचन्द्र के छोटे हो जाने के बाद से पेट में जैसे आग लगी रहती हमेशा ही भूख लगती जैसे पत्थर भी खाये तो हजम हो जाये ऐसी स्थिति हो गयी थी. सुशील उन्हें इतना कम खाने देता कि भूख के मारे वो छ्टपट करते. अंत में सूख कर उनके शरीर की हड्डियाँ बाहर दिखने लगी. सुशील सोचा, ज़रूर कोई गंभीर बीमारी हुई है इसलिए वो तरह-तरह की दवाइयां खिलाने लगा.

बूढ़े सुशील को भी रोज़ मुश्किलें आने लगीं. वो अपने पहले की आदत अनुसार जो भी करने जाता उसे सह्य नहीं हो रहा था. पहले मोहल्ले में कहीं भी नाटक-नौटंकी की खबर सुनता तो घर से भाग कर ठीक पहुँच जाता था, चाहे जाड़ा-बरसात कुछ भी हो. आज का सुशील ऐसा करते हुए सर्दी लग कर खांसी शरीर दर्द के साथ तीन सप्ताह के लिए बिस्तर पकड लिया. हमेशा से ही वो तालाब में नहाता है लेकिन आज भी वही करने से हाथ-पाँव में गठिया का दर्द और सुजन उभर आया, जिसकी चिकत्सा करने में छह महीने लग गये. उसके बाद से ही वो गर्म पानी से ही नहाता है और पिता सुबलचन्द्र को भी तालाब में नहाने जाने नहीं देता. पुरानी आदत मुताबिक भूल कर जब भी पलंग से कूद कर उतरने जाता तो हाथ पैर की हड्डियाँ टनटना जाती है. मुंह में एक पूरा पान ठूंस का उसे ध्यान आता है कि उसे दांत नहीं हैं, चबाने में बहुत ही कष्ट है. बाल सवांरने के लिए कंघी सर पर चलाते ही याद आता है कि सर पर तो बाल ही नहीं. जब कभी ये भूल जाता है कि वो अपने पिता की उम्र का हो गया है और पहले की तरह शैतानी करते हुए बूढी आनंदी बुआ की मटकी पर पत्थर मारने लगता तो लोग बूढ़े को बच्चों की तरह शरारत करते देख मारो-मारो, चिल्ला कर मारने दौड़ते. तब वो खुद ही संकोच में पड़ कर चुपचाप घर में घुस जाता.

सुबल चन्द्र भी कभी-कभी भूल जाता कि वो अब बूढ़ा से छोकरा हो गया है और जा कर वहां बैठ जाता जहाँ और बूढ़े लोग ताश-पासा खेल रहे होते और बूढों की तरह ही बातें करता तो वहाँ लोग उसे भगाने लगते कहते, ‘ जाओ-जाओ जा कर खेलो यहाँ बैठ कर बड़ों के बीच बड़ा बनने को चेष्टा मत करो.’ अचानक भूल कर मास्टर से भी बोल पड़ता, ‘ज़रा तम्बाकू दो तो, तलब लगी है’ सुन कर मास्टर जी उसे एक पाँव पर बेंच पर खड़ा कर देते. इसी तरह एक दिन नाई को बोला, ‘कितने दिन हो गये तू मेरी दाढ़ी बनाने नहीं आया?’नाई भी उसकी ओर देख कर जवाब दिया, ‘आऊंगा और 10 साल बीतने दो फिर आऊंगा.’ फिर कभी-कभी आदत मुताबिक जा कर अपने बेटे सुशील को पिटता तो सुशील उनसे कहता, ‘पढाई लिखाई कर के यही शिक्षा मिली है, एक रत्ती लड़का और बड़ों पर हाथ उठाना?’ वैसे आस-पास लोग जमा हो जाते और कोई थप्पड़ तो कोई डांट तो कोई समझाने लगता.

तब सुबल एकनिष्ठ हो कर प्रार्थना करने लगता, आहा! अगर मैं अपने बेटे सुशील की तरह बुढा हो जाऊं और आजाद रहूँ तो कितना ही अच्छा हो!’
इधर सुशील भी मन ही मन हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता, ‘ हे देवता, मुझे मेरे पिता की तरह छोटा कर दो कितना अच्छा होगा मैं पहले की तरह ही खेल-कूद, घूमना-फिरना कर सकूँगा!’
पिता जी जिस तरह शैतानी करने लगे हैं उन्हें अब और मैं संभाल नही सकता. पहले ही तो अच्छा था.

तब इच्छापूरण देव आ कर बोले, ‘कैसा लग रहा है, तुम दोनों की इच्छा पूरी हुई न! शौक मिटा या नहीं?’
दोनों ही साष्टांग हो कर देवता से बोले, ‘दुहाई हो! हम जैसे थे हमें फिर से वैसा ही बना दीजिये. सब शौक मिट गये.

देवता बोले, ‘ठीक है कल सुबह नींद से जागने पर तुम दोनों पूर्ववत हो जाओगे.’

दुसरे दिन सुबल चन्द्र फिर से बूढ़े और सुशील फिर से बच्चा बन गया. दोनों को लगा जैसे कोई सपना देख कर अभी नींद से जागे हों.
सुबल चन्द्र आवाज़ भारी कर के आवाज़ लगाये, ‘सुशील, व्याकरण याद नहीं करना है.’
सुशील सर खुजाते हुए मुंह नीचा कर के बोला, ‘पिताजी, मेरी व्याकरण की किताब खो गयी है.’

Monday, 20 June 2016

कहानी : कंकाल लेखक : रबिन्द्रनाथ टैगोर

 चित्र गूगल से प्राप्त

हम तीन बचपन के साथी जिस कमरे में सोते थे उसके बगल के कमरे की दिवार पर एक साबुत नरकंकाल लटकाया हुआ रहता. रात में हवा के जोर पर उसकी हड्डियाँ खड़-खड़ की आवाज़ कर के हिला करती और दिन में हमलोगों को उन हड्डियों को हिलाना होता था. हमलोग उस समय पंडित-महाशय के पास मेघनादवध और कैम्बेल स्कूल के एक विद्यार्थी के पास अस्थिविद्या पढ़ रहे थे. हमारे अभिभावकों की इच्छा थी, कि हमे सर्वविद्या में पारंगत कर के ही छोड़ेंगे. उनकी ये इच्छा कितनी सफल हुई है ये बात जो हमें करीब से जानते है उनके सामने कहना कुछ ज्यादा ही हो जायेगा और जो नहीं जानते उनके सामने इसे गुप्त रखना ही श्रेयस्कर होगा.
ऐसे ही बहुत दिन बीत गये. इस बीच उस कमरे से वो कंकाल और हमारे दिमाग से अस्थिविद्या कहाँ स्थानांतरित हो गये खोज कर के भी नहीं पता चल सका.
कुछ दिन हुए, एक दिन किसी कारणवश जगह की कमी होने के कारण मुझे एक रात उसी कंकाल वाले  कमरे में सोना पड़ा. नई जगह होने की वजह से नींद नहीं आ रही थी. करवट बदलते-बदलते गिरजाघर के सारे घंटे मेरे कान में बजते रहे. और इसी बीच तेल से जलता हुआ लालटेन भी धीरे-धीरे बुझ गया. इसके पहले सुना गया है कि इस घर में दो-एक दुर्घटना घट चुकी है, इसलिए बत्ती के बुझते ही तुरंत मौत की बात अपने आप ही मन में उभरने लगी. मन में आया की, यही तो दो घडी पहले जो एक दीपशिखा जल रही थी सदा के लिए घोर अंधकार में मिल गयी. प्रकृति के लिए जैसे इस रौशनी का बुझना है ठीक वैसे ही इंसान के छोटे-छोटे प्राण का भी, अचानक विलीन हो जाना एक ही है, कोई अंतर नहीं.
विचार के इसी क्रम में उस कंकाल की याद आई. उसके जीवनकाल के बारे में कल्पना करने लगा. सहसा महसूस हुआ जैसे एक चेतन पदार्थ अँधेरे कमरे में दिवार के सहारे-सहारे मेरे मसहरी के चारों ओर घूम रहा है. उसकी भारी-भारी सांस की आवाज़ भी सुनाई देने लगी. जैसे वो कुछ खोज रहा हो लेकिन मिल नही रहा और पूरे घर में ही उसके घुमने का एह्सास होने लगा. समझ में आया, ये सब मेरे ही निद्राहीन उच्च उर्वर मस्तिष्क की कल्पना है और मेरे ही सर में जो भन-भन करते हुए खून तेज़ी से दौड़ रहा है उसी के भागने की पदध्वनि सुनाई दे रही है. लेकिन फिर भी एक अजीब सी अनुभूति होने लगी. ज़बरदस्ती अपने इस डर को दूर करने के लिए चिल्ला कर बोल पड़ा. ‘कौन है?’ पदचाप मेरे मसहरी के पास आ कर रुक गए और एक जवाब भी सुनाई पड़ा, ‘मैं. मेरा वो कंकाल कहाँ गया उसी की खोज में हूँ.’
मैंने सोचा, अपनी इस काल्पनिक सृष्टि के सामने डर दिखाऊं ये ठीक नही होगा – मसनद जोर से पकड़े हुए पुराने परिचित की तरह सहज स्वर में उससे कहा, 'इतनी रात गए करने के लिए कितना महान काम खोज निकाला है, तो वो कंकाल अभी तुम्हारे लिए आवश्यक है?’
अँधेरे में मसहरी के एकदम करीब से आवाज़ आई, ‘क्या कह रहे हो? मेरी छाती की हड्डियाँ उसी में थी, मेरे छब्बीस साल का यौवन भी तो उसी के चारों ओर विकसित हुआ था--- एक बार देखने की इच्छा नहीं होगी?’
मैं तुरंत बोला, ‘हाँ , बात तो सही है. तो जाओ तुम खोज करो मैं अब थोड़ा सो लेता हूँ.’
उसने कहा— ‘लगता है तुम अकेले हो? तो मैं थोड़ी देर यहाँ बैठूं. थोड़ी बाते की जाये. पैंतीस साल पहले मेरी भी इंसान के पास बैठ कर इंसानों से बातें होती थी. अब इन पैंतीस सालो में मैं सिर्फ शमशान की हवा जैसी हूहू आवाज़ करते हुए फिर रही हूँ. आज पैंतीस साल बाद एक बार फिर इंसान की तरह तुमसे बातें करना चाहती हूँ.’
महसूस हुआ जैसे मेरी मसहरी के पास आ कर कोई बैठा. निरुपाय हो कर मैं थोड़ा उत्साह के साथ ही बोला, ‘ ठीक है, तो फिर कोई ऐसी कहानी बताओ जिससे मन खुश हो जाये.’
वो बोली, ‘सबसे मजेदार कोई बात सुनना चाहते हो तो मैं अपने ही जीवन की घटना बताती हूँ.’
गिरजाघर की घडी में ठंग-ठंग कर के दो बज गये.
‘जब इंसान थी और छोटी थी तब एक व्यक्ति से यम की तरह भय खाती थी. वो मेरे पति थे. मछली को कांटे से पकड़ने पर जैसा महसूस होता होगा मुझे भी ठीक वैसा ही महसूस होता था. अर्थात् कोई एक अनजान जीव मानो बंसी से बिंध कर मुझे मेरे स्निग्ध गहरे जन्मस्थल जलाशय से खींच कर छिन कर ले जा रहा है – किसी भी तरह उसके हाथों से मुक्ति नहीं. शादी के दो ही महीने बाद मेरे पति की मृत्यु हो गयी और मेरे आत्मीय-स्वजन मेरे लिए शोक और विलाप करने लगे. मेरे श्वसुर बहुत सारे गुण-लक्षण देख और मिला कर मेरी सास से बोले , ‘शास्त्रों में जिसे कहते हैं विषकन्या ये लड़की वही है.’ ये बात मुझे साफ याद है. – सुन रहे हो, कैसी लग रही है कहानी?’
मैं बोला, ‘बढ़िया. कहानी की शुरुआत तो मज़ेदार ही लग रही है.’
‘तो फिर आगे सुनो, ख़ुशी-ख़ुशी पिता के घर वापस आ गयी. धीरे-धीरे उम्र बढ़ने लगी. लोग मेरे पास ये बात छिपाने की कोशिश करते थे लेकिन मैं खूब जानती थी की मेरे जैसी सुंदरी कन्या यहाँ-वहां हर जगह नही मिलती. – तुम्हे क्या लगता है?’
‘हो सकता है, लेकिन मैंने तो तुम्हे कभी नहीं देखा.’
चित्र गूगल से प्राप्त

‘नही देखा है! क्यों? मेरा वो कंकाल. हिहीहिही!! मज़ाक कर रही हूँ. तुम्हारे पास कैसे प्रमाणित करूँ कि उस खाली कोटर में कभी बड़ी-बड़ी सी खूबसूरत काली आँखे थी, और लाल होठों पर जो मधुर  हंसी मिली रहती थी अभी के इस अनावृत दंतपंक्ति के साथ वीभत्स हंसी का उससे कोई मेल नहीं; और इस सूखे हड्डी के ढांचे पर इतना सुकोमल लालित्य और यौवन से परिपूर्ण शरीर दिन पर दिन और खिलता जा रहा था, तुमसे ये सब वर्णन और व्याख्या करने में मुझे बड़ी हंसी आ रही है और गुस्सा भी आ रहा है. मेरा वो शरीर जो अस्थिविद्या सीखने के काम भी आ सकता है ये उस समय के बड़े से बड़े डॉक्टर भी विश्वास नही कर सकते थे. मैं जानती हूँ, एक डॉक्टर उसके एक विशेष प्रिय मित्र के पास मुझे कनकचंपा नाम दिया था. इसका मतलब हुआ कि, इस पूरी  दुनिया में सारे मनुष्य अस्थिविद्या और शरीरतत्व पढने समझने के लिए थे, सिर्फ मैं ही सौन्दर्य रूपी फूल की तरह थी. कनकचंपा के अन्दर भी एक कंकाल है!’
‘मैं जब चलती थी तब खुद ही समझती भी थी कि, एक टुकड़ा हीरा हिलाने पर जैसे उसके चारों ओर प्रकाश किरणें झिलमिला उठती है ठीक वैसे ही मेरे शरीर की हरेक गति के साथ वैसा ही सौन्दर्य प्रकाश चारों तरफ बिखरने लगता था. कभी-कभी मैं खुद ही अपने दोनों हाथ देखती रहती, देखती और सोचती मेरे इन दो हाथों में पृथ्वी के सारे उद्दत पौरुष के मुंह पर लगाम लगाने की  ताकत हैं, सुभद्रा जब अर्जुन को ले कर तेज गति से अपना विजयरथ तीनों लोकों से चला कर ले जा रही थी, लगता है उनके भी इसी तरह के दो सुन्दर सुडौल बाहें और आरक्त हथेली, लावण्यशिखा की तरह उँगलियाँ रही होंगी.
‘लेकिन मेरा ये निर्लज्ज, निरावरण, आभूषणविहीन वृद्ध कंकाल तुम्हारे सामने मेरे बारे में झूठा साक्ष्य दे रहा है. मैं उस समय निरुपाय और निरुत्तर थी, इसीलिए इस दुनिया में सबसे ज्यादा गुस्सा तुम्हारे ऊपर ही है. इच्छा होती है कि, मेरी वो सोलह बरस की जीवित यौवन रक्तिम आभायुक्त रूप तुम्हारे आँखों के सामने खड़ा कर दूँ और हमेशा के लिए तुम्हारी अस्थिविद्या भुला कर उसे देश निकाला दे दूँ.’
मैं बोला, ‘तुम्हारे पास अगर शरीर होता तो तुम्हे छू कर शपथ ले कर कहता, वो विद्या लेशमात्र भी मेरे दिमाग में नहीं है. और तुम्हारी वो भुवनमोहिनी रूपरजनी का जैसा वर्णन तुमने किया उससे इस अँधेरे कमरे में झिलमिलाहट फ़ैल गयी है, मैं साफ़ देख सकता हूँ उस रूप की कान्ति. रहने दो अब और वर्णन की ज़रूरत नहीं.’
‘मेरी कोई सहेली या संगिनी नहीं थी. बड़े भाई ने प्रतिज्ञा की थी, वो विवाह नही करेंगे. अंत:पूर में मैं एकदम अकेली थी. बगीचे के पेड़ पौधों के बीच बैठ कर मैं सोचा करती, सारी दुनियाँ मुझे ही चाहती है, सारे तारे मुझे ही देखते है, हवा भी छल कर के अपनी गहरी साँसे मुझे अनुभव करा जाती है, और जिस घास पर मैं पैर फैला कर बैठी हूँ उसमें भी अगर चेतना होती तो वो भी बार-बार मुझे पा कर मूर्छित हो जाती. इस दुनिया के सारे युवा पुरुष इसी घास का रूप ले कर मेरे चरणों में लेटे हैं, मैं ऐसी ही कल्पना किया करती : मन में अकारण ही एक दर्द सा अनुभव होता.’
‘भईया के एक मित्र शशिशेखर जब मेडिकल पास कर के वापस आये तब वो ही हमारे फैमिली डॉक्टर बन गए. मैंने उन्हें पहले भी कई बार छुप कर देखा था. भईया बहुत ही अजीब व्यक्ति थे—दुनिया को वो पूरी तरह आँखे खोल कर नहीं देखते थे. उन्हें लगता था इस संसार में खाली जगह है ही नहीं इसलिए दूर एक प्रांत में जा कर आश्रय लिए थे.’
‘उनके मित्रों में ये मित्र शशिशेखर, बाहर के इतने युवकों में मैं इन्ही शशिशेखर को ही हमेशा देखा करती थी क्योंकि और किसी का आना जाना नहीं था. और जब मैं शाम को फूलों के पेड़ तले साम्राज्ञी का आसन ग्रहण करती तब दुनिया के सारे पुरुष इसी शशिशेखर का रूप धर मेरे पैरों तले आ बैठते— सुन रहे हो? क्या लग रहा है?’
मैं गहरी सांस ले कर बोला, ‘सोच रहा हूँ शशिशेखर बन कर ही अगर जन्म लेता तो अच्छा होता.’
‘आगे की पूरी कहानी सुनो.’
‘एक दिन मौसम के बदलाव के कारण मुझे बुखार हो आया. डॉक्टर मुझे देखने आये. वो ही हमारी पहली मुलाकात थी.’
‘मैं खिड़की की ओर मुंह किये हुए थी, शाम की लालिमा चेहरे पर पड़ रही थी जिससे बीमार चेहरे की मलिनता दूर हो गयी लग रहा था. डॉक्टर ने कमरे में आ कर मेरे चेहरे की ओर जब एक बार देखा, तब मैं मन ही मन खुद को डॉक्टर की जगह रख कर कल्पना में खो गयी और डॉक्टर बन कर खुद अपने चेहरे को ही निहारने लगी. उस शाम की हलकी रौशनी में कोमल तकिये पर फूल जैसी कोमल लड़की लेटी है. उसके ललाट पर बालों के घुँघर बन बिखरे पड़े है और उसकी बड़ी बड़ी आँखों की पलकें उसके गालों पर जैसे छाया की हुई हैं.
‘डॉक्टर धीरे से भईया को बोले, ‘एक बार हाथ देखना होगा.’
‘मैं कम्बल के अन्दर से अपनी सुगठित कोमल बांह बाहर कर के बढ़ा दी. एक बार अपने हाथों की ओर देख कर सोची अगर नीले रंग की चूड़िया पहनी होती तो कितना अच्छा लगता. नाड़ी देखने में डॉक्टर का इतना संकोच पहले कभी नही देखा था. किसी तरह कांपते हाथों की उँगलियों से नाड़ी देखना हुआ. फिर बुखार कितना है इसका भी जायजा लिया. मैंने भी उनके भीतर नाड़ी कितनी तेज़ चल रही है इसका कुछ आभास पाया. – विश्वास नहीं हो रहा?’
मैं बोला, ‘अविश्वास का कोई कारण तो नहीं दिख रहा, ये तो सच ही है कि इंसान की नाड़ी हर समय एक गति से नहीं चलती.’
‘समय के साथ और भी दो एक बार बीमारी और इलाज में पड़ कर देखा, शाम को मेरी काल्पनिक सभा में असंख्य पुरुष संख्या का धीरे-धीरे ह्रास हो गया और उसके स्थान पर सिर्फ एक ही चेहरा आ कर ठहर गया. मेरी दुनिया लगभग जनशून्य हो आई थी. मेरी दुनिया सिर्फ एक डॉक्टर और एक रोगिणी पर आ कर ठहर गयी.’
चित्र गूगल से प्राप्त

‘शाम को सबसे से छुपा कर मैं एक पीले रंग की साड़ी पहनती, सुंदर से जुड़ा बना कर उस पर खूब सारे बेली फूल का गजरा लगाती और एक ऐनक ले कर अपने बागीचे में चली जाती, वहाँ जी भर कर खुद को निहारती.
‘क्यों. खुद को देख कर क्या तृप्ति नही होती! वास्तव में नही होती. क्योंकि, मैं तो खुद को खुद के नज़र से नही देखती थी. मैं तब अकेली नहीं दो होती थी. मैं तब डॉक्टर बन के खुद को देखती , मुग्ध होती, और प्यार भी करती, लेकिन फिर भी मन के अन्दर दीर्घश्वास शाम को चलने वाली हवा की तरह हु हु कर उठती.
‘उस समय मैं कभी अकेली नहीं होती. जब चलती नीची नज़रों से देखती मेरे पैर की उँगलियाँ धरती पर पड़ती हैं तो कैसी लगतीं हैं. और सोचती कि इस तरह पड़ते पाँव हमारे नए डॉक्टर बाबू को कैसे लगतेहैं! खिड़की के पार सब ओर सन्नाटा लगता. कहीं कोई आवाज़ नही, बीच बीच में एक-दो चील दूर बहुत दूर आकाश में उड़ी चली जाती दिख जाती थी; और हमलोगों के बगीचे के प्राचीर से दूर खिलौनेवाले की आवाज़ सुनाई देती, सुर में चिल्ला कर कहता... ‘खिलौने ले लो, चूड़ी ले लो’ एक हाथ बड़े ही अनादर से कोमल बिस्तर पर फैला कर सोचा करती, मेरे इस तरह फैले हाथ को न जाने कौन देख गया. जाने कौन अपने दोनों हाथों से इस हाथ को हाथों में ले लिया. जाने कौन इस आरक्त हथेली पर एक चुम्बन रख कर हाथ फिर यथास्थान रख कर आहिस्ते से  चला जा रहा है. --- मान लो कहानी अगर यहीं पर ख़त्म हो जाये तो कैसा लगेगा?’
मैं बोला, बुरा नहीं होगा. कुछ चीजें अधूरी ही रह भी जाती हैं ; लेकिन जो बाकी है उसे अपने मन से ही पूरा कर लिया जा सकता है जिससे बाकी बची रात भी कट ही जाये.’
‘लेकिन ऐसा हुआ तो ये कहानी फिर गंभीर रूप ले लेगी, फिर इसमें हंसी या उपहास जैसा कहाँ बाकी रह जायेगा! इस शरीर का कंकाल अपने सारे दन्त-पंक्ति निकाल कर दिखाता ही कहाँ है!’
‘उसके बाद सुनो. थोड़ा समय गुज़रते ही डॉक्टर शशिशेखर की डॉक्टरी चलने लगी, हमारे घर के निचले तल्ले में ही डॉक्टर अपना क्लिनिक खोल लिए. तब मैं उन्हें कभी-कभी हंसी-हंसी में दवाइयों के बारे में, ज़हर के बारे में, क्या करने से इंसान सहज ही मर सकता है, इन सब के बारे में पूछा करती थी. डॉक्टरी के बारे में बाते करते रहने से बहुत सहज ही डॉक्टर का मुंह खुल जाता था. सुनते जानते ऐसा अनुभव होने लगा मानो मृत्यु जैसे कोई परिचित या घर में रहने वाला सदस्य ही लगने लगी थी. मैंने सिर्फ प्रेम और मृत्यु को ही भुवनमय देखा. ‘
‘मेरी कहानी अब खत्म होने को आई और ज्यादा बड़ी नहीं है.’
मैं धीमे स्वर में बोला, ‘रात भी अब खत्म होने को आई.’
‘थोड़े दिनों से देख रही थी कि डॉक्टर बाबू थोड़े अनमने से नज़र आते थे. और मुझे ये बहुत ही अजीब लगता. एक दिन देखा वो बहुत साज सज्जा के साथ भईया के पास आये उनसे उनकी बग्घी उधार लेने, उन्हें रात में कहीं जाना था.’
‘मुझसे और रहा नहीं गया, सीधे भईया के पास पहुँच गयी और इधर-उधर की बात करते हुए पूछ लिया, हाँ दादा, डॉक्टर बाबू आज बग्घी ले कर कहाँ गए?’
संक्षेप में दादा बता दिए, ‘मरने’.
मैं बोली, ‘नहीं सच बताओ न.’
थोड़ा ही बताये, इस शादी से डॉक्टर को बारह हज़ार रुपये मिलेंगे.
‘लेकिन ये सब मुझसे छुपाने का तात्पर्य क्या, मैं क्या उनके पाँव पकड़ कर विनती कर रही थी कि ये विवाह मत कीजिये. ये काम करने पर मेरी छाती दुःख से फट जाएगी. पुरुषों को विश्वास करने का कोई उपाय नहीं. इस धरती पर मैंने सिर्फ एक ही पुरुष देखा है और एक ही क्षण में सारे ज्ञान की उपलब्धि हो गयी.’
‘डॉक्टर शाम को जब रोगी देख कर घर में आये तो मैं बहुत हँसते हुए बोली, ‘क्या डॉक्टर बाबू, सुना है आज आपकी शादी है?’
‘मुझे इतना हँसते हुए और खुश देख कर डॉक्टर सिर्फ अवाक हुए ऐसा नहीं, बल्कि दुखी भी हो गए.’
‘उनसे पूछा, ‘बाजा-बारात कुछ नहीं क्यों?’
‘सुनकर थोड़ा भारी श्वास लेते हुए बोले- शादी क्या इतना ही आनन्द-उत्सव का विषय है?’
सुनकर मैं हँसते-हँसते बेदम हो गयी. ऐसी बात पहले तो कभी नहीं सुनी. मैं बोली, क्यों नहीं, अभी तो बाजा चाहिए, रौशनी होनी चाहिए.’
‘भईया को इतना तंग कर दिया इस विषय को ले कर कि वो भी तब-के-तब सारी व्यवस्था-आयोजन करने में व्यस्त हो गए.’
‘मैंने सिर्फ एक ही बात करनी शुरू कर दी थी कि, दुल्हन घर में आएगी तो क्या-क्या करुँगी. डॉक्टर से पूछा, ‘अच्छा डॉक्टर बाबू शादी के बाद भी क्या आप इसी तरह रोगियों की नाड़ी देखते फिरेंगे.
‘हिहिहिहि, यद्यपि  इंसान का मन विशेषकर पुरुष का मन तो कभी दिखाई नहीं देता, फिर भी मैं कसम खा कर कह सकती हूँ कि ये बात उनके मन में शूल की तरह बिध गयी थी.’
‘देर रात शादी का लग्न था. शाम को डॉक्टर बाबू छत पर बैठ कर भईया के साथ दो एक पेग शराब पी रहे थे. दोनों को ही इसका अभ्यास था. धीरे धीरे आकाश में चाँद निकल आया.’
‘मैं हँसते हँसते हुए आई और बोली, ‘डॉक्टर बाबू भूल गए क्या, यात्रा का समय हो गया है.’
‘यहाँ एक बहुत ही सामान्य सी बात कहना बहुत ज़रूरी है. इस बीच मैं दवाखाना जा कर थोड़ा पाउडर इकठ्ठा कर लायी थी और उसी पाउडर का थोड़ा सा भाग सबकी आँख बचा कर डॉक्टर के गिलास में मिला दिया था. कौन सा पाउडर खाने पर इंसान की मृत्यु हो सकती है, ये डॉक्टर से ही सीखा था.’
डॉक्टर ग्लास में बची शराब गले में ढाल कर थोड़ा भीगे स्वर में मुझसे बोले, ठीक है तब चलता हूँ.’
‘शहनाई बजने लगी, मैंने एक बनारसी साड़ी पहनी, जितने भी गहने मेरे संदूक में थे सब निकाल कर पहन लिया, मांग में सिंदूर भरा. मेरे उस बगीचे के बकुल पेड़ के नीचे बिस्तर बिछाया.’
‘रात बहुत सुन्दर थी. चाँद की रौशनी से आकाश चमक रहा है. सोती हुई दुनियाँ की सारी क्लान्ति दूर कर देने वाली दक्षिणी हवा धीरे धीरे बह रही है. जूही और बेली फूल की खुशबु से पूरा बगीचा महक उठा है.’
‘शहनाई की आवाज़ जब क्रमशः दूर होती गयी. ज्योत्सना जब अँधेरे में बदलने लगी, जब ये पेड़-पत्ते, आकाश, पृथ्वी, घरद्वार, सब कुछ जैसे माया की तरह धीरे-धीरे विलीन होने लगी, तब मैं अपनी आँखों को बंद कर मुस्कुरा उठी.’
‘इच्छा थी कि जब लोग मुझे देखने आयें तो मेरे होठों पर ये नशा मिश्रित हंसी लगी रहे. इच्छा थी कि जब मैं अपने कोहबर में प्रवेश करूँ तो कम से कम चेहरे की इस हंसी को साथ ले कर ही प्रवेश करूँ.  कहाँ मेरा वो कोहबर! कहाँ वो शादी की साज-सज्जा! अपने भीतर ठक-ठक की आवाज़ से जाग कर देखा, मुझे ले कर तीन बच्चे अस्थिविद्या सीख रहे हैं! छाती के जिस हिस्से में सुख-दुःख धुकधुक करते थे और यौवन की पंखुड़ियां धीरे-धीरे खुल रही थीं, वहां छड़ी से दिखा कर कौन सी अस्थि को क्या कहते है मास्टर सीखा रहा है. और, जो अंतिम हंसी होंठो पर लिए हुए थी, उसका तो नामोनिशान तक नहीं रहा.’
‘कहानी कैसी लगी?’
मैं बोला, ‘कहानी तो बहुत अच्छी लगी.’
और तभी कौवे के बोलने की आवाज़ सुनाई पड़ी. मैंने पूछा, अभी भी यहाँ हो क्या?’ कोई जवाब नहीं मिला.
घर के अन्दर भोर की किरणों ने प्रवेश ले लिया था.
समाप्त