Showing posts with label मेरी कलम से. Show all posts
Showing posts with label मेरी कलम से. Show all posts

Wednesday, 13 September 2017

प्राचीन अपराध : बलात्कार




विषय कुछ नया नहीं बल्कि सदियों पुराना है. युद्ध और कब्ज़ा करने के युग का जब आरम्भ हुआ होगा शायद तब से ही बलात्कार होते चले आ रहे हैं. भारत में हमेशा से माना जाता रहा है कि बलात्कार तभी होता है जब स्त्री कि सहमति होती है या वही उत्तेजित करती है. उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कैसे जा सकता है इसलिए लांछना और सज़ा भी स्त्री को ही मिलती है.
क्यों भूल गये? अहिल्या को भी तो पत्थर बन जाना पड़ा था व्यभिचार का आरोप ले कर, जबकि धोखा इंद्र ने दिया था.
राजनैतिक बलात्कार से बचने के लिए ‘सती’ होने की प्रथा चल पड़ी. उच्च कुलीन स्त्री को भी सती कर देने का प्रचलन हो गया. कारण था कहीं पति के अभाव में व्यभिचार करने लगे तो सर्वनाश हो जायेगा. कुलीन स्त्रियाँ तब घर से बाहर शायद ही कभी निकलती थीं, तो डर किसका था? ज़ाहिर है अपने ही सगे-सम्बन्धियों का! पुरुषों की ऐसी प्रवृत्ति को बहुत ही सहज लिए जाता रहा है, समझा जाता है कि पुरुष ग्रंथी की इसमें अहम भूमिका है इसलिए ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं. स्त्री ही इसके लिए दोषी है.
युग बदला क़ानून भी बने लेकिन बलात्कार के प्रति मानसिकता नहीं बदली परिस्थति चाहे कुछ भी हो यहाँ तक कि बाल शोषण में भी यही माना जाता है कहीं-न-कहीं उसकी इच्छा थी तभी ऐसा हुआ.
बीसवीं सदी यूरोप में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का युग था. शुरुआत से ही बलात्कार को गंभीरता से नहीं लिया गया. बाद में जब इसके कारणों का विश्लेषण किया जाने लगा तब प्रतिपादित कर दिया गया कि स्त्री उकसाती है या इसकी कामना करती है तभी बलात्कार होते हैं. यानी जो हमारे देश में पहले से प्रचारित था उसे उन्होंने थ्योरी बना दिया.
बलात्कार कितनी बड़ी त्रासदी और कितने व्यापक रूप में समाज में स्थापित है इस पर यकीं दिलाने में स्त्रीवादियों को बहुत संघर्ष करना पड़ा. एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा था, बलात्कार कम या ज्यादा समझ बुझ कर की गयी वो धमकी है जो पुरुष महिलाओं को डर की स्थिति में बनाये रखने के लिए करते हैं.
मनोविश्लेषक निकोलस ग्रोथ ने 1979 में जेल में रह रहे सौ बलात्कारियों का अध्ययन कर अपने रिपोर्ट में लिखा था, बलात्कार के मुख्यतः तीन कारण होते हैं – sadism, anger or the desire of power यानी कुछ अपवाद छोड़ कर ज्यादातर बलात्कार यौनेच्छा से प्रेरित नहीं होती बल्कि ऐसा अपराध है जिसमें व्यक्ति को शारीरिक मानसिक पीड़ा दे कर दबाव में रखा जाता है, सबक सिखाने और आत्मतुष्टि का आनंद पाने के लिए होता है.
बेरहमी, स्वार्थ और लैंगिक भेद एक पुरुष को बलात्कारी में परिवर्तित कर देता है. हम यदि मान भी लें कि लैंगिक भेद मिटा दिया जायेगा तो भी स्वार्थ और नृशंस भाव से व्यक्ति आज तक उबर नहीं पाया. ऐसे में कानून बनने के बावजूद बलात्कार कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं.
आज हम ऐसे समय में पहुँच गये हैं जहाँ अख़बार ऐसी खबरों से ही भरे रहते हैं. अपराधी अब गैंग में होते है. पीड़िता को मार डालने में भी कोई डर या संकोच नहीं होता. ऐसे कृत्यों के साथ अब नया आयाम जुड़ा है तकनीक का. अब बलात्कारियों के पास बलात्कार सिर्फ ताकत दिखाने का ही जरिया नहीं बल्कि विडियो और फोटो वायरल कर पैसे कमाने का भी जरिया है. समाज में कुछ लोग ऐसे भी है जो ऐसे जघन्य यौनिक हिंसा के विडियो देखना बहुत पसंद करते है. एक बड़ा बाज़ार रियल रेप विडियो का है.
हम सोचते हैं क़ानून बनने और जागरूकता फैलाने के प्रयास के बावजूद ऐसे हादसे रुकना तो दूर कम होने का भी नाम क्यों नहीं ले रहे? तस्वीर बिलकुल साफ है – समाज में परपीड़ा से आनंद पाने वालों की संख्या कुछ कम नहीं, यही इसका असल कारण है. बलात्कार सिर्फ एक व्यक्ति पर हुए हमले का मुद्दा नहीं बल्कि उसकी पहचान छीन लेने का अपराध है. साथ ही सामाजिक सुरक्षा का भी प्रश्न है. आज हर परिवार अपने बच्चों और महिलाओं के प्रति अत्यंत असुरक्षा के भाव से आतंकित है. बलात्कार पर काबू नहीं पाया जा रहा लेकिन पीड़ित के प्रति संवेदना ज़रूर होनी चाहिए. पुलिस की भूमिका सबसे अहम है तुरंत कार्यवाही और सुनवाई के बाद सज़ा के लिए चार्जशीट जल्द ही प्रस्तुत करना होगा. सरकार द्वारा पीड़िता को पुनर्वास के लिए सहायता राशि भी प्रदान की जानी चाहिए.
क़ानून तो है बस तत्परता और संवेदना की अत्यंत आवश्यकता है. सारी घटनाओं के पीछे स्त्री को निम्न समझने की मानसिकता प्रमुख है इसे बदलने के लिए बचपन से ही नींव डालनी होगी.





Monday, 3 April 2017

पुलिस की डायरी


हर दिन नये चोर, नये डकैत, नये अपराध के तरीके से दो चार होना हमारा रोज़ का काम है. कभी कभी अपराध के कारण इतने ह्रदय विदारक होते हैं कि समझ नहीं आता असली अपराधी कौन है. जो सामने दिख रहा हो वो या जो मूल में छिपा है वो.

रात फोन की घंटी बजी, खबरी से लीड मिली मिराजुद्दीन की लापता लड़की का सुराग मिला है, उसे हैदराबाद के एक बहुत बड़े बंगले में रखा गया है. खबर मिलते ही हम हैदराबाद के लिए टीम और वर्क स्ट्राटेजी बना कर निकल पड़े. हम चार लोग थे, हैदराबाद पहुँच कर वहाँ की पुलिस की सहायता से उस बंगले तक पहुँच गये जहाँ आयशा के होने की खबर मिली थी. आलिशान बंगला था. बिना किसी जद्दोजेहद के हम आसानी से बंगले में घुस गये लग रहा था, इस काण्ड में संलित्प लोग भाग गये थे पुलिस से पहले चोर को ही खबर हो जाती है. अंदर प्रवेश करते ही देखा यहाँ की सज्जा बहुत ही सुरुचिपूर्ण थी. हर कमरे को किसी बादशाही कमरे का रूप दिया गया था. कालीन से लेकर झूमर तक सब एक से बढ़ कर एक. वहीँ एक कमरे में हमें आयशा मिल गयी.

बहुत महंगे कपड़े, सर से पाँव तक सौदर्य परिचर्चा साफ़ झलक रही थी. करीने से बंधे हुआ बाल नेलपॉलिश लगे नाख़ून.... चौदह साल की बच्ची आयशा बहुत खुबसुरत युवती लग रही थी. जब हमने उसे आयशा कह कर पुकारा तो उसने कहा, उसका नाम आयशा नहीं और वो अपनी मर्ज़ी से यहाँ रह रही है किसी ने उसे अगवा नहीं किया. जब हमने उसकी फोटो जो उसे पिता से मिली थी उसे दिखाया और समझाने पर उसने स्वीकार किया कि वो आयशा ही है तब हमने और देर न कर फ़ौरन उसे साथ ले अपने शहर रवाना हो गये. उसे उसके पिता के हाथ सुरक्षित सौंप दिया गया.

दो दिन बाद उसका पिता मिराजुद्दीन पुलिस स्टेशन की बेंच पर मुंह लटकाए बैठा मिला. मैंने पूछा क्या बात है मिराज सब ठीक तो हैं न, आयशा ठीक है न? उसने लगभग रोते हुए कहा... वो तो ठीक है लेकिन जाने उसे क्या हुआ है जब से आई है एक ही ज़िद पकड़े बैठी है उसे यहाँ नही रहना, उसे वापस हैदराबाद जाना है. उन्ही लोगों के साथ रहना है जो उसे ले कर गये थे.

जान कर बहुत आश्चर्य हुआ, उससे कहा कल बेटी को ले कर आना देखता हूँ, मैं उससे बात कर के उसे समझाने की कोशिश करूँगा.

दुसरे दिन आयशा अपने पिता के साथ मेरे पास आई. नज़रे झुका कर चुपचाप बैठी रही, मेरे किसी सवाल का जवाब देने को राज़ी नहीं. बस एक ही रट, उसे हैदराबाद वापस जाना है. मैंने कहाँ, ठीक है लेकिन पता तो चले कि तुम वहां क्यों वापस जाना चाहती हो जहाँ जा कर लड़कियां किसी भी तरह अपने घर वापस लौट आना चाहती है.

उसने कहा, आपसे अकेले में बात करुँगी, अब्बा को बाहर जाने कहिये. मैंने मिराजुद्दीन को बाहर बैठने कहा.

आयशा ने बताना शुरू किया जो लोग मुझे हैदराबाद ले गये थे उन लोगों ने मुझे बहुत अच्छी तरह रखा था. अच्छा खाने को दिया, अच्छा पहनने को दिया. सोने के लिए एक पूरा पलंग मेरे लिए था. यहाँ तो हम छह बहने और अम्मी ऐसे सोती हैं कि सारी रात करवट भी नहीं बदल सकते, एक साइड हो कर ही सोना पड़ता है ज़मीन पर. इतना छोटा सा एक कमरा और नौ लोग उसी में रहते, खाते, सोते हैं. एक ही खाट है जिस पर अब्बा और छोटा भाई सोते हैं. खाना दो वक्त किसी तरह जुट जाता है. मुझे हमेशा भूख लगती रहती है लेकिन अम्मी डांट देती है, घर में कुछ हो तब तो दे. लेकिन जितने दिन मैं हैदराबाद में थी भरपेट खाना खाती थी, पलंग पर सोती थी, जिधर चाहे करवट बदलो पंखा लाइट सब कुछ था. कितना आराम और सुख था वहाँ. यहाँ तो सिर्फ भूख और गाली है बस... मुझे फिर से वहीँ जाना है साहब.

भूख लाचारी का कैसे फायदा उठाते हैं ये मानव तस्कर. अच्छी ज़िन्दगी का सपना दिखा कर उठा लाये फिर कुछ दिन अच्छा खाना कपड़ा और सुख के दर्शन भी करा दिए जब लड़की पूरी तरह उनके जाल में फंस गयी तब एक दिन किसी अमीर शेख या ऐसे ही किसी आदमी को कुछ रुपये के एवज में बेच दी जाती है, उसके बाद जो ज़ुल्मों का सिलसिला शुरू होता है उसके बारे में तो उन्हें अंदाज़ा ही नहीं.

उसकी सारी बातें सुनने के बाद एक बार फिर काउन्सेलिंग के लिए भेज दिया. वहां से लौटने के बाद वो काफी सामान्य नजर आ रही थी. दुबारा फिर कभी मिराजुद्दीन को पुलिस स्टेशन पर नहीं देखा. बाद में सुना कि आयशा की शादी उसी बस्ती के फल विक्रेता से कर दी गयी है.

मानव तस्करी के बहुत से हिंसक और दिल दहला देने वाले किस्से अक्सर सुनने को मिलते हैं लेकिन लड़की भूख और गरीबी से तंग आ कर अपनी मर्ज़ी से जाने को जब तैयार हो तो समझ आता है पेट की आग के आगे संभवतः शरीर के घाव भी मायने नहीं रखते.


Monday, 27 March 2017

बिन ब्याही माँ की डायरी



नए दौर की नई कहानी, नई तकनीक पर अब नए प्रयोग होने लगे हैं। कभी शादीशुदा जोड़े ही छुप-छुपा कर सेरोगेसी के ज़रिये संतान हासिल कर रहे थे अब हमारे बॉलीवुड के अभिनेताओं ने एकदम ताज़ा उदाहरण पेश करना शुरू कर दिया है। बिना शादी ब्याह के झमेले में पड़े सेरोगेसी तकनीक से पिता बन जाओ। देश की ऐसी छुट-पुट खबरें पढ़ती हूँ तो 7 साल पहले के अपने देश भारत में बिताये दिन याद आते हैं। मेरी डायरी के पन्नों में वो सारे दिन आज भी ताज़ा हैं, लेकिन मैं सब पीछे छोड़ कर दूसरे देश निकल आई, आना ही पड़ा क्या करती! मेरे माता पिता भी मेरे निर्णय के विरुद्ध थे, आगे हम दो ज़िन्दगियों का सवाल था- यूँ ही बर्बाद नहीं कर सकती थी। चूँकि फैसला मेरा था, उसका परिणाम का भी मुझे ही करना होगा।
क्या सोचने लगे? कैसा फैसला कौन सी दो ज़िन्दगी?
सारे सवालों के जवाब मेरी डायरी में है आज कुछ पन्ने आपके लिए खोल देती हूँ।
करण जौहर की फ़िल्म कुछ-कुछ होता है की अंजलि याद है न, एकदम टॉम बॉय। खेलकूद कपड़ों की स्टाइलिंग सब कुछ लड़कों जैसा। दोस्त भी लड़के ही, हों भी क्यों नहीं अंजलि लड़कियों जैसी शर्मीली, कपड़े और ब्यूटी पर ध्यान देनेवाली लड़कियों जैसी थी ही नहीं। मैं भी बिलकुल अंजलि जैसी ही थी। एकदम बिंदास, बेफिक्र और अपनी मर्ज़ी से चलने वाली। मैं बाइक भी बहुत अच्छी चलाती थी लेकिन पापा की थी तो उन्हें बिना बताये छुपा कर चलाती थी। आपको वीनू पालीवाल याद है? वही प्रसिद्ध महिला बाइकर जिसे HOG रानी नाम दिया गया था, पिछले साल सड़क दुर्घटना में ही उसकी मौत हो गयी थी। मैं उनकी ज़बरदस्त फैन थी। सोचती हूँ वीनू को भी तो अपने बाइक प्रेम और लम्बी दूरी तक सड़क नापने की उत्कंठा ने क्या कुछ कम परेशान किया होगा? लड़की हो कर लड़कों की तरह अकेली ही बाइक पर दुनिया नापने निकल पड़ी समाज को तो बहुत खुजली मची होगी। लेकिन फिर भी वीनू पालीवाल ने अपने सपने को पूरा किया और अपने प्यारे हार्ले डेविडसन पर ही मौत को गले लगा लिया।
एक बार मैंने भी रेगिस्तान में बाइक रैली में हिस्सा लिया। वहाँ पहुंची तो देखा एक मेरे अलावा दूसरी कोई भारतीय लड़की रैली का हिस्सा नहीं थी लेकिन विदेशी लड़कियां कई सारी थीं।अनोखा अनुभव था जीवन भर याद रहेगा। वैसे मेरा तो पूरा जीवन ही एडवेंचर बन गया है।
कॉलेज खत्म कर के मैंने एक एडवरटाइजिंग एजेंसी ज्वाइन कर ली। यहां का माहौल कम-से-कम मेरे कपड़ों और पिक्सि हेअरकट आदि पर प्रश्न चिन्ह लगाने जैसा नहीं था। मुझे मेरी तरह जीने के लिए दूसरों के इज़ाज़त की ज़रूरत नहीं थी।

आज सालों बाद मुझे मेरे कॉलेज की सहेली स्मिता मिली। शादी कर के खुश है पति अभी अमेरिका में रह रहा है अगले साल लौटने पर दोनों ने परिवार बढ़ाने का सोचा है। उससे मिल कर ख़ुशी और एक नई बेचैनी के साथ मैं घर लौटी।
नींद नहीं आ रही, बार बार करवटें बदल रही हूँ और अंदर एक आवाज़ मुझे बेचैन किये जा रही है। मैं माँ बनना चाहती हूँ। हाँ, ये मेरे अंतरात्मा की आवाज़ थी।
जानती हूँ आप मेरी इच्छा पढ़ कर मन-ही-मन मुझे कोसते हुए कह रहे हैं, अगर इतनी ही इच्छा थी माँ बनने की तो किसी से शादी कर लेती या किसी गरीब अनाथ को ही घर ले आती। पूण्य भी होता और किसी बच्चे को परिवार मिल जाता।
आपको क्या लगता है, मेरे माँ-पापा ने मेरी शादी करवाने की कोशिश नहीं की? उन्होंने तो बहुत कोशिश की लेकिन किसी ने मुझे पसंद ही नहीं किया। मेरे बहुत से दोस्त है लेकिन कोई मुझे अपनी पत्नी रूप में नहीं देखना चाहता। मैं बाइक चलाती हूँ कभी भी देश की किसी भी प्रान्त में रैली के लिए निकल जाती हूँ , मर्दाने तरीके के कपड़े पहनना ही पसंद करती हूँ। शादी की पात्रता अनुसार मैं कहीं से भी खरी नहीं उतरती। पात्रता हासिल करने के लिए मुझे खुद को बदलना पड़ेगा या सही पात्र हूँ इसके लिए दिखावा करना होगा, जैसे कि अंजलि ने अपना प्यार किसी दूसरे के साथ देख अपनी जीवन शैली में बदलाव कर लिया था। मैं इसके लिए राज़ी नहीं।
वीनू पालीवाल मेरी प्रेरणा, उनका भी तलाक हो गया था सिर्फ इसलिए की उनके पति को उनका बाइक चलाना और दूर-दूर निकल जाना पसंद नहीं था। कितना कठिन है खुद को मार कर दूसरे की ज़िद और झूठे अहंकार के लिए जीते जाना।
अगर मैं बच्चा गोद लेती तो इसमें मेरा कृतित्व कहाँ रहता? नौ महीने अपने अंदर पलनेवाले शिशु का वो अनुभव कैसे मिलता! इसीलिए मैंने तय किया कि कृत्रिम गर्भधारण कर मैं माँ बनूँगी।

मेरी एक इच्छा ने मेरे आस-पास भूचाल ला दिया। माँ-बाप रोना पीटना शुरू कर दिए, दिन रात मुझे कोसते कि दुनिया में इतनी लड़कियां पैदा होती हैं, एक अच्छा और स्वाभाविक खुशहाल जीवन जीते हुए माँ बाप को कृतार्थ करती हैं; एक उनके ही भाग्य क्यों फूटे निकले जो उनकी बेटी ऐसे नियम विपरीत चलने की ज़िद पकड़े बैठी है। स्मिता ने समझाने में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया। उसने समाज का डर दिखाया….. गर्भधारण के बाद कैसे मैं सबके सामने रोज़ आना-जाना करुँगी? कैसे ऑफिस में सबकी नज़रों और सवालों का सामना करुँगी? सभी चरित्र पर ऊँगली उठाएंगे कैसे उनका मुंह बन्द होगा? ऐसे निर्णय सेलिब्रिटी लें लोग प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते उनके जीने के कई रास्ते हैं लेकिन मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की ऐसा कदम उठाये तो स्थिति दर्दनाक हो जायेगी। कितने ही उदाहरण खोज-खोज कर निकालने लगी सिर्फ मुझे समाज के बनाये नियम विरुद्ध कदम उठाने से रोकने के लिए।
मैंने उससे कहा, तुम क्या सोचती हो? मैंने तय नियम के अनुसार माँ बनने की कोशिश नहीं की, लेकिन हर बार रिजेक्ट कर दी गयी क्योंकि मुझे अपना आत्मसम्मान विसर्जित करना मंज़ूर नहीं था। अब मैं माँ बनने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा ले रही हूँ तो इसमें क्या गलत है? मैं किसी को ठग नहीं रही। किसी के साथ झूठे सम्बन्ध भी नहीं बना रही। माँ बनने में अपराध कहाँ है और मैं तो माँ बन सकती हूँ और उसका पालन पोषण भी कर सकती हूँ फिर इसमें किसी को क्या परेशानी होगी? स्मिता के पास मेरे तर्क का कोई जवाब नहीं था या शायद माँ बनने की मेरी लालसा इतनी बलवती हो गयी थी कि अब कोई विरोध सुनना ही नहीं चाहती थी।
आखिर वो दिन भी आ गया जब मेरे माँ बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। प्रयोग सफल रहा। अब मेरे जीवन की एक बड़ी इच्छा पूरी होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। महीने गुज़रने लगे। शरीर में परिवर्तन होने लगा था मेरा पेट अब नज़र आने लगा था। लोगों की तिरछी नज़रें व्यंग्य बाण और सवालों से परेशान हो कर माँ-पापा ने घर से निकलना ही छोड़ दिया। मैं इसके लिए तैयार थी इसलिए चुभती नज़रों और व्यंग्यों से बेपरवाह अपने रास्ते चलती रही।
अपने गर्भ के छठे महीने में मैंने ऑफिस में सबको बुला कर एक छोटी सी टी पार्टी दी और खुलासा किया की न तो मेरे साथ प्रेम प्रसंग में कोई धोखा हुआ है और न ही किसी ने बलात्कार किया है और न ही छुप कर मैंने शादी कर ली है। मैंने माँ बनने की इच्छा को पूरा करने के लिए साइंटिफिक तरीके से स्पर्म इंसेमिनेशन करवाया है जिसमे किसी भी प्रकार से पुरुष शरीर के संपर्क में आने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
उस दिन के बाद सहकर्मियों की फुसफुसाहट बन्द हो गयी, भले ही  मेरे अनुपस्थिति में बातें होती हों पर मुझे सुना कर नहीं।
दिन बीतते गए और फिर तृप्ति का जन्म हुआ। सचमुच गर्भधारण के बाद बच्चे के बढ़ने से ले कर प्रसव पीड़ा सब कुछ वैसा ही था जैसे सामान्य तरीके से माँ बनने पर होती है। फर्क सिर्फ यही था कि तृप्ति सिर्फ मेरी थी। मैं ही उसकी अकेली अभिभावक।

देखते-देखते तृप्ति प्ले स्कूल जाने लायक हो गयी। एडमिशन में खास परेशानी नहीं हुई बस पिता के नाम की जगह खाली देख कई स्कूलों ने वापस लौटा दिया। थोड़ी कोशिश के बाद एक प्ले स्कूल में एडमिशन मिल ही गया। तृप्ति की बहुत सी पसंद मेरे जैसी ही है उसे गुड़िया से ज़्यादा गाड़ी और स्पोर्ट्स में दिलचस्पी है। छोटी सी तृप्ति अब अपनी माँ और अपनी आया नीरू मासी के अलावा भी दोस्त बनाने लगी है; रोज़ नई चीजें सीखती और नए सवाल ले कर घर आती। अभी तो शुरुआत थी, तृप्ति को अभी अपनी माँ का अपने लिए चुने हुए जीवन की बहुत सी जवाबदेही पूरी करनी बाकी थी।
जब तृप्ति को बड़े स्कूल में एडमिशन करवाना था तो ये भी किसी युद्ध से कम नहीं रहा। हर जगह तृप्ति अपने टेस्ट में पास हो जाती लेकिन मैं तृप्ति की माँ इंटरव्यू के दौरान फेल कर दी जाती क्योंकि तृप्ति के पिता का परिचय नहीं था। अंत में सोर्स लगा कर ही तृप्ति का एक अच्छे स्कूल में एडमिशन हो सका।
स्कूल से आ कर तृप्ति पूछती , माँ मेरे सब दोस्तों के पापा हैं मेरे क्यों नहीं है?
ये पहला सवाल था जिसकी उम्मीद भी थी मुझे और मैं इसके लिए तैयार भी थी। मैं तृप्ति से किसी भी तरह का झूठ नहीं कहना चाहती थी लेकिन बातों को ठीक से समझ सके इसके लिए सही उम्र का इंतज़ार ज़रूरी था।
आज मैंने उसके प्रश्न का जवाब दिया,  नहीं बेटा तुम्हारे कोई पापा नहीं है सिर्फ माँ है।
मेरे दोस्त कहते हैं मेरे पापा मेरे साथ नहीं तब ज़रूर स्टार हो गए हैं।
नहीं तृप्ति तुम्हारे पापा स्टार नहीं हुए तुम अपने दोस्तों से कहना तुम अपनी माँ की इच्छा से इस दुनिया में आई हो।
ठीक है माँ मैं सबको यही बताऊँगी कि तुमने भगवान से प्रार्थना की थी तभी उन्होंने मुझे तुम्हारी बेटी बना कर भेजा।
आज का सवाल-जवाब यहीं पर खत्म हो गया।
तृप्ति खुद को दूसरे बच्चों से अलग न समझे इसलिए मैंने पता नहीं कब खुद में परिवर्तन लाना शुरू कर दिया था। अब मैं कभी-कभी सलवार कुर्ती और साड़ी पहनती थी, बाल भी कन्धे तक लम्बे कर लिए थे। अलग-अलग डिश बनाना तो तृप्ति को खुश करने के लिए मेरा सबसे पसंदीदा काम हो गया था।

आज ऑफिस से लौट कर देखा तृप्ति उदास है उसने बताया कुछ बच्चे एकसाथ मिल कर उसे उसके पिता न होने के कारण चिढ़ा रहे थे। वो कहते हैं तृप्ति और तृप्ति की माँ झूठी है, पापा स्टार भी नहीं बने साथ भी नहीं रहते तो फिर कहाँ हैं? कोई जवाब न दे पाने के कारण तृप्ति स्कूल में रोयी भी थी।
मेरा कलेजा फट रहा था छोटे बच्चे भी ग्रुप बना कर कितने निर्दयी व्यवहार करना सीख जाते हैं! मैंने तृप्ति को फिर समझाने की कोशिश की। उसे बताया तुम ट्यूब बेबी हो।
वो क्या होता है माँ?
उसके मासूम से सवाल के जवाब में स्पर्म बेबी समझाना और उसके लिए समझना दोनों ही कठिन था इस उम्र में।
मैंने कहा, थोड़ी बड़ी हो जाओ फिर मैं तुम्हे समझा दूंगी; अभी चलो तुम्हारे पसंद का कस्टर्ड बनाया है खा लो।

निष्ठुर दुनिया किसी को अपनी मर्ज़ी का जीवन शांति से जीने नहीं दे सकती उसमें दखलंदाज़ी किये बिना जीवन को प्रभवित किये बिना उसे चैन नहीं।
एक दिन तृप्ति स्कूल से लौट कर बोली माँ मिडिया प्रेस क्या होता है?
उसके सवाल ने मुझे मानो अँधेरे कुंए में धकेल दिया जहाँ तरह-तरह की आवाजें गूंज रही हैं, लेकिन कोई मेरी आवाज़ नहीं सुन रहा। मैं समझ गयी कि अब तृप्ति को एक स्वाभाविक ज़िन्दगी देने के लिए मुझे फौरन ये शहर और जितनी जल्दी हो सके इस देश को भी छोड़ कर निकलना होगा।

मीडिया के सवाल-जवाब और समाज की छींटाकशी मेरी बेटी का जीवन नर्क बना देगी। मध्यम वर्ग को तय किये रास्तों पर ही चलना होगा उसके बाहर अपनी मर्ज़ी से कदम रखने की कीमत मैं तो चुकाने के लिए तैयार थी लेकिन मेरी बेटी को भी चुकाना पड़े इसके लिए मैं तैयार नहीं।
विधवा अकेली औरत, भीख मांग कर दूसरों के सहारे जीवन गुजारती औरत इस समाज को मंज़ूर है। पति से प्रताड़ित होती औरत के आंसू समाज को मंज़ूर हैं, संतान सुख न दे सके ऐसा पति भी समाज को मंज़ूर है लेकिन कोई आत्मनिर्भर औरत अपनी मर्ज़ी से अपनी एक संतान पैदा करे इसे स्वीकार करना सीखने में अभी भी इस समाज को बहुत देर है।
मैंने जल्दी ही वो शहर छोड़ दिया और साल भर के अंदर ही नई नौकरी के साथ कनाडा शिफ्ट हो गयी। यहां तृप्ति को रोज़ ऐसे सवालों का सामना नहीं करना पड़ता तृप्ति और तृप्ति की माँ मैं, हमदोनों दुनिया के सबसे सुंदर रिश्ते माँ और संतान के रिश्ते के बेहद सुखद पलों को जी रहे हैं।
मैं अपने देश अपनी संतान के साथ लौटना चाहती हूँ। वो दिन भी ज़रूर आएगा जब तुषार कपूर, करन जौहर की तरह तृप्ति की माँ को भी समाज ख़ुशी-ख़ुशी अपनाएगा। सवालों के कठघरे में खड़ा नहीं करेगा।




Friday, 20 January 2017

प्रेमी की डायरी


मेरा एक कवि मित्र है। फेसबुक पर उसकी लम्बी फैन फॉलोविंग लिस्ट भी है, किताबें भी छप रही हैं। उसने एक दिन बताया था- यार! जब दिल टूटा था तो खूब रोया आंसू पोंछ-पोंछ कर हाल-ए-दिल कागज़ पर उतारा  तब पता नहीं था नाकाम मोहब्बत मुझे इतना काम का बना देगी। अब तो शुक्रगुज़ार हूँ उसका कि मुझे छोड़ गयी अब अपने ज़ख्मों को ही कुरेद-कुरेद कर शेर लिखता हूँ। ये दर्द ही अब मुझे मज़ा देता है यार!

आज कुछ ऐसा हुआ कि लगा अपनी ज़िन्दगी की डायरी का वो पन्ना आपके लिए खोल दूँ जिसमें मेरे भी असफल प्रेम से शुरू कर सफल जीवन के सफर का रहस्य छिपा है। कोई नहीं जानता पर मैं गवाह हूँ अगर प्रेम असफल न होता तो मैं कभी व्यवसाय में सफल न होता।
मैं…. मैं शेखर और मेरी बुलबुल.... हाँ ! उसका नाम बुलबुल ही था मेरी प्रेरणा-मेरा असफल प्रेम! कवि मित्र की तरह मेरे जीवन में भी ऐसा ही टर्निंग पॉइंट आएगा सपने में भी नहीं सोचा था। मैं तो लेखक, शायर, कवि कुछ भी नहीं एक मामूली सा मास कम्युनिकेशन में एम्.ए  फिर भी सच्चा प्रेम, असफल जीवन को भी सफल बना गया।
दस साल पहले जब बुलबुल ने मेरा परित्याग किया और एक प्रवासी सॉफ्टवेयर इंजीनियर से शादी कर विदेश चली गयी तब मन के भीतर उमड़ती ज्वाला से पागलों की तरह दर-बदर भटकने लगा। नींद की गोलियां इकठ्ठा कीं, रेल पटरी पर कट जाने की सोचा और भी वो सब करने की व्यर्थ कोशिश की जो इस तरह के केस में पागल प्रेमी करते हैं! अंत में डॉक्टर और मनोचिकित्सक तक की शरण लेनी पड़ी लेकिन कुछ फ़ायदा नहीं हुआ।
एक दिन मेरा दोस्त सुधाकर मुझे बोला, प्राणायाम करने से मन की सारी गांठ खुल जाती है। अगर तुम ठीक होना चाहते हो तो चलो मेरे साथ, मैं एक सिद्ध योग गुरु को पहचानता हूँ वो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे। मरता क्या न करता चल पड़ा नए गुरु की खोज में।

गुरुजी व्यस्क पुरुष थे लम्बा कद, तना हुआ शरीर, चमकती त्वचा। उन्हें देखते ही लगा था यहां ज़रूर मेरे भविष्य को राह मिलेगी। ध्यान में बैठते ही चारों ओर बुलबुल ही बुलबुल दिखायी देने लगी मानो प्रोजेक्टर फिट कर दिया गया हो। ऑंखें बन्द करूँ तो बुलबुल, ऑंखें खुली रखूं तो भी बस वही नज़र आती। उस हालत में दीर्घस्वास और अंदर से घुमड़कर निकलता आंसुओं का ज्वार मेरे लिए स्वास नियंत्रण व्यायाम करना कठिन कर दे रहा था लेकिन गुरु जी ने कहा कि जैसे होता है वैसे ही करो!
इसी तरह शुरू हुआ मेरे जीवन का एक नया अध्याय।
व्यायाम ने कुछ ही दिनों में मुझे बुलबुल से थोड़ी दूरी बनाने में कामयाब कर दिया। योग, व्यायाम, प्राणायाम की जटिल दुनिया ने मुझे जैसे आत्मसात कर लिया था। साथ ही थोड़ा जिम का तड़का भी लग गया और यही सब करते-करते दिमाग भी खुलने लगा। मास कम्युनिकेशन की डिग्री ले कर अब इधर-उधर नौकरी की उम्मीद में भटकने से भी कुछ खास हासिल नहीं होने वाला था। सोचा, नौकरी के लिए कहीं भटकने क्यों जाऊँ? इसी लाइन में अगर कुछ किया जाये तो कैसा हो? हाँ, इसी तरह खुद से सवाल-जवाब करते-करते एक दिन मेरे अंदर कुछ कर गुज़रने की आग धधक उठी और मैंने निर्णय ले लिया।
ज़्यादा डिटेल्स में न जा कर शार्ट में ही बताता हूँ एक कमरे के साथ मैंने ध्यान,योग, व्यायाम, प्राणायाम का एक सेंटर खोल लिया। फिर धीरे-धीरे उसे बढ़ा कर जिम भी जोड़ लिया। क्रमवार इसमें ब्यूटी पार्लर और उससे जुड़ी अन्य सुविधाओं और सेवाओं का भी प्रसार किया। इन सबके पीछे कितना खून-पसीना, उत्तेजना, उत्कण्ठा और संघर्ष आदि रहा ये बताने की ज़रूरत नहीं; क्योंकि ये सब उतनी ही मात्रा में था जितना सभी के साथ रहता है।
मेरी इस सक्सेस स्टोरी के पीछे सबसे बड़ा हाथ किसी का है तो वो है मेरी बुलबुल का। उसके परित्याग और उससे पैदा हुआ मेरा पागलपन, विरह, दुःख, यादों की प्रताड़ना ये सब अगर न होता तो मेरे अंदर वो आग भी कभी नहीं धधकती जो आज मुझे इस मुकाम तक ले आयी। तभी तो हर रात सोने से पहले नियमित मैं बुलबुल का ध्यान कर के ही सोता हूँ।
इन दस सालों में हर उम्र की महिला मेरे संपर्क में आयी, पार्लर में कर्मचारी भी महिला हैं, लेकिन कभी किसी भी स्त्री से निकटता की कोई सम्भावना मैंने पनपने ही नहीं दी। दिनभर महिलाओं के साथ ही काम करना पड़े तो एक्स्ट्रा इम्युनिटी की ज़रूरत होती हैं इसलिए हर रात मैं तीन से पाँच मिनट रोज़ बुलबुल का ध्यान करता हूँ। गुरु जी ने भी कहा था बेटा, अपने ब्रह्मचर्य का ध्यान रखना इसलिए भी स्त्री का जीवन में प्रवेश निषेध था। लेकिन आज….
आज दस साल बाद वो मेरे सामने थी मेरे पार्लर के कस्टमर के रूप में। वो जिसे मैंने अपनी सफलता का मन्त्र बना लिया था बुलबुल!
दस सालों में पंद्रह के.जी ओवरवेट और डबल चिन हो गयी है मेरी अभ्यस्त और अनुभवी आँखों ने तुरन्त ताड़ लिया। लेकिन आँखें- वो तो वैसी ही है। मुझसे बात करते हुए भी वैसे ही चमक रही थी जैसे पहले चमका करती थी और मैं उसी चमक में अपना सितारा देखा करता था लेकिन आज बुलबुल की आँखों में मेरा वो सितारा नहीं दिख रहा था, लग रहा था वो सितारा टूट कर शायद मन्नत पूरी कर गया। अब सूनापन ही शेष है।
मानता हूँ प्रेम रूप निर्भर नहीं, प्रेम का गहरा अर्थ और अस्तित्व है लेकिन रूप भी तो इसकी एक आइडेंटिटी है। जैसे बुलबुल की आँखों का वो सितारा अब मेरे लिए नहीं चमकता तो क्या मेरा प्रेम उस चमकते तारे से था जो उसकी आँखों में चमकते थे? आज इतनी बेचैनी क्यों है? पता नही! पर आज रात से मैं क्या करूँगा पाँच मिनट का वो ‘मैडिटेशन फॉर सक्सेस’ क्या अधूरा रह जायेगा? बुलबुल की आँखों में अब वो मेरा वाला चमकता तारा नहीं जो मुझे इतने साल रोज़ दिखता रहा।
क्या मुझे नई प्रेरणा फिर से तलाश करनी होगी? क्या पुराना प्रेम बरसों बाद फिर से सामने आये तो भी पुराना वक़्त नहीं लौटता!
समय कितना निर्दयी है! सब जानते हैं लेकिन मानता कोई नहीं- यही सबसे दुखद विषय है।
बीते समय की बुलबुल पिंजरे से कब की आज़ाद हो चुकी!!

Saturday, 17 December 2016

मिशन : जवाब



ईशानी माँ के आपत्ति जताने पर एकदम चुप सी हो गयी थी क्योंकि वो आधुनिक विचारधारा की  लड़की होने के बावजूद उच्चश्रृंखल कभी नहीं हो पायी थी लेकिन पिताजी ने उसका समर्थन किया था बोले,
ये नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं इसमें जीवन के अनुभव भी होंगे, ईशा को ये नौकरी ज़रूर करनी चाहिए.

ईशा हमेशा से ही अपने सेफ जोन के बाहर निकल कर निर्णय लेती है. दरअसल माँ पापा दोनों के ही कामकाजी होने के कारण बहुत बार बहुत से निर्णय उसने खुद ही लिए हैं, कम से कम अपने निर्णय उसके अपने ही होते हैं.
ईशा टीवी, सोशल नेटवोर्क से ज़्यादा लोगों से मिलना, भीड़ भरी जगहों मे जाना अधिक पसंद करती है. उसकी तलाश ऐसे लोगों या ग्रुप ही होने लगी जो लोगों से आमने सामने बातें करना पसंद करता हो. इसी तलाश ने यूनिवर्सिटी पहुँचते ही कॉलेज यूनियन का सदस्य बना दिया. माँ ने यूनियन का सदस्य बनी जानकर पहले पहल ये ही सोचा की शायद गर्ल्स कॉलेज की एकरसता दूर करने के लिए लड़कों से दोस्ती की है लेकिन पिता ने बिलकुल सही पकड़ा, ईशा के सपने और आदर्श भी बड़े हो रहे हैं इतने दिनों के एकांकीपन को दूर करने के लिए ही वो इसके ज़रिये बहुत से लोगों से एक साथ जुड़ना चाह रही है. उसके अन्दर लोगों को जानने की उनके साथ उनकी समस्याओं में खड़े होने की ललक है. पापा जब ये सब माँ से कह रहे थे तब ईशा ने भी सुन लिया उसे गर्व हो रहा था उसके पिता कितनी अच्छी तरह अपनी बेटी को समझते हैं. एक बार पापा ने यूँ ही बाते करते हुए उससे कहा था, सिर्फ इन्सान पहचानने से नही होगा अपने देश को भी पहचानना पड़ेगा. तभी से इस बात को ईशा ने सीरियसली लिया था.

लेकिन कुछ ही दिनों में राजनीति से उसका का मन उबने लगा, लोगों के दोहरे चेहरे से रूबरू होते ही उसे अवसाद सा घेरने लगा, जिसकी वजह से वो राजनीति से जुडी उसी ने उसे स्वार्थीपन और दोहरा चरित्र दिखा दिया. केतकी यूनियन की सबसे एक्टिव मेम्बर थी. हर जुलुस या भाषण में सबसे आगे रहती. कार्यक्रम खत्म होने के बाद सबसे पहले वो अपने फोटो देखती और चुन-चुन  कर ही अच्छे फोटोस फेसबुक और दूसरी जगह छपने भेजती. ऐसा करने के पीछे कारण था की पता नही कब किसी एन आर आई की नजर उस पर पड़े और उसकी किस्मत चमक जाये. ईशा  को बहुत आश्चर्य हुआ, उसने कह भी दिया तुम यूनियन, जायज़ मांगों के लिए करती हो या इसे शादी के विज्ञापन का मंच समझ कर फिर ईशा को आश्चर्य भी थी जिसका खुलासा उसने केतकी से पूछ कर ही कर लिया, तरुण से तुम्हारा रिलेशनशिप....  ये बात तो पूरा कॉलेज जानता है! केतकी कुछ देर चुप रह कर जवाब में बोली, तरुण मेरा पार्टनर है हर पार्टनर लाइफ पार्टनर नही हो सकता.
फिर भी एक रिलेशन रहते रहते .... ईशा ने अपनी बात अधूरी ही छोड़ दी.
जीवन में हर जगह ही पॉलिटिक्स है जहाँ खेल सको खेल लो. पॉवर हाथ में आने से ही मलतब है! पहले पंचायत चुनाव जितने के बाद पार्टी सोचती है ज़िला परिषद की जीत उसके बाद विधानसभा वहाँ जीत मिलते ही लोकसभा ...... जीवन में भी यही तो होता है पॉलिटिक्स से जीवन अलग है ही कहाँ!
 ईशा के लिये ये पह्ला और कड़वा सबक था.

बात उसके दिल को लग गयी थी उसने इस बात का ज़िक्र अपने कुछ ख़ास दोस्तों से भी किया था बात उड़ते उड़ते केतकी के कानों तक पहुँच ही गयी. उसके बाद से उसका का रवैया ईशा के प्रति एकदम बदल गया. अब उसका एक ही टारगेट रहता मौका मिलते ही ईशा को सबके सामने बेइज्जत करना.
ऐसे मुश्किल समय मे सिर्फ एक ही लड़का था जो ईशा के फेवर मे बोलता था. तुषार...

तुषार ब्रिलिएंट लड़का है लेकिन अपने हिप्पीनुमा कपड़ों और बाल की वजह से सभी को यही लगता कि वो अपने कैरिअर को सीरियसली नहीं लेता इसलिए कोई उसके समर्थन को भी ज्यादा तवज्जो नहीं देता था. लेकिन अपनी बातों, सिगरेट गांजा और गिटार के साथ बेसुरे गाने से पता नहीं कैसे उसने दोस्तों की अच्छी खासी भीड़ जमा ली थी.
इस बार भी छात्र यूनियन नेता के रूप में केतकी और ईशानी के बीच कैंडिडेट केतकी को ही चुना गया, ईशा को कोने में ले जा कर बताया गया की नेता निर्वाचन के समय ग्लैमर का भी ध्यान रखना पड़ता है जो की केतकी में है.
घर आ कर बहुत रोई थी, इसलिए नही की उसे कैंडिडेट नही चुना गया बल्कि इसलिए की क्रन्तिकारी बातों को सुन कर दोहराने के लिए भी एक ऑर्गेनाइजेशन लुक्स देखता है! उसे रोता देख पापा ने कहा था, ‘ इस चेहरे को देख कर लोग मेरी बेटी को पहचाने ये मैं नही चाहता, मैं चाहता हूँ तुम्हे तुम्हारे काम के लिए सब पहचाने. एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा मुझे पूरा विश्वास है.’
काम करना चाहना या सोचना और काम करने मैदान में उतरना दो एकदम अलग बातें है इतने दिनों में ईशा ये बात समझ गयी थी. काम करने पर कदम कदम पर बाधा और षड्यंत्र का सामना करना पड़ता है. इतनी नक्लियत भरी है यहाँ देश का भला कोई करे भी तो कैसे? यही सवाल ईशा ने अपने पिता से भी किया था.
देश तुम्हारे लिए क्या है? कौन है? क्या तुम्हारे यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफ़ेसर और छात्र? नहीं ईशा देखना हो तो मई के महीने में बाहर निकल कर रिक्शा पर बैठना उस रिक्शेवाले को पचास को नोट पकड़ाना, देखना वो काट कर बीस ही लेगा बाकि वापस कर देगा. वो भी तुम्हारा देश ही है. यही जवाब उस दिन पापा से मिला था.

पिताजी की कही वही बात दिमाग में घूम रही थी जब स्काइप पर दिए इंटरव्यू का जवाब आया. उन्होंने शर्त रखी थी कि पहले दो साल उसे कभी छतीसगढ़ तो कभी झारखंड या फिर उड़ीसा के रिमोट एरिया में भी रहना पड़ेगा. तनख्वाह उन्होंने अच्छी ऑफर की थी. परीक्षाएं खत्म हो गयी थी और उसे एमफिल या पीएचडी करते हुए यूनिवर्सिटी में रहने की अब कोई इच्छा नहीं थी. वो घर से दूर या शहर से दूर जा कर नये लोगों में अनजाने लोगों में अपनी पहचान खोजना चाहती थी. माँ पिताजी स्टेशन छोड़ने आये माँ के साथ साथ पिताजी को भी देखा, उनकी भी आँखें भर आयी थी ईशा का भी मन हो रहा था कि कस कर उन्हें पकड़ ले लेकिन निर्णय को अब अंजाम देने का समय आ चुका था कमजोर पड़ कर उन्हें चिंता में नहीं डाल सकती थी इसलिए चुपचाप अपनी आँखों में आते आंसू को थाम लिया. ईशा ट्रेन में बैठ कर इन बातों को सोच रही थी.

 अब ईशानी के पास पिछली यादों से ज्यादा आने वाले भविष्य के बारे में सोचने को बहुत कुछ था. मध्यभारत के एक अनजान से स्टेशन पर ट्रेन रुकी और तुली अपने बैग सूटकेस के साथ उतरी, कई लोगों को उसने देखा अपनी बकरी और सर पर लकड़ी का बोझा ले कर जा रहे हैं. लहरों की तरह बने छत पर
मायावी धुप शाम होने का आभास देती हुई जाने की तैयारी में है मन मोहने वाले दृश्य देखते हुए ईशा मन ही मन तुलना करने लगी, फेसबुक और ट्विटर की बनायीं आभासी दुनिया से जिते जागते लोगों की दुनिया कितनी अलग है यही तो उसकी दुनिया है जो उसे पैदा होते ही तोहफे में मिली है यही तो उसका भारत है जहाँ वो काम करना चाहती है.

देखते-देखते दो महीने गुज़र गए इस बीच ईशानी ने आस-पास के बीस गाँव घूम लिए और उनके नाम भी याद हो गये है. उसका एन.जी.ओ जिस जगह पर था वो इलाका थोड़ा सा विकसित था. आस-पास के गाँव से कुछ बड़ा या ज्यादा खरीदना हो या डॉक्टर दिखाना हो तो वहीँ आते थे. अभी भी इन इलाकों के लोग आदिवासी जड़ी-बूटी और टोने-टोटके पर ही निर्भर हैं लेकिन धीरे -धीरे लोगों की सोच बदल रही है लोग नई पद्धति को भी अपना रहे हैं. इस बदलाव के पीछे जितना व्यक्ति के खुद का हाथ है उतनी ही भूमिका राष्ट्र की भी है ईशा को ऐसा ही लगता था. यूनिवर्सिटी में रहते हुए उसके दिमाग में जाने कैसे ये बात बैठ गयी थी की राष्ट्र वो राक्षस है जो इन्सान का सर चबा कर खा जाता है. लेकिन अपने एन.जी.ओ के लिए काम करते हुए जब उसने आँखों के सामने लोगों को अस्पताल में चिकित्सा पाते, सरकार द्वारा मुहैया करायी गयी सुविधाओं को पाते हुए देखा तो उसकी ये धारणा बदलने लगी. हाँ कुछ गफलत है, चोरियां है डकैती भी है लेकिन भारत ने अपने नागरिक के लिए कुछ नहीं किया ये जो लोग कहते हैं सरासर झूठ बोलते हैं.


तब ये मान लो की मैं झूठ कह रहा हूँ हाथ में खैनी रगड़ते हुए तुषार ने कहा. कितने दिन हो गए अपने घर मोहल्ला यहाँ तक की अपने शहर का कोई नहीं दिखा, ऐसे में तुषार को देख कर ख़ुशी में आपा ही खो बैठी थी. उसका आतिथ्य कैसे करे, क्या करे ये सोच कर ही परेशान हो रही थी ईशा. तुषार ने उसे समझाया, चिंता मत करो मैं सिर्फ आज ही तुमसे नही मिला, अभी यहाँ बहुत दिन रहना है इसलिए मिलना होता ही रहेगा.

ये मिलना हर बार एक झगडे का रूप ले लेता था जब तुषार कहता तुम यहाँ आई हो पैसोवालों के लिए काम करने, वो तुम्हे पैसा देते है उनके काम के लिए और मैं यहाँ आया हूँ तुम्हारे देश के सबसे गरीब तबके को बचाने.

गरीबों को क्या हम नहीं बचा रहे. दिन रात इन्ही कारणों से हम यहाँ दूर दूर गाँवों में भटकते हैं भोर होने से पहले निकल कर देर रात वापस लौटती हूँ sanitization से ले कर आदिवासी बच्चो का टीकाकरण सब कुछ करने का प्रयास कर रहे. इनकी ज़रूरतों को समझ कर सरकारी महकमों में चिठी-पत्री लगातार करती रहती हूँ. क्या ये सब काम नही.

जोर से अट्टहास कर उठता तुषार कहता वैक्सीन! किस चीज़ का वैक्सीन. अपने सरकार को दो न ऐसा वैक्सीन. तुमलोग यहाँ आये हो ज़मीन से जुड़े इन साधारण लोगों का जीवन नष्ट करने.

- मेरा देश.... मेरा देश क्या तुम्हारा देश नहीं?
- नहीं ईशा मेरा कोई देश नहीं...जहाँ इंसान पर अत्यचार हो रहें हो ऐसे किसी भी देश का मैं प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता. मैं जानता हूँ तुम मन लगा के यहाँ काम करती हो. तुम्हारी तस्वीर अख़बार में भी छपी थी.
- मेरी तस्वीर? मैंने तो नहीं देखा!
- जानता हूँ , ये देखो कह कर तुषार ने एक पुराने अख़बार का टुकड़ा उसके सामने फैला दिया. उसमे ईशानी और उसके एन.जी.ओ के साथियों की तस्वीर थी नीचे प्रसंशात्मक कैप्शन.
- देख कर ईशा ने कहा मैं सचमुच नहीं जानती थी....
- उसकी बात काट कर तुषार बोला, लेकिन जानने के बाद पिघल मत जाना. याद रखना किसी व्यक्ति के लिए कुछ करना तभी सफल होता है जब उसे उसकी तरह ही रहने दिया जाये. बदल डालने की मुहीम न चलाया जाये. बदलने से वो फिर कभी अच्छा नहीं रह सकता.
- क्या तुम जानते हो, इस अंचल में बहुत से लोग बसंत आते ही आत्महत्या करते है, सिर्फ यहाँ ही नहीं झारखण्ड में भी यही देखा गया है. पहले मैं सोचती थी की ये लोग प्रेम प्यार के चक्कर में ऐसा करते होंगे लेकिन बाद में पता चला ,कारण कुछ और है. जाड़े में पेड़ के पत्ते झड़ जाते है और गर्मी से पहले पत्तों में प्राण नही आते. इन बीच के महीनों में जो लोग पत्ते चुन कर अपनी आजीविका चलाते हैं वो भोजन के अभाव में मारे जाते हैं. हमलोगों ने उन लोगों ले लिए भत्ते के लिए सरकार के पास आवेदन दिया है और रेगुलर इस बारे में काम करने के लिए हाजरी भी देते है, क्या ये गलत है? सौ बेड का एक अस्पताल खुलवाया है क्या ये गलत है? हाँ उन कामों को करने के लिए मुझे मुझे ऑफिस से एक तनख्वाह मिलती है लेकिन इससे काम तो.... कहते कहते ईशा की आवाज़ भर्रा गयी.
- मैं एक बार भी नही कह रहा कि जो तुम कर रही हो वो ख़राब है, तुम्हारी जैसी लड़की कभी कोई ख़राब काम कर ही नहीं सकती. लेकिन एक बार ये सोच कर देखो की जो तुम अच्छा सोच कर कर रही हो क्या वाकई उससे आगे अच्छा ही होगा?
- मतलब? ईशा आखों से आसूं पोंछ कर तुषार की ओर देख कर पूछी.
- ये जो चकाचक रास्ता तैयार हो रहा है. यहाँ क्या होगा? बड़े अमीर लोग आयेंगे फार्म हाउस बनायेंगे अपनी अय्याशी का सामान जुटाएंगे यही तो होगा न? इससे इन गांव वालों का क्या लाभ? जंगल को जंगल ही रहने दो. मुझे मेरा अतीत लौटा दो!
- लेकिन अतीत लौटाना यानि साँप के काटे आदमी को जलसमाधि देना और कोलेरा से गाँव के गाँव उजाड़ होने देना होगा.स्कूल कॉलेज कुछ नही होगा. पिछड़े हुए लोगों को और पिछड़ने देना होगा.
-एक गहरी सांस छोड़ते हुए तुषार ने कहा, तुम अपने सपनों को इन निरीह लोगों के जीवन में कॉपी पेस्ट करना चाह रही हो.पाँव में जूते मोज़े मुंह में सिगरेट और इंग्लिश स्लैंग ये मेरे तुम्हारे जैसे मध्यम-आय वर्ग के सपने हो सकते हैं उनके नहीं.क्योंकि यही लालच दिखा कर बार बार उन्हें ठगा गया है और यूरोपियन स्टाइल में उन्नयन करने के बहाने जंगल के किनारे हर कोने पर एक-एक झोपडी बना देंगे पुलिस पोस्ट के नाम पर जैसा की सारंडा में हुआ.
- तुम्हारा सर! ब्रिज बनाने के बहाने पूरे इलाके पर कब्ज़ा करने की चाल चली गयी है.
- लेकिन नदी का पानी तो भयंकर रूप लिया था पिछली बार कितने ही लोग मारे गये. मवेशी ख़त्म हो गये. स्थिति भयावह हो उठी थी.
- तो मरे.... इन्सान मरे! जानवर मरे! फसल बर्बाद हो. प्रकृति के हाथ नष्ट हो जाने दो फिर प्रकृति ही दुबारा गढ़ेगी सब कुछ. वनवासी वन में ही सुंदर लगते है.
- ब्रिलियंट तो सारे विदेशों में हैं! तुम अमेरिका क्यों नही गये? ईशा अचानक ही ये सवाल कर बैठी.
तुषार दो घडी चुप रहकर दोनों हाथों से अपन मुंह ढक कर रों पड़ा. उसके बाद स्तब्ध खड़ी ईशा के सामने अपना मोबाइल बढ़ा कर बोला देखो, कुछ समझ आ रहा है?
- ईशा मोबाइल हाथ में ले कर देखी. साफ़ कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. सिर्फ एक फटे कपडे का टुकड़ा एक बोतल और बिखरे हुए खून के अतिरिक्त. उसने मोबाइल वापस कर दिया लेकिन कुछ बोल नहीं सकी.
- तुम्हारे सी.आ.र.पी.ऍफ़ ने क्या किया है देखो. आमजनों को माओवादी से सुरक्षा देने आये है लेकिन खुद ही भक्षक बने बैठे है. यहाँ ये नाबालिग लड़कियों का बलात्कार करते है उन्हें मार डालते है. इसी तरह रोज़ कितनी ही लड़कियां इनकी शिकार होंगी अगर हम समय रहते इनका विरोध कर इन्हें यहाँ से भगा नहीं देते.
- वो लोग तो यहाँ ब्रिज तैयार करनेवालों को सिक्यूरिटी देने के लिए तैनात किये गये है. ऐसा ही सुना है.....
- और जो आदिवासी लड़की रेप के बाद मार दी गयी उसकी सिक्यूरिटी कौन लेगा? इस बारे में सवाल नही करोगी तुम? तनख्वाह पर काम करती हो इसलिए उनके सपोर्ट में बात करोगी!
- तुली का शरीर मानो जल उठा, उसने कहा , नही! चुप नही रहूंगी. बताओ मुझे क्या करना होगा?
- मुझे नेतृत्व देना होगा क्योंकि जब एक लड़की किसी लड़की के अधिकार के लिए आवाज़ उठाती है तो विरोध का स्तर ही अलग होता है. तुम आगे रहना हमलोग पीछे रहेंगे, फिर देखते हैं वो शैतान जीतते है या हम! लेकिन ये सब करने में तुम्हारी नौकरी अगर.....?
- लात मारती हूँ ऐसी नौकरी पर! ईशानी उत्तेजना में उठ खड़ी हुई.
- मैं क्या झांसी की रानी को देख रहा हूँ अपने सामने? कहते हुए तुषार उठ खड़ा हुआ.
तुषार ईशानी के बिलकुल करीब आ कर खड़ा हो गया और प्यार से उसके गाल पर हाथ रखा. ईशा खुद को संभाल नही पाई और उससे लिपट कर रो पड़ी.

****** ******

तुषार से लिपट कर अपने प्यार का इज़हार करने के ठीक एक साल एक दिन बाद ईशानी  यूनिवर्सिटी से एम्फिल की क्लास से निकलते हुए गेट के पास उसने तुषार को देखा. इतनी देर में पृथ्वी अपनी धुरी पर तीन सौ पैंसठ दिन पूरे कर के आ गयी. और इस समय चक्र में ईशानी  का जीवन कितनी बार चक्कर खा-खा कर घुमा है अब उसे याद भी नहीं. लेकिन चक्कर खाते हुए उसने इसे-उसे कितनों को ही देखा पर कभी तुषार उसे नजर नहीं आया.

- देखती कैसे?..... मैं तो तब अमेरिका लौट गया था लेकिन मैं वहाँ से भी नजर रखता था, इन्टरनेट पर तुम्हारे बारे में आलोचना, प्रतिक्रिया और टीवी पर भी तुम्हारे बाईट. विश्वास करो तुम्हे फोन करने की बहुत इच्छा होती थी लेकिन तुम नाराज़ हो सोच कर फोन करने की हिम्मत नही कर पाता था. उसके बाद तो तुमने मोबाइल नम्बर भी बदल लिया. ईशानी और तुषार रेस्टोरेंट में आमने-सामने बैठे थे.
- मैं तुम्हारी बातों का कोई सर-पैर नहीं समझ पा रही, हाँ उस दिन इस तरह तुम्हारे भाग जाने का कारण भी नही समझ पाई थी.
- भागा नहीं, काम हो गया था इसलिए चला गया था. सुनो ईशा, अब तुम्हे सब कुछ सच बताने का समय आ गया है. मैं एक बहुत बड़े मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता हूँ और उसी के सिलसिले में उस पिछड़े जगह मेरा कुछ दिनों का प्रवास था. वहाँ ज़मीन के नीचे सोना है विशाल भंडार, हमारी कंपनी के रिसर्च टीम ने ही उसे खोज निकाला है. अब अगर तुम्हारी सरकार और तुम्हारी दयालु एन.जी.ओ वहां जनकल्याण कार्यक्रम चालाये तो हम वो ज़मीन नीलामी में खरीदेंगे कैसे? भारत का सोना हमारे हाथ कैसे आएगा इसलिए वहाँ एक अशान्ति का माहौल तैयार करना बहुत ज़रूरी हो गया था.
- क्या बोल रहे हो तुषार! तुम्हे मुझे यूज़ किया? एक लड़की जो तुमसे प्यार करने लगी थी उसे तुमने....
- एक्साक्ट्ली! तुम्हारा मेरे लिए वो प्यार समझ पाया था तभी तो उसे इस्तेमाल कर पाया. इससे मेरी कंपनी का एक बड़ा खर्च बच गया.
- मतलब?
- एक लड़की जब प्रेम करने लगती है तो वो अकेली ही सौ के बराबर हो जाती है, ऐसा नही होता तो क्या तुम एक दूसरी लड़की के लिए सी आर पी ऍफ़ कैंप के सामने माइक ले कर चीखती? अनशन पर बैठती? तुम्हे ज़बरदस्ती उठाने आये पुलिस के गाल पर यूँ थप्पड़ मार सकती? मुझे किसी भी समय स्टेट्स वापस लौटना हो सकता था इसीलिए मैं जानबूझ कर किसी मामले में डायरेक्ट इन्वोल्व नहीं होता था. लेकिन तुम्हारे हर काम की खबर रखता था बस. तुम्हारी पहली तस्वीरें तो मैंने ही सोशल साइट्स पर वायरल की थी, एक फेक अकाउंट से.
- क्या बोल रहे हो?
- पूरी तरह से नकली नहीं थी. दारू पी कर लड़की के साथ हुए बवाल की तस्वीर में थोड़ा फोटोशॉप किया और मेरी बातों में फेर-बदल और पहुँच गया पुलिस के पास. इसका नेट रिजल्ट क्या आया जानती हो?
सरकार ने वहां से अपने सारे प्रोजेक्ट्स विथड्रा कर लिये और वहाँ पुलिस नही रखने पर लोकल चोर सारा बालू सीमेंट ले कर हवा..... बस अब कुछ ही दिनों में वो इलाका हमारा होगा. एक तीर से कितने शिकार कर लिए बोलो तो... बोल कर तुषार बेशर्मी से दांत निकाल दिया.
- हाँ एक शिकार मैं भी थी. मुझे सब कुछ छोड़ कर घर वापस लौटना पड़ा.किसी को कुछ भी न बता कर इस तरह आन्दोलन में उतर पड़ने के कारण मेरे एन.जी.ओ ने मुझे निकाल दिया और उस घटना की वजह से अभी नई नौकरी मिलना भी मुश्किल है. क्रांतिकारी को कौन नौकरी देगा?
- अरे! नौकरी मैं दूँगा. इस दुनियां में सच्चे क्रांतिकारियों के लिए कोई नौकरी है ही नही कारण वो सब नौकरी अब मेरे जैसे झूठे क्रांतिकारियों के कब्ज़े में है. बोल कर तुषार हंस पड़ा.
- लेकिन तुमने जो किया है उसके बाद....
- वो मेरा एक असाइनमेंट था, और इसीलिए आज मेरिलैंड में मेरा अपना एक बंगला है. मेरिलैंड कहाँ है जानती हो? वाशिंगटन के पास. मेरे पास दो गाड़ियां है मैं कितने डॉलर सैलरी पाता हूँ जानती हो?
- क्या करुँगी मैं जान कर?
- गृहस्थी तुम्हे ही संभालनी है तो तुम्हे ही जानना होगा अपने पति की इनकम.
- फिर से ब्लफ देना शुरू किये?
- नही नही ईशा, ब्लफ नही, सच कह रहा हूँ. तुम मुझे अपने माँ पापा के पास ले चलो मैं उनसे ही बात करूँगा इस बारे में. तुम्हे बहुत मिस करता हूँ, तुमने इतना विश्वास किया था मेरा और मैंने तुम्हे धोखा दिया. मैं अपनी बाकी ज़िन्दगी उसी तरह तुम पर विश्वास कर के बिताना चाहता हूँ जैसा तुम मुझ पर करती थी. मैं तुम्हारा साथ चाहता हूँ ईशा, तुम मेरे साथ मेरे देश चलो.
- तुम्हारा देश? अमेरिका?
- जो देश मेरी कीमत नहीं जानता, मेरे टैलेंट को नही पहचानता ऐसा देश मेरा कैसे होगा बोलो तो? हाँ, मैं जहाँ जन्मा हूँ वहां कभी-कभी घुमने फिरने आ ही सकता हूँ.
- इस बार भी कोई असाइनमेंट ले कर आये हो? बोल कर पहली बार वो हंसी.
- नहीं इस बार तुम्हे ले जाने आया हूँ. मुझे खाली हाथ मत लौटाना. आई लव यू ईशा!
- मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ तुम्हारे साथ मेरिलैंड जाना भी चाहती हूँ बट ....

- बट??
- मैं पहले ही तुमसे शादी कर के वहाँ नही जाऊँगी. तुम्हे पहचानने के लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए. मुझे ऐसे ही ले जाना चाहो तो ले चलो लेकिन तुम्हे हस्बैंड मानने में मुझे थोड़ा वक्त लगेगा.
- पागल हो क्या तुम. लोग शादी को ही स्वीकृति देते हैं और तुम हो की लिव-इन रिलेशन में रहना चाहती हो?
- ऐसी एक पागल को अपनी ज़िन्दगी के साथ क्यों जोड़ना चाहते हो?
- क्योंकि इस पागल के बिना मेरी ज़िन्दगी ही अधूरी है.
तुषार ने अपने हाथ ईशा के गाल पर रखा, लेकिन इस बार उसके शरीर में कोई हरकत नहीं हुई.

टीवी पर ईशानी को देख जैसे चौंकी थी उसकी माँ आज उसकी बातें सुन कर ठीक वैसे ही चौंक पड़ी उसके निर्णय को सुन कर. जो पिता उसके हर निर्णय में साथ देते थे आज वो भी इसके लिए राज़ी नहीं लेकिन ईशानी उस पर अटल रही.
इधर तुषार ईशा को साथ ले जाने के लिए हर संभव उपाय करना शुरू कर दिया था. ईशानी की सीवी कई यूनिवर्सिटी में अप्लाई किया तब जा कर एक यूनिवर्सिटी से कुछ स्कालरशिप के साथ एडमिशन की व्यवस्था हो पायी.
- इसके बाद तो मेरे लिए तुम्हारा बहुत रुपया खर्च होगा वहां, ईशा फोन पर बोली.
- रुपये नही डॉलर! लेकिन ये मत भूलो जो भी मिला है सब तुम्हारी वजह से. हाँ एक बात और इंडिया फिनडीया मेरे लिए मैटर नहीं करता बस तुम करती हो. इफ यू वांट देन ... शादी न होने तक तुम्हारे लिए हॉस्टल एकोमोडेशन भी देख लेता हूँ.
ईशा हंस कर बोली, इंडिया की लड़कियां अब काफी एडवांस हो गयी है मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी.
ईशानी की बात सुनकर पीछे खड़े उसके पिता हैरान हो गये और फोन के उस पार तुषार भी.

******                                   ******
 तुषार के हैरान होने के अभी कई मौके और आने वाले थे. अमेरिका की पुलिस जब उसे हथकड़ी पहना कर रास्ते से लेकर गाड़ी तक ले गयी. उस पल तक भी इस मायावी रहस्य से निकल नहीं पाया था. कम से कम दो साल के लिए जेल हो सकती है ये जानकर टूट गया था वो, तब उसने पूछा था आखिर मेरा अपराध क्या है?
- एक लड़की से बिना शादी किये उसे हायर एजुकेशन के सपने दिखा कर धोखे से इंडिया से अमेरिका ले आना और उसके बाद उससे मेड सर्वेंट के काम करवाना..... पुलिस ऑफिसर ने उसकी बात का जवाब दिया.
- क्या मतलब? तुषार के सर पर मानो आकाश ही टूट पड़ा.
  जवाब के बदले तुषार को कुछ फोटोग्राफ दिखाए गये. उनमे से किसी में ईशा तुषार के जूते पोलिश कर रही है तो किसी में उसके घर में खाना बना रही है तो किसी फोटो में बर्तन धो रही है वो भी डिश-वॉशर में न डाल कर अपने हाथों से और एक फोटो में तुषार ईशानी के हाथों से किताब छिन रहा था. बाकी तस्वीरें कब ली गयी उसे नहीं पता लेकिन किताब हाथ से लेने की घटना उसे याद थी. ईशा दिन रात यू.एस लॉ की किताबें पढ़ती थी तब एकाध दिन ऐसा भी हुआ की मैंने उसके हाथ से किताब छिन कर कहा था, अब सो जाओ और कितना पढ़ोगी आँखे ख़राब हो जाएगी लेकिन उस समय फोटो कैसे ली गयी ये समझ नहीं आ रहा? तुषार खुद से बुदबुदाते हुए कहा.
-ये तो नहीं बता सकता लेकिन ये जानता हूँ की उस लड़की ने फ़ेडरल लॉ बहुत अच्छे से पढ़ी है. आपका निकलना मुमकिन नहीं. बहुत ठंडी आवाज़ में पुलिस सार्जेंट ने जवाब दिया.
अमेरिका के अलग-अलग राज्य में अलग अलग नियम हैं मेरिलैंड में नियम थोड़ा ज्यादा ही सख्त है इसलिए तीन साल की सजा हो गयी उसे. तुषार सोच रहा था की उसे जेल भेज कर वो देश जा कर सबको मुंह कैसे दिखाएगी? जब जज ने उससे पूछा की वो अपना कोर्स पूरा करना चाहती है या नहीं तो उसने स्पष्ट जवाब दिया, उसे जितनी जल्दी हो सके अपने देश वापस जाना है.
इस पूरी घटना से वो इतना ही हतप्रभ हो गया था की कोर्ट रूम में वो कुछ भी नहीं बोल सका. सिर्फ एक बार ईशानी से पूछा था, तुमने ऐसा क्यों किया?
उस दिन ईशानी ने कोई जवाब नहीं दिया.
ईशानी के अपने देश लौट जाने के बाद जेल में कई हाथों से घूमते हुए एक छोटी सी पर्ची तुषार के हाथ आई थी.
उसमे एक ही लाइन हिंदी में लिखी थी.
‘मुझे गलत मत समझना प्लीज, ये मेरा एक असाइनमेंट था.’








Thursday, 1 December 2016

तुम्हारा इंतज़ार है......

कहानी : तुम्हारा इंतज़ार है.....





अभी अभी गोविंदपुर स्टेशन पर उतरी. पहली बार इस स्टेशन पर उतरना हुआ. किसी काम से नहीं, आई हूँ एक वादा निभाने. किसी को पच्चीस साल पहले किया वादा. वो कहता था वादा रखना भी ईमानदारी है सिर्फ रूपये पैसों में ईमानदारी रखना ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य नहीं हो सकता. आज मैं उससे सीखी इसी इमानदारी का मान रखने आई हूँ. हमारे संक्षिप्त से सम्बंधकाल में ज्यादा वादों का आदान प्रदान नही हुआ, जो हुआ उसमे से ये भी एक था.

जब मेरी ट्रेन आ कर रुकी तो स्टेशन एकदम सुनसान सा था लगा जैसे मेरे अलावा यहाँ और कोई है ही नहीं. एक चायवाला तक नज़र नहीं आया. इंतजार करना हो तो चाय का साथ सबसे बढ़िया होता है लेकिन वो भी नहीं. ऐसा लगा कि ये स्टेशन भारत का हिस्सा ही नही, चायवाला न दिखे ऐसा तो किसी स्टेशन में नहीं होता. अचानक कुछ लोग दिखाई पड़े तेज़ी से चलते चले जा रहे है, जैसे कुछ छुट न जाये ऐसी तेज़ी. अब अस्त व्यस्त सा एक छोटा झुण्ड बन गया. लगा इस झुण्ड में अर्जुन दिखाई पड़ा. क्या ये भ्रम था? जब किसी के बारे में ही सोचते रहो उसका ही इंतजार हो तो शायद ऐसा ही होता होगा. कितने साल गुज़र गए अर्जुन को नहीं देखा, जाने कैसा दिखता होगा अब. उस भीड़भाड़ में एक बार झांक आई लेकिन वो नहीं दिखा. स्टेशन आज भी वैसा ही है जैसा 25 साल पहले था निर्जन लेकिन खुबसूरत. प्लाटफॉर्म से ही ऊँचे पहाड़ और उस पर हरे हरे पेड़ दिखाई देते है. पेड़ के पत्ते भी कितने रंग ले कर रहते है ऐसा लग रहा जैसे पहाड़ किसी किशोर लड़के की तरह हेयर कलर से अपने बालों में कई रंग सजाए हों स्टेशन में भी कुछ पेड़ है जो इस समय फूलों से लदे है. इस सौन्दर्य को उस समय भी ऐसे ही देख कर मुग्ध हो गयी थी और तय कर लिया था की एक दिन ज़रूर यहाँ आऊँगी.


इंतजार का वक्त भी न यादों की रेल चलाता है. बैठे बैठे एक बार फिर 25 साल पुराने उस गुज़रे समय से फिर गुज़रने लगी. हम दिल्ली जा रहे थे बीच में ही गोविंदपुर स्टेशन पड़ता है. थोड़ी देर के लिए ट्रेन रुकी, मैं बाहर झांक कर देखने लगी ‘देखो कितनी सुन्दर जगह है, ऐसा सौन्दर्य की मन कर रहा यही उतर जाऊं. देखो न..’

अर्जुन झांक कर देखा और बोला, ‘ वाह! वाकई बहुत सुन्दर है मेधा. गोविंदपुर स्टेशन’  बाहर लिखे बोर्ड को पढ़ते हुए अर्जुन बुदबुदाया.
‘मैं यहाँ फिर आना चाहूंगी.’
‘कब?’ अर्जुन पूछा.
‘हम्म! आज से ठीक 25 साल बाद. तुम और मैं, चाहे जैसे भी हालात हों कुछ भी हो हम यहाँ ज़रूर आयेंगे. समझ लेना उस दिन हमारा प्रेम दिवस होगा. हमारे प्यार की 25वीं सालगिरह. हो सकता है तुम तब भी राजनीति में सक्रीय रहो और इस विशाल जनमानस में बसने की कोशिश में फिर मेरे लिए समय न मिल पाए. जानते हो तुम्हारे लिए मुझे हमेशा डर ही लगा रहता है. तुम याद रखोगे न आज की तारीख और ये प्रतिज्ञा..’
‘मैं वादा करने पर निभाता ज़रूर हूँ. बेईमानी करने के लिए भी हिम्मत की ज़रूरत होती है लेकिन उससे भी ज्यादा हिम्मत चाहिए भावनातमक ईमानदारी को बचाए रखने के लिए. मैं उसी ईमानदारी में विश्वास करता हूँ.’
‘घर में क्या बोल कर आई?’ अर्जुन ने सवाल किया.
‘झूठ बोल कर.... मैंने कहा की एक प्रोजेक्ट है उसी के लिए दिल्ली जाना होगा. अरुणा और अनुभा को बोल आई हूँ घर में फोन मत करना. तुम्हारी तरह तो मेरा कोई पार्टी का काम नहीं हो सकता न. क्या करूँ?’ मैंने मुस्कुरा कर जवाब दिया.

अर्जुन मेरे से एक साल सीनियर था, कॉलेज में आते ही रैगिंग में फंसी. मैं एक बहुत छोटे से एक शहर की लड़की, बड़े शहर की लडकियों से अलग हाव-भाव और पहनावे की वजह से तुरंत पहचान भी ली जाती थी और मुझमें शहरी लड़कियों जैसी न हो पाने के कारण एक हीनताबोध भी था जो व्यक्तित्व पर नज़र भी आता था. सीनियर लड़के लड़कियों ने तरह-तरह के सवाल करने शुरू किये और मजाक बनाना भी. मैं लगभग रो ही पड़ी थी तभी अर्जुन आगे बढ़ आया और मुझे सबके बीच से बचा ले गया. कॉलेज में उसकी अच्छी चलती थी स्टूडेंट यूनियन का लीडर था. सभी उसकी बात मानते थे. यहीं उससे मेरा पहला परिचय हुआ. छोटे शहर की लड़की होने की वजह से जो जड़ता मुझमे थी उसका उसे भान था उसने धीरे धीरे मेरी हीनभावना को कब आत्मविश्वास में बदल दिया पता ही नहीं चला. शायद उसका साथ ही मेरा आत्मविश्वास था. कॉलेज फंक्शन में हिस्सा लेना, गाना आता था लेकिन इतने लोगों के सामने गाने का साहस अर्जुन ने ही दिलाया था.

अर्जुन स्टूडेंट यूनियन का नेता था , वाम नेता. मैं हमेशा सोचती की इतने बड़े कॉलेज में पढने वाले लड़के लड़कियां ज़्यादातर अमीर घर से थे वो लोग कैसे वाम नेता को वोट देते है, लेकिन ये भी सच था की हर बार जीत वाम की ही होती थी. राजनीति में मेरी दिलचस्पी सिर्फ अखबार पढने तक ही थी पर अर्जुन के साथ ने राजनीति में सक्रीय भी कर दिया. कभी रैली तो कभी धरना देने के कार्यक्रम में अर्जुन के साथ जाने लगी. उस समय मैं कुछ ऐसी हो गयी थी की उसके किसी बात को ‘ना’ कहने की शक्ति मुझमे नहीं थी. कई बार ऐसा भी हुआ की पुलिस लाठी चार्ज शुरू हो गया चारो ओर अफरा तफरी का माहौल, ऐसे में अर्जुन उतनी भीड़ के बीच से भी ठीक मुझे निकाल कर दौड़ लगाते हुए पहले सुरक्षित स्थान पर पहुंचा कर फिर उस जगह पहुँच जाता.
मैं अर्जुन के लिए अक्सर डरी रहती थी पता नही कब पुलिस की गोली या लाठी लगे और.... उसे कुछ हो गया तो....
देखते ही देखते मैं कॉलेज से यूनिवर्सिटी पहुँच गयी. इतनी सक्रियता के बावजूद मैं अपनी पढाई समय पर पूरी कर लेती थी, लेकिन अर्जुन पढाई पर ध्यान नही दे पाता था. उसके नोट्स मुझे ही दूसरों से कॉपी कर-कर के उसे देने होते थे. वो बहुत मेधावी था लेकिन राजनीति करने के लिए उसने कभी पढाई पर ध्यान नहीं दिया बस हायर सेकंड डिवीज़न जितना ही अपना परसेंटेज बनाये रखता था. वो चाहता तो बहुत अच्छे नंबर ला कर टॉप भी कर सकता था किसी अच्छी जगह नौकरी का सुअवसर भी कोई उससे छिन नही सकता था लेकिन उसने सब छोड़ कर राजनीति में ही अपना भविष्य देखा. ये राजनीति भी न नशा होती है, एक बार लग गयी तो फिर छुटती नहीं.

अर्जुन और मैं कभी अकेले में नही मिले थे, जब भी मिलना होता कॉलेज कैंटीन में बहुत सारे लड़के-लड़कियों के बीच राजनीति पर ही बात करते हुए. हमारी अपनी कोई अलग बात नही होती थी. हाँ सबके बीच कभी कभी कभी हौले से वो मेरी ऊँगली छू लेता. और मुस्कुरा कर मेरी आँखों में झांक लेता था, जाने क्या हो जाता मैं घबरा कर आँखे नीची कर लेती थी. लेकिन तब भीड़ में  सबके बीच होते हुए भी सबसे अलग होने का अनुभव बिना पंखों के ही उड़ने की इच्छा जगाने लगता..

कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच ही एक दुसरे के साथ थोड़ा सा बिताया गया समय हमारे लिए प्रेम भरे दिन थे. एक दिन भी अगर बिना बताये अर्जुन गायब रहे तो मेरे मन की भटकता ही रहता, कहीं से कोई खबर उसकी मिल जाये बस इसी तोड़ जोड़ में दिन गुज़र जाता. ऐसे ही एक दिन अर्जुन सारा दिन गायब रहा. कोई खबर नहीं कहाँ है. मैं बार बार कॉलेज कैंटीन की तरफ जाती की शायद् नजर आ जाये या किसी को उसके बारे में कुछ पता हो. लेकिन कुछ पता नही चला. शाम को भारी क़दमों से सोचते हुए चुपचाप बस स्टॉप की ओर चली जा रही थी की अचानक अर्जुन सामने खड़ा हो गया. हँसते हुए कहने लगा, ‘मेरे बारे में सोचते हुए चलोगी तो बस के अन्दर नहीं नीचे चली जाओगी. मैं भी मौत का सामान ही हूँ.मुझे हमेशा साथ ले कर चलने की चिंता मत करो.धमाका हो जायेगा.’ उस दिन उसकी बात पर और उसे देख कर मैं हंस नहीं पाई थी. एक अजनबी डर मन में घर बना लिया. आँखों में नाराज़गी और आंसू दोनों झाँकने लगे.अर्जुन उस दिन बस में न जा कर जबरदस्ती मुझे ऑटो में साथ ले गया. पूरे रास्ते मैंने उससे बात नहीं की. ऑटो रुका तो सामने पार्क था अर्जुन ने मुझे वहीँ उतरने को कहा. बिना कुछ कहे मैं चुपचाप वहाँ उतर गयी.

आज पहली बार कॉलेज कैंटीन के बाहर हम एक साथ बैठे थे. मेरा गुस्सा आन्सुनो में फुट कर बह निकला. थोड़ा शांत होने के बाद मैंने उससे कहा, ‘तुम बिना बताये ऐसे क्यों गायब हो जाते हो मन बेचैन होने लगता है. बुरी आशंकाओं से दिल बैठा जाता है लेकिन ये सब बातें तुम्हे समझ ही कहाँ आती है.’

पहली बार उसने मेरा हाथ अपने हाथो में लिया.कुछ देर हमदोनो चुपचाप उस लम्हे को महसूस करते रहे. खोमोशी अर्जुन ने ही तोड़ी, कहा – ‘ मेधा! अब तुम्हे इन चिंताओं से मुक्त होना होगा.अब मेरे और तुम्हारे रास्ते अलग होने का समय आ गया है. विश्वास करो मुझे भी तुमसे उतना ही प्यार है जितना की तुम मुझसे करती हो लेकिन इस प्यार के लिए जो क़ुरबानी देनी होगी वो मैं नहीं दे सकता. जितना प्रेम तुम्हारे लिए है ठीक उतना ही प्रेम मैं उन लोगों से भी करता हूँ जो समाज के सीसी दर्जे में दर्ज नहीं होते, हमेशा से शोधित वंचित और पल पल मरने को मजबूर हैं. मुझे उनके पास जाना होगा उनके साथ खड़ा होना होगा. उनके लिए लडाई लड़नी है. उनके जीवन के लिए संघर्ष करना है. इन सबके साथ मैं तुम्हे ले कर नहीं चल सकता. पता नही कब कौन सी गोली मुझे आ कर लगेगी और उस दिन सब खत्म. तुम्हे देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं होगा. न घर न संसार न ख़ुशी... कुछ भी नहीं.
मैं तुम्हे कभी भी सुखी विवाहित जीवन का वादा नहीं कर सकता. बल्कि कहना चाहता हूँ तुम पढाई ख़त्म कर के अपना अच्चा भविष्य बनाना और एक अच्छे लड़के से शादी भी कर लेना. चाहो तो इसे भी मेरा आदेश ही समझ लो.
मुझे अब यहाँ से चले जाना होगा. एक नये लक्ष्य, नई जगह, नये नाम और पहचान के साथ.आज के बाद मेरा तुमसे कोई सम्पर्क नहीं होगा.जानने की कोशिश भी मत करना.मर गया तो शायद टीवी और अख़बार के ज़रिये तुम तक खबर ज़रूर पहुँच जाएगी.
तुम्हे छोड़ कर जाने के लिए तुम मुझे माफ़ कर सकोगी न मेधा!

बहते आंसुओं के साथ अर्जुन की सारी बातें सुनती रही थी. अंत में बस इतना ही बोल पायी, ‘तुमने कभी शादी का वादा नहीं किया और न ही कभी ऐसे सपने दिखाए जिसके लिए माफ़ी मांगों. तुम्हे तुम्हारे कर्तव्य के रास्ते से मैं कभी मुड़ने नहीं कहूँगी. जैसा तुमने कहा वैसा ही होगा.’

वो शाम ही हमारे रिश्ते की आखरी शाम थी. आज 25 साल बाद फिर इस स्टेशन पर उसके इंतजार में बीते दिनों के याद के साथ मैं.... लेकिन अर्जुन अभी तक आया क्यों नहीं वो भूलेगा नही पूरा विश्वास है फिर क्या हुआ?

ज्यादा समय नहीं लगा मुझे इन सवालों के जवाब पाने में। अगली सुबह के अख़बार के पहले पन्ने पर ही मेरे सारे सवालों के जवाब थे। सरकार के लिए मोस्ट वांटेड नक्सली अर्जुन पुलिस और खुफिया विभाग की सक्रियता से पकड़ा गया था। लिखा था कि प्रारंभ में उदारपंथी नक्सली विचारधारा से प्रभावित अर्जुन बाद में प्रशासन की दमन नीति के प्रतिकार में उग्रपंथी मार्ग की ओर मुड़ गया। माना जाता था कि सेना और पुलिस की टुकड़ियों पर हमले, सुदूरवर्ती इलाक़ों को जोड़ने वाले पूलों, सड़कों आदि को बम ब्लास्ट आदि से उड़ाने जैसी घटनाओं की योजना उसी के दिमाग की उपज थी। कहा जा रहा था कि गोविंदपुर स्टेशन पर भी वह अपनी किसी आगामी योजना की रेकी के लिए आने वाला था, जिसकी सूचना पुलिस को किसी मुखबिर से मिल गई और समय रहते उसे गिरफ्तार कर लिया गया। मैं जानती थी, और बातों में चाहे जितनी सच्चाई हो, यह बात झूठी थी। वो गोविंदपुर स्टेशन तो... वरना वो यहाँ बिना किसी सुरक्षा तैयारी के नहीं आता।

खैर, अपने तमाम कार्यों के बीच भी वह अपना वादा नहीं भूला तो इतना तो तय है कि उसके दिल के किसी कोने में मृदुल भावनाएँ, संवेदनाएँ आज भी जीवित हैं। वो उसे नहीं भूला अभी तक और न एक-दूसरे से किए वादे को ही। हाँ, इस वादे के पूरे होने की मियाद थोड़ी लंबी जरूर हो गई है। अपनी सजा पूरी कर जब वो बाहर निकलेगा, तब शायद अपना रास्ता बदल गरीबों-शोषितों की सहायता के लिए वो शायद कोई और राह तलाशे! उस राह पर चलते, अपनी मंजिल पर पहुँचते उसके चेहरे पर वही मुस्कान फिर वापस आयेगी जो मेरे मानस पटल में पिछले 25 वर्षों से छपी हुई है। उसकी इस मुस्कान को फिर एक बार देखने का मैं इंतजार करूँगी... मैं उस से फिर मिलूँगी। ये मेरा वादा है- मुझसे, उसकी यादों से, उसके भरोसे से... इस बार कोई समय सीमा नहीं रखी है, मगर खुद से ही किया है फिर एक मुलाक़ात का वादा.....      




Monday, 28 November 2016

पारम्परिक चिकित्सा पद्धति होडोपैथी

इस दुनिया में देखा अनदेखा इतना कुछ है कि कभी कभी हम संशय में पड़ जाते हैं किस पर यकीन करें और किसे मात्र संयोग समझ कर आगे उस पर और विचार या शोध न करें। चिकित्सा पद्धतियां भी इन्ही विश्वास अविश्वास के बीच अपनी राह बनाती आगे बढ़ रही जिससे मानव जाति लाभान्वित हो रही तो साइड इफेक्ट्स के झटके भी खा रही है। एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद,यूनानी और भी कितनी ही पद्धतियां है जिसके सहारे इंसान रोगमुक्त होने की कोशिश में लगा रहता है …….. एक पद्धति और भी है जो प्रचलित नहीं है क्योंकि इसे वनों में रहनेवाले जनजाति समूहों ने विकसित किया और अपने तक ही सिमित रखा। आज समय बदला और जनजातीय समूहों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया साथ ही उनकी संस्कृति, परम्परा, चिकित्सा पद्धति भी।
हम कथित सभ्य समाज के लोग इन चिकत्सा पद्धति का मज़ाक उड़ाते है जंगली विद्या भी कहते हैं लेकिन कुछ बीमारी और जख्मों पर ये इलाज रामबाण जैसा काम करता है। दो ऐसे उदाहरण मेरी आँखों देखी है।।


उम्र लगभग 14-15 होगी जब थेदुअस टोप्पो गाँव में खेलते हुए पेड़ से गिर पड़ा था। ऊपर से चोट ज़्यादा नहीं थोड़ा बहुत छिल गया था लेकिन कमर सीधी नहीं हो रही थी और बाँया हाथ भी भयानक पीड़ा थी शायद टूट ही गया होगा। दर्द से बेहाल थेदुअस को उसके दोस्त किसी तरह उसके घर ले गए। इत्तेफाक ही था कि उसका पिता गांव प्रमुख तो था ही बहुत अच्छा वैद्य भी था। दूर दूर गाँव से लोग उसके पास इलाज के लिये आते थे।
पिता ने जंगल जा कर कुछ जड़ी बूटियां और बड़े बड़े पत्ते जमा किये उसके साथ बांस की पतली पतली छड़ी बनायी। बेटे के कमर और हाथ पर जड़ी बूटी का लेप लगा कर उसे बड़े पत्तों से ढक बांस की छड़ीयों को पूरे कमर और हाथ पर जंगली लताओं की मदद से बांध दिया। करीब महीने दो महीने यूँ बंधा रहने के बाद जब इसे खोला गया तो थेदुअस का हाथ बिलकुल ठीक हो चुका था। कमर का दर्द भी नहीं था और अब वो सीधा खड़ा भी हो सकता था लेकिन कुछ दिनों बाद पता चला की उसके कमर की चोट काफी गहरी थी जो की पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया था जब भी झटका लगता या बहुत भारी सामान उठाने पर उसे तीव्र दर्द शुरू हो जाता जो आराम करने पर धीरे धीरे चला जाता।
थेदुअस के पिता ने उसे सख्त चेतावनी दी थी कि कभी किसी भी प्रकार का नशा मत करना ये किया तो शरीर टूटने लगेगा और कमर दर्द बुरी हालत में आ जायेगा।
थेदुअस ने पिता की बात हमेशा याद रखी तो दर्द से भी बचा रहा लेकिन ढलती उम्र में बुरी संगत का असर ऐसा हुआ की शराब के नशे के साथ ही ड्रग्स का आदी भी हो गया। सचमुच ही उसका स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ने लगा और अब हमेशा ही कमर दर्द से पीड़ित रहता है।
थेदुअस टोप्पो की उम्र आज करीब 54-55 वर्ष है, उसके पिता अब जीवित नहीं लेकिन आदिवासी पद्धति से किया उपचार का बेहतरीन उदाहरण मेरी आँखों के सामने है।
दूसरी घटना एक साल पुरानी है। पार्लर में काम करनेवाली एक आदिवासी महिला का बेटा अचानक ही मिर्गी दौरे से पीड़ित हो गया। अपने सामर्थ्य अनुसार उसने डॉक्टर दिखाया दवा भी की लेकिन परिणाम संतोषजनक नहीं मिल रहा था। तभी उसके किसी परिचित ने एक ऐसे पारम्परिक उपचार करनेवाले वैद्य की खबर दी जो दूर किसी जंगल के पास बसी बस्ती में रहता है। संगीता अपने बेटे को ले कर उसके पास गयी मात्र 4 बार जा कर दवा के डोज़ लेने के बाद अब उसका बेटा पूरी तरह स्वस्थ है अब कभी उसे दौरा नहीं पड़ा।
इस इलाज के बदले मूल्य भी अपनी इच्छानुसार देने की बात ऊस वैद्य ने कही थी। चाहे रूपये दो या खाने का कुछ सामान सब चलेगा।
ये है आदिवासियों की पारम्परिक चिकित्सा पद्धति जो कि लुप्तप्राय है क्योंकि अब न जंगल बच रहे कि जड़ी बूटियां उपलब्ध होंगी और न ही आदिवासियों को उनकी परम्परा के साथ रहने दिया जा रहा।
संस्कृति और परम्परा में बहुत सी उपयोगी चीजें भी छुपी होती है जिसे खत्म होने से बचाना चाहिए।

Monday, 7 November 2016

असफल की डायरी


असफल की डायरी





सफलता और असफलता का मापदण्ड नितांत ही निजी विषय है। कहते हैं न ‘मन के हारे हार और मन के जीते जीत!’
भले ही दुनिया उच्च पदस्थ होना या समाज में आर्थिक आधार पर सम्माननीय होना ही सफल होने का पर्याय माने लेकिन असली सफलता तो संतुष्टि में हैं।

सिक्के के एक तरफ सफलता है तो निश्चित ही दूसरी ओर असफलता होती है। हम सफल होतें है तो खुश हो जाते हैं, श्रेय कभी खुद तो कभी किसी करीबी को देते हैं लेकिन असफल होने पर इसका दायित्व या कारणों के मूल में हम कभी जा पाते है? शायद नहीं ... शोक इतना अधिक होता है कि मूल कारण पर ध्यान कभी नहीं जाता।

असफलता के कई कारण होते हैं। कभी-कभी हम राह ही गलत चुन लेते हैं शायद निर्णय में असावधानी जिसे हम बदकिस्मती भी कहते हैं। कई लोगों की असफलता की कहानी जानने के बाद मुझे सबसे बड़ा कारण ‘भय’ ही लगा।
अनिश्चित भविष्य का भय  हमारे मन पर ऐसा असर करता है कि सब कुछ सही होते हुए भी हम कुछ कदम गलत उठा ही लेते हैं और यही कदम हमें असफलता की राह ले जाता है। डर के कई कारण होते हैं जिन्हें कई बार सही तरीके से समझ भी नहीं पाते तो कभी पता ही नहीं चल पाता कि अपनी तरफ से सारी तैयारी और योग्यता होने बावजूद असफलता क्यों हाथ आई!
मेरे जीवन में कई मौके आये जहाँ मुझे मेरी पसंद का ही कार्यक्षेत्र मिला
लेकिन छोटे-छोटे अवरोधों से लड़ने और उन्हें दूर करने की मामूली कोशिश के बाद हर बार मैंने हार मान ली, आगे बढ़ने के रास्ते खुद ही बन्द कर दिए।गुज़रते समय के साथ जब कभी किसी मुकाम पर न पहुँच पाने के कारणों की खोज करती हूँ तब हमेशा ही मेरा डर और काफी हद तक आलस्य को ही इन सब की वजह पाया।
अपने जीवन को एक निश्चित दिशा न दे पाने का जितना दुःख नहीं उससे कहीं ज़्यादा दुःख और अपराधबोध मुझे अपने एक निर्णय से है जिसे मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी असफलता मानती हूँ मेरे एक निर्णय ने एक दूसरे जीवन की दिशा ही बदल दी। उसके सुनहरे भविष्य का दरवाज़ा मैंने हमेशा के लिए बन्द कर दिया। मुझे ज़िन्दगी ने कई मौके दिए हर बार मैंने ठुकरा दिया उसे ज़िन्दगी ने सबसे सुनहरा मौका दिया था उसकी योग्यताओं के अनुरूप लेकिन मैंने छीन लिया। उसकी मैं बड़ी बहन हूँ लेकिन उस वक़्त मैं उसकी मेंटर भी थी। मेरी इच्छा और मेरी सलाह(आदेश्) के बिना मानों उसके हर बड़े निर्णय पूरे ही
नहीं होते थे  :-(

घटना जितनी पुरानी होती जा रही दिल पर दाग उतना ही गहरा होता जा रहा है।
साल 2000 था। रांची के अख़बार में छपे विज्ञापन पर नज़र पड़ी। BSc आर्मी नर्सिंग कोर्स के लिए आवेदन आमन्त्रित किये गए थे। छोटी बहन किसी भी तरह का बहाना न कर पाये इसलिए विज्ञापन की कटिंग और फॉर्म  एक साथ उसे पोस्ट  से भेज दिया। पश्चिम बंगाल के 24परगना ज़िले के एक छोटे से जगह में रहने के कारण उसे फॉर्म भरने आदि के लिए बहुत सी परेशानियों से दो चार होना पड़ा। बिहार से माइग्रेट विद्यार्थी होने की वजह से उसे एफिडेफिट आदि भी जमा करना पड़ता, पर उसने बहन की इच्छा को अपना सपना बना लिया।
कभी-कभी मज़ाक से कहती दीदी, मेरा वज़न ही तो सिरिंज जितना है कहीं मुझे छांट न दे। मैं कहती पहले दिमाग का टेस्ट पास करो फिर फिजिकल टेस्ट की सोचेंगे, अभी उसमें टाइम है तब तक अच्छी डाइट ले कर वजन बढ़ा लो। इसी तरह की बातें हमारे बीच चलती रहतीं और वो परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ ढेर सारा केला खाना और वजन बढ़ाने की हर संभव तरकीब में लगी रहती। तमाम बाधाओं को पार करते हुए रिटेन, इंटरव्यू, फिजिकल टेस्ट सब में मेरिट के साथ पास
हो गयी। जैसे-जैसे रिजल्ट निकलता वो मुझे खुशखबरी देती और मैं नाना
चिंताओं में घिरने लगती। आर्मी नर्स की ज़िन्दगी की कठिनताओं के बारे में कुछ खबरें इधर-उधर से मिलने लगीं और कुछ मेरे अपने पूर्वाग्रह बेचैन करने लगे थे। मुझे लगने लगा छोटी बहन सबसे दूर अकेली कहीं मुश्किल में पड़ गयी तो क्या करुँगी? कोई और नौकरी हो तो जब चाहे छोड़ दे लेकिन ये नौकरी तो यूँ ही छोड़ी नहीं जा सकेगी। दिन-रात मैं यही सोचती रहती और एक दिन जब उसका अपॉइंटमेंट लेटर आ गया और बहुत मुश्किल का सामना कर के किसी तरह एक टिकट वेटिंग में मुम्बई का मिला तो मैं अड़ गयी .... ज़िद पकड़ ली नहीं जाना है,’ जब टिकट भी कनफर्म्ड नहीं मिला तो समझना चाहिए वहां न जाना ही ठीक
होगा।‘ जैसे कमज़ोर तर्क दे कर उसे रोकने की कोशिश करने लगी।छोटी बहन बहुत रोयी, मुझे समझाने की बहुत कोशिश की; लेकिन मेरे अक्ल पर मानों पत्थर ही पड़ गए थे। मेरा डर मुझ पर इतना हावी हो गया था कि नकारात्मक बातों के अतिरिक्त मुझे कुछ और समझ ही नहीं आ रहा था। मेरी बातों ने बाकी सदस्यों पर भी असर किया सबने मिल कर बहन के सुंदर भविष्य का सपना बिखेर कर रख दिया।
बहन कई साल तक अपना टिकट संभाल कर रखी रही। आँखों में आंसू आते पर कभी मुझे दोष नहीं दिया। मैंने उसे अनजान मुसीबतों से बचाये रखने के लिए दूर जाने नहीं दिया लेकिन वक़्त ने किसके लिए क्या मुकर्रर किया है ये सिर्फ वक़्त आने पर ही पता चलता है।
माँ के कैंसर से लड़ने के दौरान सबसे ज़्यादा कठिन संघर्ष छोटी बहन ने ही किया।माँ को इलाज के लिए ले कर जाने से लेकर उनकी अंतिम सांस तक उसी ने सेवा की, सारी मानसिक यंत्रणा भी उसने ही सही।
उसके जुझारू व्यक्तित्व और स्वभाव के साथ सेवा भाव देखती हूँ तब मुझे अपने निर्णय पर पछतावा और बढ़ जाता है। अगर उसने आर्मी ज्वाइन की होती तो उसकी अलग पहचान होती। कैंसर पीड़ित माँ का संघर्ष थोड़ा आसान होता। मेडिकल सपोर्ट ज़्यादा मिलता।
आज भी वो अपने जीवन में खुश और संतुष्ट है, खुशहाल पारिवारिक जीवन है; लेकिन जो अवसर उसके जीवन को एक मुकाम तक पहुंचाता मेरी वजह से हासिल न हो पाया।
ये उसकी नहीं मेरी असफलता है।इस विफलता ने मुझे बहुत बड़ी सीख दी। मौका मिले तो पूर्वाग्रहों के कारण अति चिंता से उपजे भय के कारण अवसर को गंवा देना असफलता ही नहीं मूर्खता भी है।

Tuesday, 20 September 2016

एसिड अटैकर की डायरी


कहीं पढ़ा था शरतचंद्र ने अपनी सबसे प्रसिद्ध रचना “देवदास” के बारे में लिखा था कि उन्हें अफ़सोस है उन्होंने देवदास जैसे चरित्र की रचना की।
शायद समाज को देव जैसे चरित्र का परिचय नायक के रूप में नहीं देना चाहते थे लेकिन कालांतर में देखिये यही सबसे पसंदीदा चरित्र बन गया यही नहीं प्रेम अस्वीकार किये जाने पर पारु को गुस्से में चोट पहुँचाने को भी प्रेम की अभिव्यक्ति ही समझा गया।कुछ पुरुषों में ऐसी मानसिक विकृति हमेशा से रही है चाहे वो उपन्यास का चरित्र ‘देब’ हो या  आज का एसिड अटैकर!

सुनो पार्वती, इतना सुंदर होना अच्छा नहीं। अहंकार बढ़ जाता है। गले का स्वर थोड़ा नीचे कर के बोला, देखती नहीं, चाँद का ऐसा रूप है तभी तो उस पर भी कलंक का काला दाग है; कमल इतना सफ़ेद है तभी तो काला भंवरा उस पर बैठा रहता है। आओ, तुम्हारे चेहरे पर भी थोड़ा दाग लगा दूँ।
.... वो अपनी मुट्ठी में मछली मारने की बंसी कस कर पकड़ा और ज़ोर से घुमा कर पार्वती के माथे पर आघात किया; तुरन्त ही माथे से ले कर बायीं भौं के नीचे तक चीर गया। देखते ही देखते पूरा चेहरा खून से भर गया।
पार्वती ज़मीन पर गिर पड़ी और बोली, देबदा, ये क्या किया!
.... छी! ऐसा मत करो पारू।
शेष-विदा के क्षणों में बस याद रखने जितना एक चिन्ह छोड़े जा रहा हूँ।ऐसा सोने जैसा चेहरा कभी-कभी तो आईने में देखोगी न?....

ऊपर लिखा संवाद कितने ही लोगों ने पढ़ा होगा। क्या किसी ने कभी देवदास को विलेन करार दे कर उसे कितने साल जेल कितनी बार फाँसी होनी चाहिए इस पर कोई व्यख्यान दिया है? कभी फेमिनिस्टों को लगा, ये एक नारी के प्रति नर का अत्याचार है? या कि सभी ने इसे एक प्रेमी का प्रेमिका के प्रति व्याकुल उन्माद प्रेम-चाबूक के तौर पर ही स्वीकार लिया। या कि प्रेम की महान खुजलीज्वाला का प्रतिक स्वरुप, पाने की इच्छा और न पाने की वेदना के कॉकटेल के तौर पर, अपने अधिकारबोध और दूसरे पक्ष के अस्वीकार्यता के धक्के से दिशाज्ञानशून्य अक्रोशी प्रेम रूप मान कर पाठकों के हृदय में स्वर्णाक्षर में छप गयी और ब्लॉकबस्टर हिट फ़िल्म की अमर पोस्टर बन कर दर्शकों के मानसपटल पर हमेशा के लिए छा गयी!

अगर ऐसा ही है तो मेरे समय में इतनी काई-किचिर क्यों मची है? मैंने तो बस इसी सीन को थोड़ा सा बढ़ा-चढ़ा लिया है। बंसी की जगह एसिड। थोड़ा सा दाग करने की बजाय पूरे चेहरे को जला कर वीभत्स कर दिया .... सिर्फ डिग्री का फर्क है, लेकिन उद्देश्य तो एक ही है।

फॉलो करते हुए रांची से धनबाद फिर वहां से मुम्बई पहुँच गया। उसके आने-जाने के समय पर थोड़ा नज़र रखने के बाद एक दिन बस स्टैंड पर ही उसके चेहरे पर एसिड फेंका। फेंकना ही पड़ा क्या करता! वो मेरे पड़ोस में रहती थी मैं उसके प्यार में पागल था, उसे प्रेम प्रस्ताव दिया लेकिन उसने लौटा दिया।
इतनी हिम्मत उसकी! नहीं.... नहीं!
हिम्मत से भी ज़्यादा उसकी इतनी निर्दयता, असंवेदनशीलता। मैं उसके लिये रो-रो कर आँखे अंधी कर ले रहा हूँ, रात भर जाग कर छटपटाता रहता हूँ, उसकी याद में न किताबें पढ़ पाता हूँ और न ही सिनेमा देखने में दिल लगता है.... तो क्या वो एक बार मेरी हालत पर नज़र भी नहीं डालेगी?
जब मैं कह रहा हूँ कि तुमसे प्यार करता हूँ तब कितना कमज़ोर और कितना असहाय हो कर खुद को उसके सामने झुका कर कहता हूँ! प्यार में इतना असहाय हो कर लड़का आये और जो लड़की उसे लौटा दे, उसके अंदर क्या इंसान का दिल हो सकता है? या कि लोहे का टुकड़ा रखा है? जिसमे परिकथा का वो आईना बंधा है जिसमे सिर्फ अपना ही सुंदर चेहरा दिखता है किसी और की छाया भी नहीं पड़ती। पड़ोस का एक लड़का उसके लिए तड़प-तड़प कर मरा जा रहा है ये देख कर भी जिसके दिल में दया नहीं आती, उसके चेहरे का ऐसा सौंदर्य दरअसल उसके काले कुत्सित अहंकारी मन का स्क्रीन सेवर भर ही है।

समझ में नहीं आता लड़कियों को इतना घमण्ड आखिर किस चीज़ का है? लड़के प्रपोज़ करते हैं तो वो लोग कैसे “ना” बोल देती है?
हमारे देश की जो महान प्रथा है—रिश्ता तय कर के विवाह होना.... वहां तो न बोलने का कोई प्रश्न नहीं उठता। माँ बाप जिसे पसंद कर दें उसी के गले में माला पहनाना ही पड़ता है। हाँ आजकल कुछ मोडर्न बनी फॅमिली में लड़की की इच्छा भी पूछ लेते है लेकिन असल में सिस्टम ऐसा नहीं है। परिवार जिसे अच्छा समझेगा तुम्हे उससे ही प्रेम करना होगा। ये तो खूब मान लेती हो, और प्रेम-प्रस्ताव मान लेने में बुखार आने लगता है?

 रिश्तेवाली, शादी में तुम एक प्रेमविहीन सम्बन्ध में आराम से प्रवेश कर जा रही थी, कि बाद में प्रेम करना सीख लोगी और यहां तो फिफ्टी परसेंट प्रेम हुआ ही पड़ा है बाकि फिफ्टी परसेंट तुम बाद में सीख लोगी सोच कर घूमना-फिरना शुरू नहीं कर सकती हो? उपन्यास और फिल्मों की तरह का प्रेम कितनों को नसीब होता है जहां एक बिजली चमकते ही दोनों के दिल एकसाथ धड़क उठे और प्यार हो जाये?

ज़्यादातर तो ऐसा ही होता है, एक जन प्रेम करेगा दूसरा उसके आग्रह को समझ धीरे-धीरे उसकी इच्छा को अपनाने लगेगा। तो फिर जब मैंने शादी की बात रखी तो तुमने ”ना” क्यों कहा? मैं नौकरी नहीं खोजता, सुंदर नहीं इसलिए?
 ऐसा ही है तब तो तुम्हारी सोच दोगली है। सेफ-खेलना चाहती हो। तुम रुपया पैसा देख रही हो, सुरक्षा देख रही, बाहरी सुंदरता देख रही हो.... तब तो तुम्हे सज़ा मिलनी ही चाहिए।

सोच कर ही इतना अच्छा लगता है, मेरे जैसा, मैं अकेला नहीं, आज इस देश में हज़ार-हज़ार पुरुष मेरे भाई-बिरादर है जो लड़कियों पर एसिड फेंक रहे। ये देश प्रेमियों का देश है। हमलोग टोंट करते हैं, पीछा करते हैं, हाथ भी पकड़ लेते हैं, सरेआम ज़बरदस्ती चुम्बन भी... विरोध करने पर पिटते हैं, एसिड फेंकते हैं बलात्कार भी करते हैं, क्योंकि हमने प्यार किया है। पागलों की भाँति प्यार बहुत प्यार! इसलिए मेरी इच्छा मुताबिक अगर मुझे वो नहीं मिलेगी तो उसे किसी और की भी नहीं होने दे सकता। मेरे प्यार को जिसने नहीं समझा, उसे कभी किसी और का प्यार नसीब न हों इसकी व्यवस्था भी मैं खुद करूँगा। ठीक है.... मुझे फांसी होगी लेकिन ये उत्तराधिकार रह ही जायेगा।

‘पारु बाद में मन ही मन बोली थी, देबदा! ये दाग ही मेरे लिए सांत्वना है, यही मेरा आधार। तुम मुझे चाहते थे तभी तो हमारे बाल्य-प्रेम का इतिहास मेरे ललाट पर लिख गए। वो मेरी लज्जा नहीं कलंक नहीं मेरे गौरव का साम्राज्य और मैं सम्राज्ञी।‘
एक्सक्टली! तुम्हे कोई इतना चाहता है, मरने की हद तक चाहता है उसका प्यार अब ज़िद बन चूका है एकमात्र उद्देश्य बन गया है, इसमें इतना चिढ़ने और परेशान होने से कैसे चलेगा बोलो?
इससे तो तुम्हे अपने अस्तित्व को ही धन्य समझना चाहिए। गर्व होना चाहिये! इंसान किसका होता है? जो प्रेम करे उसका ही न.... इसीलिए जिस लड़की को देख मेरा दिल तड़प उठा है वो निश्चित ही सिर्फ मेरी है। मुझे हक़ है,ज़रूरत पड़े तो मैं उसे श्रीहीन कर दूँ। इसके अतिरिक्त ईगो व्यक्ति का सर्वनाश कर देता है, एसिड इस अहं को गला कर रख देता है और लड़कियों को समझा देता है, ज्यों ही रूप चला जाये फिर उसका कोई मोल नहीं रह जाता। अब न उसे अच्छी नौकरी मिलेगी और न ही दूल्हा। उसे देखते ही लोग सिहर उठेंगे और बच्चे चीख कर रो पड़ेंगे। इस महादहन के बाद ही नारी अपना सही स्थान समझ पायेगी। सत्य यही है स्त्री का सम्मान पुरुष की मुग्धता में ही है, उसका स्थान पुरुष के कामुक आलिंगन में है। अगर यह अच्छी तरह समझ जाओ तो बस.....
एसिड टेस्ट पास हो गयी......

Wednesday, 7 September 2016

डायरी.... किसकी? आप तय करें..



जिन्हें देख कर आपकी आँखों में, शब्दों में सहानुभूति और मन के गहरे तल
में डर और अपने इस स्थिति में न पहुँचने की प्रार्थना चलती हो क्या उनकी
डायरी पढ़ना चाहेंगे? आपकी रूचि का उसमें कुछ भी न मिले शायद गहरी
उदासीनता और अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों की मदद पर निर्भर
जीवन में झाँकने जैसा कुछ भी तो नहीं लेकिन फिर भी इस शरीर में भी एक मन
है जो बिलकुल आपके ही मन के जैसा भावनाओं का आवेग उद्द्वेलित करता रहता
है।  जीवन के कुछ दिन और सामान्य लोगों जैसा बिताने के बाद एक हादसा जब
ज़िन्दगी बदल दे तब ......

मेरा नाम मंदिरा है, पेशे से डॉक्टर थी, अभी भी हूँ लेकिन अब मेरी सेवाओं
की दिशा बदल गयी है मेरा जीवन समर्पित है मेरे ही जैसे मेरे साथियों के
लिए. अब मैं उनकी सुनती हूँ और अपनी सुनाती हूँ। अब मुझे टीवी पर भी अपने
व्हील चेयर के साथ टॉक शो पर जाने में संकोच महसूस नहीं होता। मैं अपनी
रोज़मर्रा की परेशानी, उस पर काबू पाने के बेहतर तरीके और आत्मनिर्भर बनने
के कौशल पर खुल कर बात करती हूँ। जीवन यदि जटिल है तो उसे सरल बनाने के
प्रयास में लगे रहना ही मेरा मकसद है।

अच्छी भली ज़िन्दगी चल रही थी, पढाई खत्म कर के अभी कुछ ही दिन हुए
प्रैक्टिस शुरू की थी।  बहुत से सपने थे मेरे और अजित के। अजित डॉक्टर
नहीं, हम कॉमन फ्रेंड की पार्टी में दोस्त बने और जाने कब एक दूसरे के
लिए खास बन गये कुछ पता ही नहीं चला। शादी की डेट फिक्स होनी बाकी थी
लेकिन भविष्य के गर्भ में कौन सी डेट किसके साथ फिक्स है समय आने पर ही
पता चलता है। एक एक्सीडेंट और उसके बाद सारे डेट सारी प्लानिंग बदल गयी।
कल जो कुछ भी मेरा सच था आज वो सब अतीत के साथ दफन हो गया.
होश आया तो अपने ही हॉस्पिटल के एक बेड पर पड़ी थी। कमर से नीचे का हिस्सा
बेकार हो गया था, मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था. शरीर का निचला
हिस्सा जितना सुन्न हुआ था मन उतना ही चंचल हो उठा था। जो कुछ बचा है
उसके खो जाने के डर से मैं मर रही थी, लेकिन उससे क्या होता है होना वही
था जो तय था। मुझसे बेहद प्यार करनेवाला अजित मुझे छोड़ कर चला गया।

नयी शुरुआत ऐसी थी जैसे नये जन्मे बच्चे के लिए नयी दुनिया। वार्धक्य की
चुनौती से लड़ते हुए मेरी माँ ने मुझे फिर से संभाला। मैं लाचार बेबस खुद
एक ग्लास पानी तक नहीं ले सकती थी, कब टॉयलेट जाने की ज़रूरत है ये तक
महसूस करने की क्षमता खो गयी थी। हर वक्त माँ ने छोटे बच्चे की तरह
संभाला।
माँ ने मेरी सबसे पसंदीदा चीज़ मेरी आँखों के सामने से दूर कर दी थी, मेरी
नजरें उन्हें खोजतीं लेकिन पूछ नहीं पाती थी... माँ भी समझती मैं क्या
खोज रही हूँ लेकिन वो भी अनजान बने रहने का नाटक करती। मुझे क्रेज़ था
लेटेस्ट डिजाईन के सैंडल्स का, पर अचानक ही उनकी ज़रूरत तो बिलकुल खत्म हो
गयी अब सिर्फ मैं और मेरा व्हील चेयर .......

जीवन के बदलाव को मैंने स्वीकार किया खुद को कठिन संघर्ष के लिए मजबूत कर
लिया और फिर वो दिन भी आया जब मेरा सबसे बड़ा सहारा मेरी माँ इस दुनिया से
चली गयी। माँ चली गयी लेकिन जाते -ते मुझे आत्मनिर्भर बना गयी,
‘आत्मनिर्भर’ पढ़ कर क्या सोचने लगे आप! हमारे लिए ये शब्द कितना
उपहासपूर्ण है.. है न! पर यही सच है। आज अपने घर में अकेली रहती हूँ,
अपनी गाड़ी भी खुद चलाती हूँ. आधुनिक तकनीकों ने मुझे बड़ा सहारा दिया.
मेरे सुन्न हो चुके जीवन को फिर से स्पंदन मेरे उद्देश्य से मिला।
अब मैंने अपनी सीमित हो चुकी डॉक्टरी क्षमता को ‘डिसेबल्ड ट्रेनिंग
प्रोग्राम’ से जोड़ कर असीमित कर लिया था। आज मेरे साथियों के लिए मेरा
जीवन प्रेरणा है अवसाद की शुन्यता से सुन्न हो चुके जीवन में आशा की किरण
है।
रोज ही नये साथी आते हैं।  मन की कहते हैं, मैं उनके साथ अपना दुःख भूलती
हूँ और उन्हें भुलाने में मदद करती हूँ, पर कॉन्फेशन करना चाहती हूँ
डायरी, तुम्हारे पास...... मैं कुछ नहीं भूल पायी। न वो रंगीन सपनों से
भरा जीवन और न ही अजित का मुंह फेर कर चला जाना और न ही लोगों की
सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि जो सबसे अधिक चोट पहुंचाती हैं। दुनिया हमें दया
की दृष्टि से देखना चाहती है लेकिन हमसे प्यार नहीं कर सकती. सभी सोचते
हैं हमें प्यार से ज्यादा दया और दूसरी चीजों की ज़रूरत है। मैं रोज़ रोती
हूँ, खूब रोती हूँ लेकिन सुबह फिर से मुस्कुराते हुए अपने साथियों के पास
लौटती हूँ क्योंकि मैं प्रेरणा हूँ उनकी. प्यार के बिना कैसे जिया जाये
ये सीखना है उन्हें मुझसे।

कल पद्मा से मुलाकात हुई सड़क दुर्घटना में उसने अपना बच्चा खो दिया और
स्पाइनल कॉर्ड में चोट के कारण उसका जीवन भी व्हील चेयर पर आ गया।  घर के
लोग और पति सभी उसका ख्याल रखते थे लेकिन उसे महसूस होता कि पति पहले की
तरह उससे प्यार नहीं करता बस सहानुभूति के साथ निभाते जा रहा है। पद्मा
समझती है कि जब शरीर पहले जैसा नहीं रहा तो रिश्ता भी पहले जैसा नहीं
रहेगा लेकिन भावनाओं का क्या करे?  उसे तो रिश्ते के बदलते भाव से ही चोट
लग रही है। पद्मा माँ बनना चाहती है लेकिन किसी से ये बात कह नहीं सकती।
व्हील चेयर पर चल रही ज़िन्दगी पर दुनिया दया कर सकती है लेकिन उसे
सामान्य लोगों की तरफ कल्पना करते हँसते, गुनगुनाते और इच्छाएँ प्रकट
करते नहीं देख सकती।

व्हील चेयर पर चलती ज़िन्दगी के साथ ईगो, स्टाइल और मनमर्जियां माफ़िक नहीं लगती न!!
लेकिन जब वो मिला तो उसने मेरे बहुत सारे भ्रम तोड़ दिए। दुनिया उसे क्या
कमजोर और लाचार समझेगी वो सबकी इस आदत और इच्छा को धता बताते हुए ऐसे टशन
में रहता कि लोग उसकी स्टाइल को देखने के लिए मुड़-मुड़ कर देखते। दुबला और
अनीमिया से सफ़ेद पड़ा शरीर उसे और गोरा दिखाता था। चेहरे पर ऐसी मुस्कान
और बातों में इतना आत्मविश्वास- सुनकर लगता जैसे अभी व्हील चेयर छोड़ कर
उठ खड़ा होगा।

उसके पास हमेशा एक लैपटॉप रहता।  बात करता रहे या अपने बेड सोर की
ड्रेसिंग करवाए लैपटॉप हमेशा खुला ही रहता। नई चीज़ सीखने की ज़बरदस्त ललक
थी उसमें, झट सीख लेता था।  कानों  में बालियाँ, आँखों पर स्टालिश चश्मा
और मुंह में सिगरेट ये उसकी स्टाइल थी।  ‘ट्रेनिंग प्रोग्राम’ की ट्रेनर
मैं थी लेकिन सच तो ये है कि मैं उससे सीख रही थी अपने सारे दर्द और
संघर्षपूर्ण दिनों को कैसे दुनिया से छुपा कर खुल के हँसा जाता है, दोस्त
बनाये जाते हैं. कैसे वास्तव में जिया जाता है...
ट्रेनिंग के बाद भी कुछ देर बैठ कर वो रोज़ मेरे साथ बातें करता.... नहीं!
बल्कि उसकी रहस्यमयी बातें और आत्मविश्वास इतना आकर्षक था कि मैं ही उससे
बातें करने को रोक कर रखती। बहुत कुछ बताया उसने अपने बारे में, अपनी
इच्छाओं के बारे में भी।

अंशुमन बहुत अच्छा शूटर और कराटे में ब्लैक बेल्ट था। आपसी रंजिश में उसे
बुरी तरह मार कर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। वो मरा तो नहीं लेकिन मौत
से बदतर ज़िन्दगी हो गयी उसकी।
एक दिन उसने बताया जानती हो मैडम, आज मैं मॉल गया था कुछ लोगों का ग्रुप
मुझे गौर से देख रहा था, वो लोग मेरे कानों की बालियों पर बातें कर रहे
थे एक ने तो हद कर दी अपनी मोबाइल से मेरी फोटो लेने की कोशिश की। मैंने
देखा और उसके पास जा कर उसका फोन ले कर फेंक दिया।  क्या हम पिंजरे में
बंद जानवर हैं जिसे देख कर कोई हँसे, कोई बुलाये तो कोई उसकी फोटो खींचे?
क्या कहती हमदोनों का दर्द तो एक सा है.... उसके शब्दों से मेरा दर्द भी
टपक रहा था।
एक दिन उसने बताया जानती हो मैडम इन्टरनेट पर रोज़ ढूंढ़ता हूँ कहीं से कोई
लिंक मिले और पता चले कि मैं अब व्हील चेयर पर नहीं बल्कि पैरों पर खड़ा
हो सकता हूँ लेकिन देखो न जिस तरह व्हील चेयर मिलने के बाद गर्ल फ्रेंड
मिलनी बंद हो गयी उसी तरह किसी भी लिंक में ऐसा कोई मैजिक नहीं मिलता कि
मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं।

अपने पैरों पर चलने वाला आदमी अगर उसकी ये बात सुनता तो शायद कहता बाथरूम
जाने तक में मदद चाहिए और सपने गर्ल फ्रेंड के देखता है लेकिन मैं जानती
हूँ मन के पाँव कभी व्हील चेयर पर नहीं आते। वो हमेशा संगी/संगिनी की
तलाश में रहता है, कोई ऐसा जो उसे गले लगाए कहे ‘मुझे तुमसे प्यार है’।

उसकी बातें सुन कर मैं उसे गले लगा कर कहना चाहती थी ‘अंशुमन मैं हूँ
न...’ लेकिन हमदोनों के बीच दो व्हील चेयर की दूरी मुझे कभी ऐसा कहने
नहीं देगी।

अब अंशुमन ट्रेंड हो चुका है खुद ड्राइविंग करता है, अपने ज्यादातर काम
खुद करता है। अब वो यहाँ नहीं आता...
पता नहीं उसके सपने उसे कहाँ तक ले गए।

Thursday, 11 August 2016

डाइवर की डायरी से....


आज फिर गंगा में इस छोर से उस छोर तक गोता लगा कर खोज ही निकाला उस लाश को. काफी गल चुकी थी, निकालने में परेशानी भी हो रही थी लेकिन पार्टी ने कहा था अच्छे पैसे देगा. लाश बाहर आते ही घरवाले इस तरह पछाड़ खा कर रो रहे थे कि पैसा मांगने की हिम्मत ही नहीं हुई. आज फिर खाली हाथ ही घर लौटना पड़ा.

गोताखोर की भी कोई कहानी होती है क्या? नहीं, कोई कहानी नहीं होती, लेकिन कितने ही हत्या, आत्महत्या और साजिश की परिणति के हम साक्षी होते हैं. कितने ही केस पुलिस फाइल में दबे रह जाते अगर लाश नहीं मिली तो और कितने ही इंश्योरेंस क्लेम ना हो पाएं अगर हम डेड बॉडी पानी से निकाल कर नही ला पाए तो...

पेशा है अखबार बेचना, लेकिन पार्ट टाइम डिसास्टर मैनेजमेंट ग्रुप में स्वंयसेवी, नाम भोलानाथ. आज फिर से गंगा में डुबकी लगाना है. सच कहता हूँ गोताखोर का काम भी कम जोखिम भरा नहीं, कई बार मृत्यु से दो-चार हाथ कर के ही हम वापस ज़मीन देख पाते है. लेकिन कुछ लोगों को तो जोखिम लेना ही पड़ेगा न; ताकि बहुत से लोग चैन से जी सकें.

गंगा के पानी में जितना आप गहरे उतरते जायेंगे- उतना ही ज्यादा दबाव महसूस करेंगे, कभी-कभी तो नाक से खून भी निकल आता है. एक बार फेसबुक प्रेम में असफल हुई महिला ने ख़ुदकुशी करने के लिए गंगा को ही चुना. उसकी लाश खोजते-खोजते मैं खुद ही लाश हो जा रहा था.
नदी के पानी में जब सूरज की रौशनी पड़ती है तब उसका रंग मटमैला दिखता है, उस समय लाश खोजने में कम दिक्कत होती है; लेकिन गहरे पानी में एकदम अँधेरा होता है, हाथ मार-मार कर अंदाज़ा लगाना पड़ता है कि ये लाश हो सकती है. नदी का पानी रंगभेद भी नहीं करता, हर लाश जो कुछ घंटे पानी में डूबी रही हो सफ़ेद ही दिखाई देती है चाहे व्यक्ति कितना भी काला ही क्यों न रहा हो. स्त्री और पुरुष की लाश पहचानना भी आसान होता है. अगर लाश पुरुष की है तो वो चित्त पड़ा मिलेगा और महिला की लाश हो तो पीठ के बल पड़ी होगी. लेकिन फिर भी इतने समय तक लाश पानी में पड़ी रहने के बाद उसे बाहर ले कर आना कठिन हो जाता है कई बार तो लाश बाहर निकालने के बाद चार दिन तक ठीक से खाना भी नहीं खा पाता. पानी के अंदर लाश इतनी गल जाती है कि खींच कर निकालने की कोशिश में लाश की चमड़ी सहित आंतें हाथ में आ जाती हैं. या फिर देखा जाता है कि लाश के कुछ हिस्से पानी के जीवों ने खा लिए हैं, रस्सी से बाँध कर लाश उठाने के प्रयास में चमड़ी और मांस गल कर गिरते रहते है.

वैसे आप ये मत सोचिये कि हमें हमेशा ही लाश खोजने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, ऐसा नहीं. शीत ऋतु इस काम में बहुत सहायक है, इस मौसम में लाश बहुत जल्दी ही उभर कर सतह  के करीब आ जाती है उस समय एक बांस से ठेल कर या रस्सी बाँध कर तुरंत खींच कर ऊपर ले आता हूँ. ग्रीष्म काल बहुत मुश्किलें खड़ी करती है, सतह पर लाश जल्दी नहीं आती और पानी में इतने गहरे डूबी रहती है कि कई बार उसे निकालने में सर्प दंश का शिकार या मछली के काटे जाने का भी डर रहता है. लाश खोजते हुए हाथ कभी-कभी पत्थरों के नीचे भी आ जाता है.


आमतौर पर हम सांप के काटे जाने पर ज्यादा भयभीत होतें है लेकिन गंगा के पानी में इतने जहरीले साँप नही जितनी की काट खाने वाली मछलियां. कुछ ,मछलियाँ तो निशाना साध कर काँटों से वार करती हैं- उनका बस चले तो नाक नोच कर ले जाएं.

आप सोचते होंगे, लाश देर-सवेर मिल ही जाती होंगी. लेकिन ये हमेशा नहीं होता नदी के नीचे इतने बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते है कि एक बार लाश उसमें धंस गयी तो शायद कभी हाथ न आएगी.
एक बार एक परिवार अपने दो छोटे बच्चों के साथ घुमने आया था. दोनों बच्चे घाट पर ही पानी से खेल रहे थे. अचानक बड़े बच्चे का पांव फिसला और वो पानी में बह गया मैंने बहुत ढूंढा लेकिन वो नहीं मिला, उसकी माँ पछाड़ खा कर रो रही थी लेकिन मैं उसके बेटे को जिंदा तो क्या उसे यकीन दिलाने के लिए कि उसका बच्चा अब नहीं रहा, उसकी लाश तक नहीं दे सका.

ओह! एक बात का ज़िक्र करना तो भूल ही गया था, डाइवर्स का काम दो तरह का होता है.... एक लाइव और दूसरा रिकॉर्डिंग. चौंक गए!!  ( तो सुनिए.
मान लीजिये आप घाट पर या बीच पर हैं, अचानक आपके सामने ही कोई कूद पड़ा तो आपके पास और कोई चारा नहीं उसे बचाने के लिए तुरंत कूदना ही पड़ेगा ताकि समय पर बचाया जा सके, ये हुआ लाइव वर्क और रिकॉर्डिंग मतलब पुलिस जब खबर दे, कहीं पर कोई दुर्घटना घटी है तब वहाँ सारे इंतजाम के साथ जा कर नदी में डुबकी लगानी पड़ती है और ये सर्च कितनी देर में खत्म होगी कहा भी नहीं जा सकता. तो हुआ न ये रिकॉर्डिंग!
 एक बात और बताता हूँ- इतने साल से ये काम करते- करते अब तो किनारे बैठे हुए देख कर बता सकता हूँ कि कोई अपने-आप गिर गया या डाइव लगाया. वक्त रहते नजर पड़ जाए तो तुरंत समझ आ जाता है सामने वाला यूँ ही खड़ा है या ईरादा आत्महत्या का है.

बड़ी नदियों की धार बहुत तेज़ होती है और कहीं-कहीं करंट भी होता है, इसलिए तैरना जानते भी हों तो भी सावधानी रखनी चाहिए.