Monday, 28 November 2016

पारम्परिक चिकित्सा पद्धति होडोपैथी

इस दुनिया में देखा अनदेखा इतना कुछ है कि कभी कभी हम संशय में पड़ जाते हैं किस पर यकीन करें और किसे मात्र संयोग समझ कर आगे उस पर और विचार या शोध न करें। चिकित्सा पद्धतियां भी इन्ही विश्वास अविश्वास के बीच अपनी राह बनाती आगे बढ़ रही जिससे मानव जाति लाभान्वित हो रही तो साइड इफेक्ट्स के झटके भी खा रही है। एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद,यूनानी और भी कितनी ही पद्धतियां है जिसके सहारे इंसान रोगमुक्त होने की कोशिश में लगा रहता है …….. एक पद्धति और भी है जो प्रचलित नहीं है क्योंकि इसे वनों में रहनेवाले जनजाति समूहों ने विकसित किया और अपने तक ही सिमित रखा। आज समय बदला और जनजातीय समूहों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया साथ ही उनकी संस्कृति, परम्परा, चिकित्सा पद्धति भी।
हम कथित सभ्य समाज के लोग इन चिकत्सा पद्धति का मज़ाक उड़ाते है जंगली विद्या भी कहते हैं लेकिन कुछ बीमारी और जख्मों पर ये इलाज रामबाण जैसा काम करता है। दो ऐसे उदाहरण मेरी आँखों देखी है।।


उम्र लगभग 14-15 होगी जब थेदुअस टोप्पो गाँव में खेलते हुए पेड़ से गिर पड़ा था। ऊपर से चोट ज़्यादा नहीं थोड़ा बहुत छिल गया था लेकिन कमर सीधी नहीं हो रही थी और बाँया हाथ भी भयानक पीड़ा थी शायद टूट ही गया होगा। दर्द से बेहाल थेदुअस को उसके दोस्त किसी तरह उसके घर ले गए। इत्तेफाक ही था कि उसका पिता गांव प्रमुख तो था ही बहुत अच्छा वैद्य भी था। दूर दूर गाँव से लोग उसके पास इलाज के लिये आते थे।
पिता ने जंगल जा कर कुछ जड़ी बूटियां और बड़े बड़े पत्ते जमा किये उसके साथ बांस की पतली पतली छड़ी बनायी। बेटे के कमर और हाथ पर जड़ी बूटी का लेप लगा कर उसे बड़े पत्तों से ढक बांस की छड़ीयों को पूरे कमर और हाथ पर जंगली लताओं की मदद से बांध दिया। करीब महीने दो महीने यूँ बंधा रहने के बाद जब इसे खोला गया तो थेदुअस का हाथ बिलकुल ठीक हो चुका था। कमर का दर्द भी नहीं था और अब वो सीधा खड़ा भी हो सकता था लेकिन कुछ दिनों बाद पता चला की उसके कमर की चोट काफी गहरी थी जो की पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया था जब भी झटका लगता या बहुत भारी सामान उठाने पर उसे तीव्र दर्द शुरू हो जाता जो आराम करने पर धीरे धीरे चला जाता।
थेदुअस के पिता ने उसे सख्त चेतावनी दी थी कि कभी किसी भी प्रकार का नशा मत करना ये किया तो शरीर टूटने लगेगा और कमर दर्द बुरी हालत में आ जायेगा।
थेदुअस ने पिता की बात हमेशा याद रखी तो दर्द से भी बचा रहा लेकिन ढलती उम्र में बुरी संगत का असर ऐसा हुआ की शराब के नशे के साथ ही ड्रग्स का आदी भी हो गया। सचमुच ही उसका स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ने लगा और अब हमेशा ही कमर दर्द से पीड़ित रहता है।
थेदुअस टोप्पो की उम्र आज करीब 54-55 वर्ष है, उसके पिता अब जीवित नहीं लेकिन आदिवासी पद्धति से किया उपचार का बेहतरीन उदाहरण मेरी आँखों के सामने है।
दूसरी घटना एक साल पुरानी है। पार्लर में काम करनेवाली एक आदिवासी महिला का बेटा अचानक ही मिर्गी दौरे से पीड़ित हो गया। अपने सामर्थ्य अनुसार उसने डॉक्टर दिखाया दवा भी की लेकिन परिणाम संतोषजनक नहीं मिल रहा था। तभी उसके किसी परिचित ने एक ऐसे पारम्परिक उपचार करनेवाले वैद्य की खबर दी जो दूर किसी जंगल के पास बसी बस्ती में रहता है। संगीता अपने बेटे को ले कर उसके पास गयी मात्र 4 बार जा कर दवा के डोज़ लेने के बाद अब उसका बेटा पूरी तरह स्वस्थ है अब कभी उसे दौरा नहीं पड़ा।
इस इलाज के बदले मूल्य भी अपनी इच्छानुसार देने की बात ऊस वैद्य ने कही थी। चाहे रूपये दो या खाने का कुछ सामान सब चलेगा।
ये है आदिवासियों की पारम्परिक चिकित्सा पद्धति जो कि लुप्तप्राय है क्योंकि अब न जंगल बच रहे कि जड़ी बूटियां उपलब्ध होंगी और न ही आदिवासियों को उनकी परम्परा के साथ रहने दिया जा रहा।
संस्कृति और परम्परा में बहुत सी उपयोगी चीजें भी छुपी होती है जिसे खत्म होने से बचाना चाहिए।

Monday, 7 November 2016

असफल की डायरी


असफल की डायरी





सफलता और असफलता का मापदण्ड नितांत ही निजी विषय है। कहते हैं न ‘मन के हारे हार और मन के जीते जीत!’
भले ही दुनिया उच्च पदस्थ होना या समाज में आर्थिक आधार पर सम्माननीय होना ही सफल होने का पर्याय माने लेकिन असली सफलता तो संतुष्टि में हैं।

सिक्के के एक तरफ सफलता है तो निश्चित ही दूसरी ओर असफलता होती है। हम सफल होतें है तो खुश हो जाते हैं, श्रेय कभी खुद तो कभी किसी करीबी को देते हैं लेकिन असफल होने पर इसका दायित्व या कारणों के मूल में हम कभी जा पाते है? शायद नहीं ... शोक इतना अधिक होता है कि मूल कारण पर ध्यान कभी नहीं जाता।

असफलता के कई कारण होते हैं। कभी-कभी हम राह ही गलत चुन लेते हैं शायद निर्णय में असावधानी जिसे हम बदकिस्मती भी कहते हैं। कई लोगों की असफलता की कहानी जानने के बाद मुझे सबसे बड़ा कारण ‘भय’ ही लगा।
अनिश्चित भविष्य का भय  हमारे मन पर ऐसा असर करता है कि सब कुछ सही होते हुए भी हम कुछ कदम गलत उठा ही लेते हैं और यही कदम हमें असफलता की राह ले जाता है। डर के कई कारण होते हैं जिन्हें कई बार सही तरीके से समझ भी नहीं पाते तो कभी पता ही नहीं चल पाता कि अपनी तरफ से सारी तैयारी और योग्यता होने बावजूद असफलता क्यों हाथ आई!
मेरे जीवन में कई मौके आये जहाँ मुझे मेरी पसंद का ही कार्यक्षेत्र मिला
लेकिन छोटे-छोटे अवरोधों से लड़ने और उन्हें दूर करने की मामूली कोशिश के बाद हर बार मैंने हार मान ली, आगे बढ़ने के रास्ते खुद ही बन्द कर दिए।गुज़रते समय के साथ जब कभी किसी मुकाम पर न पहुँच पाने के कारणों की खोज करती हूँ तब हमेशा ही मेरा डर और काफी हद तक आलस्य को ही इन सब की वजह पाया।
अपने जीवन को एक निश्चित दिशा न दे पाने का जितना दुःख नहीं उससे कहीं ज़्यादा दुःख और अपराधबोध मुझे अपने एक निर्णय से है जिसे मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी असफलता मानती हूँ मेरे एक निर्णय ने एक दूसरे जीवन की दिशा ही बदल दी। उसके सुनहरे भविष्य का दरवाज़ा मैंने हमेशा के लिए बन्द कर दिया। मुझे ज़िन्दगी ने कई मौके दिए हर बार मैंने ठुकरा दिया उसे ज़िन्दगी ने सबसे सुनहरा मौका दिया था उसकी योग्यताओं के अनुरूप लेकिन मैंने छीन लिया। उसकी मैं बड़ी बहन हूँ लेकिन उस वक़्त मैं उसकी मेंटर भी थी। मेरी इच्छा और मेरी सलाह(आदेश्) के बिना मानों उसके हर बड़े निर्णय पूरे ही
नहीं होते थे  :-(

घटना जितनी पुरानी होती जा रही दिल पर दाग उतना ही गहरा होता जा रहा है।
साल 2000 था। रांची के अख़बार में छपे विज्ञापन पर नज़र पड़ी। BSc आर्मी नर्सिंग कोर्स के लिए आवेदन आमन्त्रित किये गए थे। छोटी बहन किसी भी तरह का बहाना न कर पाये इसलिए विज्ञापन की कटिंग और फॉर्म  एक साथ उसे पोस्ट  से भेज दिया। पश्चिम बंगाल के 24परगना ज़िले के एक छोटे से जगह में रहने के कारण उसे फॉर्म भरने आदि के लिए बहुत सी परेशानियों से दो चार होना पड़ा। बिहार से माइग्रेट विद्यार्थी होने की वजह से उसे एफिडेफिट आदि भी जमा करना पड़ता, पर उसने बहन की इच्छा को अपना सपना बना लिया।
कभी-कभी मज़ाक से कहती दीदी, मेरा वज़न ही तो सिरिंज जितना है कहीं मुझे छांट न दे। मैं कहती पहले दिमाग का टेस्ट पास करो फिर फिजिकल टेस्ट की सोचेंगे, अभी उसमें टाइम है तब तक अच्छी डाइट ले कर वजन बढ़ा लो। इसी तरह की बातें हमारे बीच चलती रहतीं और वो परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ ढेर सारा केला खाना और वजन बढ़ाने की हर संभव तरकीब में लगी रहती। तमाम बाधाओं को पार करते हुए रिटेन, इंटरव्यू, फिजिकल टेस्ट सब में मेरिट के साथ पास
हो गयी। जैसे-जैसे रिजल्ट निकलता वो मुझे खुशखबरी देती और मैं नाना
चिंताओं में घिरने लगती। आर्मी नर्स की ज़िन्दगी की कठिनताओं के बारे में कुछ खबरें इधर-उधर से मिलने लगीं और कुछ मेरे अपने पूर्वाग्रह बेचैन करने लगे थे। मुझे लगने लगा छोटी बहन सबसे दूर अकेली कहीं मुश्किल में पड़ गयी तो क्या करुँगी? कोई और नौकरी हो तो जब चाहे छोड़ दे लेकिन ये नौकरी तो यूँ ही छोड़ी नहीं जा सकेगी। दिन-रात मैं यही सोचती रहती और एक दिन जब उसका अपॉइंटमेंट लेटर आ गया और बहुत मुश्किल का सामना कर के किसी तरह एक टिकट वेटिंग में मुम्बई का मिला तो मैं अड़ गयी .... ज़िद पकड़ ली नहीं जाना है,’ जब टिकट भी कनफर्म्ड नहीं मिला तो समझना चाहिए वहां न जाना ही ठीक
होगा।‘ जैसे कमज़ोर तर्क दे कर उसे रोकने की कोशिश करने लगी।छोटी बहन बहुत रोयी, मुझे समझाने की बहुत कोशिश की; लेकिन मेरे अक्ल पर मानों पत्थर ही पड़ गए थे। मेरा डर मुझ पर इतना हावी हो गया था कि नकारात्मक बातों के अतिरिक्त मुझे कुछ और समझ ही नहीं आ रहा था। मेरी बातों ने बाकी सदस्यों पर भी असर किया सबने मिल कर बहन के सुंदर भविष्य का सपना बिखेर कर रख दिया।
बहन कई साल तक अपना टिकट संभाल कर रखी रही। आँखों में आंसू आते पर कभी मुझे दोष नहीं दिया। मैंने उसे अनजान मुसीबतों से बचाये रखने के लिए दूर जाने नहीं दिया लेकिन वक़्त ने किसके लिए क्या मुकर्रर किया है ये सिर्फ वक़्त आने पर ही पता चलता है।
माँ के कैंसर से लड़ने के दौरान सबसे ज़्यादा कठिन संघर्ष छोटी बहन ने ही किया।माँ को इलाज के लिए ले कर जाने से लेकर उनकी अंतिम सांस तक उसी ने सेवा की, सारी मानसिक यंत्रणा भी उसने ही सही।
उसके जुझारू व्यक्तित्व और स्वभाव के साथ सेवा भाव देखती हूँ तब मुझे अपने निर्णय पर पछतावा और बढ़ जाता है। अगर उसने आर्मी ज्वाइन की होती तो उसकी अलग पहचान होती। कैंसर पीड़ित माँ का संघर्ष थोड़ा आसान होता। मेडिकल सपोर्ट ज़्यादा मिलता।
आज भी वो अपने जीवन में खुश और संतुष्ट है, खुशहाल पारिवारिक जीवन है; लेकिन जो अवसर उसके जीवन को एक मुकाम तक पहुंचाता मेरी वजह से हासिल न हो पाया।
ये उसकी नहीं मेरी असफलता है।इस विफलता ने मुझे बहुत बड़ी सीख दी। मौका मिले तो पूर्वाग्रहों के कारण अति चिंता से उपजे भय के कारण अवसर को गंवा देना असफलता ही नहीं मूर्खता भी है।

Tuesday, 20 September 2016

एसिड अटैकर की डायरी


कहीं पढ़ा था शरतचंद्र ने अपनी सबसे प्रसिद्ध रचना “देवदास” के बारे में लिखा था कि उन्हें अफ़सोस है उन्होंने देवदास जैसे चरित्र की रचना की।
शायद समाज को देव जैसे चरित्र का परिचय नायक के रूप में नहीं देना चाहते थे लेकिन कालांतर में देखिये यही सबसे पसंदीदा चरित्र बन गया यही नहीं प्रेम अस्वीकार किये जाने पर पारु को गुस्से में चोट पहुँचाने को भी प्रेम की अभिव्यक्ति ही समझा गया।कुछ पुरुषों में ऐसी मानसिक विकृति हमेशा से रही है चाहे वो उपन्यास का चरित्र ‘देब’ हो या  आज का एसिड अटैकर!

सुनो पार्वती, इतना सुंदर होना अच्छा नहीं। अहंकार बढ़ जाता है। गले का स्वर थोड़ा नीचे कर के बोला, देखती नहीं, चाँद का ऐसा रूप है तभी तो उस पर भी कलंक का काला दाग है; कमल इतना सफ़ेद है तभी तो काला भंवरा उस पर बैठा रहता है। आओ, तुम्हारे चेहरे पर भी थोड़ा दाग लगा दूँ।
.... वो अपनी मुट्ठी में मछली मारने की बंसी कस कर पकड़ा और ज़ोर से घुमा कर पार्वती के माथे पर आघात किया; तुरन्त ही माथे से ले कर बायीं भौं के नीचे तक चीर गया। देखते ही देखते पूरा चेहरा खून से भर गया।
पार्वती ज़मीन पर गिर पड़ी और बोली, देबदा, ये क्या किया!
.... छी! ऐसा मत करो पारू।
शेष-विदा के क्षणों में बस याद रखने जितना एक चिन्ह छोड़े जा रहा हूँ।ऐसा सोने जैसा चेहरा कभी-कभी तो आईने में देखोगी न?....

ऊपर लिखा संवाद कितने ही लोगों ने पढ़ा होगा। क्या किसी ने कभी देवदास को विलेन करार दे कर उसे कितने साल जेल कितनी बार फाँसी होनी चाहिए इस पर कोई व्यख्यान दिया है? कभी फेमिनिस्टों को लगा, ये एक नारी के प्रति नर का अत्याचार है? या कि सभी ने इसे एक प्रेमी का प्रेमिका के प्रति व्याकुल उन्माद प्रेम-चाबूक के तौर पर ही स्वीकार लिया। या कि प्रेम की महान खुजलीज्वाला का प्रतिक स्वरुप, पाने की इच्छा और न पाने की वेदना के कॉकटेल के तौर पर, अपने अधिकारबोध और दूसरे पक्ष के अस्वीकार्यता के धक्के से दिशाज्ञानशून्य अक्रोशी प्रेम रूप मान कर पाठकों के हृदय में स्वर्णाक्षर में छप गयी और ब्लॉकबस्टर हिट फ़िल्म की अमर पोस्टर बन कर दर्शकों के मानसपटल पर हमेशा के लिए छा गयी!

अगर ऐसा ही है तो मेरे समय में इतनी काई-किचिर क्यों मची है? मैंने तो बस इसी सीन को थोड़ा सा बढ़ा-चढ़ा लिया है। बंसी की जगह एसिड। थोड़ा सा दाग करने की बजाय पूरे चेहरे को जला कर वीभत्स कर दिया .... सिर्फ डिग्री का फर्क है, लेकिन उद्देश्य तो एक ही है।

फॉलो करते हुए रांची से धनबाद फिर वहां से मुम्बई पहुँच गया। उसके आने-जाने के समय पर थोड़ा नज़र रखने के बाद एक दिन बस स्टैंड पर ही उसके चेहरे पर एसिड फेंका। फेंकना ही पड़ा क्या करता! वो मेरे पड़ोस में रहती थी मैं उसके प्यार में पागल था, उसे प्रेम प्रस्ताव दिया लेकिन उसने लौटा दिया।
इतनी हिम्मत उसकी! नहीं.... नहीं!
हिम्मत से भी ज़्यादा उसकी इतनी निर्दयता, असंवेदनशीलता। मैं उसके लिये रो-रो कर आँखे अंधी कर ले रहा हूँ, रात भर जाग कर छटपटाता रहता हूँ, उसकी याद में न किताबें पढ़ पाता हूँ और न ही सिनेमा देखने में दिल लगता है.... तो क्या वो एक बार मेरी हालत पर नज़र भी नहीं डालेगी?
जब मैं कह रहा हूँ कि तुमसे प्यार करता हूँ तब कितना कमज़ोर और कितना असहाय हो कर खुद को उसके सामने झुका कर कहता हूँ! प्यार में इतना असहाय हो कर लड़का आये और जो लड़की उसे लौटा दे, उसके अंदर क्या इंसान का दिल हो सकता है? या कि लोहे का टुकड़ा रखा है? जिसमे परिकथा का वो आईना बंधा है जिसमे सिर्फ अपना ही सुंदर चेहरा दिखता है किसी और की छाया भी नहीं पड़ती। पड़ोस का एक लड़का उसके लिए तड़प-तड़प कर मरा जा रहा है ये देख कर भी जिसके दिल में दया नहीं आती, उसके चेहरे का ऐसा सौंदर्य दरअसल उसके काले कुत्सित अहंकारी मन का स्क्रीन सेवर भर ही है।

समझ में नहीं आता लड़कियों को इतना घमण्ड आखिर किस चीज़ का है? लड़के प्रपोज़ करते हैं तो वो लोग कैसे “ना” बोल देती है?
हमारे देश की जो महान प्रथा है—रिश्ता तय कर के विवाह होना.... वहां तो न बोलने का कोई प्रश्न नहीं उठता। माँ बाप जिसे पसंद कर दें उसी के गले में माला पहनाना ही पड़ता है। हाँ आजकल कुछ मोडर्न बनी फॅमिली में लड़की की इच्छा भी पूछ लेते है लेकिन असल में सिस्टम ऐसा नहीं है। परिवार जिसे अच्छा समझेगा तुम्हे उससे ही प्रेम करना होगा। ये तो खूब मान लेती हो, और प्रेम-प्रस्ताव मान लेने में बुखार आने लगता है?

 रिश्तेवाली, शादी में तुम एक प्रेमविहीन सम्बन्ध में आराम से प्रवेश कर जा रही थी, कि बाद में प्रेम करना सीख लोगी और यहां तो फिफ्टी परसेंट प्रेम हुआ ही पड़ा है बाकि फिफ्टी परसेंट तुम बाद में सीख लोगी सोच कर घूमना-फिरना शुरू नहीं कर सकती हो? उपन्यास और फिल्मों की तरह का प्रेम कितनों को नसीब होता है जहां एक बिजली चमकते ही दोनों के दिल एकसाथ धड़क उठे और प्यार हो जाये?

ज़्यादातर तो ऐसा ही होता है, एक जन प्रेम करेगा दूसरा उसके आग्रह को समझ धीरे-धीरे उसकी इच्छा को अपनाने लगेगा। तो फिर जब मैंने शादी की बात रखी तो तुमने ”ना” क्यों कहा? मैं नौकरी नहीं खोजता, सुंदर नहीं इसलिए?
 ऐसा ही है तब तो तुम्हारी सोच दोगली है। सेफ-खेलना चाहती हो। तुम रुपया पैसा देख रही हो, सुरक्षा देख रही, बाहरी सुंदरता देख रही हो.... तब तो तुम्हे सज़ा मिलनी ही चाहिए।

सोच कर ही इतना अच्छा लगता है, मेरे जैसा, मैं अकेला नहीं, आज इस देश में हज़ार-हज़ार पुरुष मेरे भाई-बिरादर है जो लड़कियों पर एसिड फेंक रहे। ये देश प्रेमियों का देश है। हमलोग टोंट करते हैं, पीछा करते हैं, हाथ भी पकड़ लेते हैं, सरेआम ज़बरदस्ती चुम्बन भी... विरोध करने पर पिटते हैं, एसिड फेंकते हैं बलात्कार भी करते हैं, क्योंकि हमने प्यार किया है। पागलों की भाँति प्यार बहुत प्यार! इसलिए मेरी इच्छा मुताबिक अगर मुझे वो नहीं मिलेगी तो उसे किसी और की भी नहीं होने दे सकता। मेरे प्यार को जिसने नहीं समझा, उसे कभी किसी और का प्यार नसीब न हों इसकी व्यवस्था भी मैं खुद करूँगा। ठीक है.... मुझे फांसी होगी लेकिन ये उत्तराधिकार रह ही जायेगा।

‘पारु बाद में मन ही मन बोली थी, देबदा! ये दाग ही मेरे लिए सांत्वना है, यही मेरा आधार। तुम मुझे चाहते थे तभी तो हमारे बाल्य-प्रेम का इतिहास मेरे ललाट पर लिख गए। वो मेरी लज्जा नहीं कलंक नहीं मेरे गौरव का साम्राज्य और मैं सम्राज्ञी।‘
एक्सक्टली! तुम्हे कोई इतना चाहता है, मरने की हद तक चाहता है उसका प्यार अब ज़िद बन चूका है एकमात्र उद्देश्य बन गया है, इसमें इतना चिढ़ने और परेशान होने से कैसे चलेगा बोलो?
इससे तो तुम्हे अपने अस्तित्व को ही धन्य समझना चाहिए। गर्व होना चाहिये! इंसान किसका होता है? जो प्रेम करे उसका ही न.... इसीलिए जिस लड़की को देख मेरा दिल तड़प उठा है वो निश्चित ही सिर्फ मेरी है। मुझे हक़ है,ज़रूरत पड़े तो मैं उसे श्रीहीन कर दूँ। इसके अतिरिक्त ईगो व्यक्ति का सर्वनाश कर देता है, एसिड इस अहं को गला कर रख देता है और लड़कियों को समझा देता है, ज्यों ही रूप चला जाये फिर उसका कोई मोल नहीं रह जाता। अब न उसे अच्छी नौकरी मिलेगी और न ही दूल्हा। उसे देखते ही लोग सिहर उठेंगे और बच्चे चीख कर रो पड़ेंगे। इस महादहन के बाद ही नारी अपना सही स्थान समझ पायेगी। सत्य यही है स्त्री का सम्मान पुरुष की मुग्धता में ही है, उसका स्थान पुरुष के कामुक आलिंगन में है। अगर यह अच्छी तरह समझ जाओ तो बस.....
एसिड टेस्ट पास हो गयी......

Wednesday, 7 September 2016

डायरी.... किसकी? आप तय करें..



जिन्हें देख कर आपकी आँखों में, शब्दों में सहानुभूति और मन के गहरे तल
में डर और अपने इस स्थिति में न पहुँचने की प्रार्थना चलती हो क्या उनकी
डायरी पढ़ना चाहेंगे? आपकी रूचि का उसमें कुछ भी न मिले शायद गहरी
उदासीनता और अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों की मदद पर निर्भर
जीवन में झाँकने जैसा कुछ भी तो नहीं लेकिन फिर भी इस शरीर में भी एक मन
है जो बिलकुल आपके ही मन के जैसा भावनाओं का आवेग उद्द्वेलित करता रहता
है।  जीवन के कुछ दिन और सामान्य लोगों जैसा बिताने के बाद एक हादसा जब
ज़िन्दगी बदल दे तब ......

मेरा नाम मंदिरा है, पेशे से डॉक्टर थी, अभी भी हूँ लेकिन अब मेरी सेवाओं
की दिशा बदल गयी है मेरा जीवन समर्पित है मेरे ही जैसे मेरे साथियों के
लिए. अब मैं उनकी सुनती हूँ और अपनी सुनाती हूँ। अब मुझे टीवी पर भी अपने
व्हील चेयर के साथ टॉक शो पर जाने में संकोच महसूस नहीं होता। मैं अपनी
रोज़मर्रा की परेशानी, उस पर काबू पाने के बेहतर तरीके और आत्मनिर्भर बनने
के कौशल पर खुल कर बात करती हूँ। जीवन यदि जटिल है तो उसे सरल बनाने के
प्रयास में लगे रहना ही मेरा मकसद है।

अच्छी भली ज़िन्दगी चल रही थी, पढाई खत्म कर के अभी कुछ ही दिन हुए
प्रैक्टिस शुरू की थी।  बहुत से सपने थे मेरे और अजित के। अजित डॉक्टर
नहीं, हम कॉमन फ्रेंड की पार्टी में दोस्त बने और जाने कब एक दूसरे के
लिए खास बन गये कुछ पता ही नहीं चला। शादी की डेट फिक्स होनी बाकी थी
लेकिन भविष्य के गर्भ में कौन सी डेट किसके साथ फिक्स है समय आने पर ही
पता चलता है। एक एक्सीडेंट और उसके बाद सारे डेट सारी प्लानिंग बदल गयी।
कल जो कुछ भी मेरा सच था आज वो सब अतीत के साथ दफन हो गया.
होश आया तो अपने ही हॉस्पिटल के एक बेड पर पड़ी थी। कमर से नीचे का हिस्सा
बेकार हो गया था, मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था. शरीर का निचला
हिस्सा जितना सुन्न हुआ था मन उतना ही चंचल हो उठा था। जो कुछ बचा है
उसके खो जाने के डर से मैं मर रही थी, लेकिन उससे क्या होता है होना वही
था जो तय था। मुझसे बेहद प्यार करनेवाला अजित मुझे छोड़ कर चला गया।

नयी शुरुआत ऐसी थी जैसे नये जन्मे बच्चे के लिए नयी दुनिया। वार्धक्य की
चुनौती से लड़ते हुए मेरी माँ ने मुझे फिर से संभाला। मैं लाचार बेबस खुद
एक ग्लास पानी तक नहीं ले सकती थी, कब टॉयलेट जाने की ज़रूरत है ये तक
महसूस करने की क्षमता खो गयी थी। हर वक्त माँ ने छोटे बच्चे की तरह
संभाला।
माँ ने मेरी सबसे पसंदीदा चीज़ मेरी आँखों के सामने से दूर कर दी थी, मेरी
नजरें उन्हें खोजतीं लेकिन पूछ नहीं पाती थी... माँ भी समझती मैं क्या
खोज रही हूँ लेकिन वो भी अनजान बने रहने का नाटक करती। मुझे क्रेज़ था
लेटेस्ट डिजाईन के सैंडल्स का, पर अचानक ही उनकी ज़रूरत तो बिलकुल खत्म हो
गयी अब सिर्फ मैं और मेरा व्हील चेयर .......

जीवन के बदलाव को मैंने स्वीकार किया खुद को कठिन संघर्ष के लिए मजबूत कर
लिया और फिर वो दिन भी आया जब मेरा सबसे बड़ा सहारा मेरी माँ इस दुनिया से
चली गयी। माँ चली गयी लेकिन जाते -ते मुझे आत्मनिर्भर बना गयी,
‘आत्मनिर्भर’ पढ़ कर क्या सोचने लगे आप! हमारे लिए ये शब्द कितना
उपहासपूर्ण है.. है न! पर यही सच है। आज अपने घर में अकेली रहती हूँ,
अपनी गाड़ी भी खुद चलाती हूँ. आधुनिक तकनीकों ने मुझे बड़ा सहारा दिया.
मेरे सुन्न हो चुके जीवन को फिर से स्पंदन मेरे उद्देश्य से मिला।
अब मैंने अपनी सीमित हो चुकी डॉक्टरी क्षमता को ‘डिसेबल्ड ट्रेनिंग
प्रोग्राम’ से जोड़ कर असीमित कर लिया था। आज मेरे साथियों के लिए मेरा
जीवन प्रेरणा है अवसाद की शुन्यता से सुन्न हो चुके जीवन में आशा की किरण
है।
रोज ही नये साथी आते हैं।  मन की कहते हैं, मैं उनके साथ अपना दुःख भूलती
हूँ और उन्हें भुलाने में मदद करती हूँ, पर कॉन्फेशन करना चाहती हूँ
डायरी, तुम्हारे पास...... मैं कुछ नहीं भूल पायी। न वो रंगीन सपनों से
भरा जीवन और न ही अजित का मुंह फेर कर चला जाना और न ही लोगों की
सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि जो सबसे अधिक चोट पहुंचाती हैं। दुनिया हमें दया
की दृष्टि से देखना चाहती है लेकिन हमसे प्यार नहीं कर सकती. सभी सोचते
हैं हमें प्यार से ज्यादा दया और दूसरी चीजों की ज़रूरत है। मैं रोज़ रोती
हूँ, खूब रोती हूँ लेकिन सुबह फिर से मुस्कुराते हुए अपने साथियों के पास
लौटती हूँ क्योंकि मैं प्रेरणा हूँ उनकी. प्यार के बिना कैसे जिया जाये
ये सीखना है उन्हें मुझसे।

कल पद्मा से मुलाकात हुई सड़क दुर्घटना में उसने अपना बच्चा खो दिया और
स्पाइनल कॉर्ड में चोट के कारण उसका जीवन भी व्हील चेयर पर आ गया।  घर के
लोग और पति सभी उसका ख्याल रखते थे लेकिन उसे महसूस होता कि पति पहले की
तरह उससे प्यार नहीं करता बस सहानुभूति के साथ निभाते जा रहा है। पद्मा
समझती है कि जब शरीर पहले जैसा नहीं रहा तो रिश्ता भी पहले जैसा नहीं
रहेगा लेकिन भावनाओं का क्या करे?  उसे तो रिश्ते के बदलते भाव से ही चोट
लग रही है। पद्मा माँ बनना चाहती है लेकिन किसी से ये बात कह नहीं सकती।
व्हील चेयर पर चल रही ज़िन्दगी पर दुनिया दया कर सकती है लेकिन उसे
सामान्य लोगों की तरफ कल्पना करते हँसते, गुनगुनाते और इच्छाएँ प्रकट
करते नहीं देख सकती।

व्हील चेयर पर चलती ज़िन्दगी के साथ ईगो, स्टाइल और मनमर्जियां माफ़िक नहीं लगती न!!
लेकिन जब वो मिला तो उसने मेरे बहुत सारे भ्रम तोड़ दिए। दुनिया उसे क्या
कमजोर और लाचार समझेगी वो सबकी इस आदत और इच्छा को धता बताते हुए ऐसे टशन
में रहता कि लोग उसकी स्टाइल को देखने के लिए मुड़-मुड़ कर देखते। दुबला और
अनीमिया से सफ़ेद पड़ा शरीर उसे और गोरा दिखाता था। चेहरे पर ऐसी मुस्कान
और बातों में इतना आत्मविश्वास- सुनकर लगता जैसे अभी व्हील चेयर छोड़ कर
उठ खड़ा होगा।

उसके पास हमेशा एक लैपटॉप रहता।  बात करता रहे या अपने बेड सोर की
ड्रेसिंग करवाए लैपटॉप हमेशा खुला ही रहता। नई चीज़ सीखने की ज़बरदस्त ललक
थी उसमें, झट सीख लेता था।  कानों  में बालियाँ, आँखों पर स्टालिश चश्मा
और मुंह में सिगरेट ये उसकी स्टाइल थी।  ‘ट्रेनिंग प्रोग्राम’ की ट्रेनर
मैं थी लेकिन सच तो ये है कि मैं उससे सीख रही थी अपने सारे दर्द और
संघर्षपूर्ण दिनों को कैसे दुनिया से छुपा कर खुल के हँसा जाता है, दोस्त
बनाये जाते हैं. कैसे वास्तव में जिया जाता है...
ट्रेनिंग के बाद भी कुछ देर बैठ कर वो रोज़ मेरे साथ बातें करता.... नहीं!
बल्कि उसकी रहस्यमयी बातें और आत्मविश्वास इतना आकर्षक था कि मैं ही उससे
बातें करने को रोक कर रखती। बहुत कुछ बताया उसने अपने बारे में, अपनी
इच्छाओं के बारे में भी।

अंशुमन बहुत अच्छा शूटर और कराटे में ब्लैक बेल्ट था। आपसी रंजिश में उसे
बुरी तरह मार कर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। वो मरा तो नहीं लेकिन मौत
से बदतर ज़िन्दगी हो गयी उसकी।
एक दिन उसने बताया जानती हो मैडम, आज मैं मॉल गया था कुछ लोगों का ग्रुप
मुझे गौर से देख रहा था, वो लोग मेरे कानों की बालियों पर बातें कर रहे
थे एक ने तो हद कर दी अपनी मोबाइल से मेरी फोटो लेने की कोशिश की। मैंने
देखा और उसके पास जा कर उसका फोन ले कर फेंक दिया।  क्या हम पिंजरे में
बंद जानवर हैं जिसे देख कर कोई हँसे, कोई बुलाये तो कोई उसकी फोटो खींचे?
क्या कहती हमदोनों का दर्द तो एक सा है.... उसके शब्दों से मेरा दर्द भी
टपक रहा था।
एक दिन उसने बताया जानती हो मैडम इन्टरनेट पर रोज़ ढूंढ़ता हूँ कहीं से कोई
लिंक मिले और पता चले कि मैं अब व्हील चेयर पर नहीं बल्कि पैरों पर खड़ा
हो सकता हूँ लेकिन देखो न जिस तरह व्हील चेयर मिलने के बाद गर्ल फ्रेंड
मिलनी बंद हो गयी उसी तरह किसी भी लिंक में ऐसा कोई मैजिक नहीं मिलता कि
मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं।

अपने पैरों पर चलने वाला आदमी अगर उसकी ये बात सुनता तो शायद कहता बाथरूम
जाने तक में मदद चाहिए और सपने गर्ल फ्रेंड के देखता है लेकिन मैं जानती
हूँ मन के पाँव कभी व्हील चेयर पर नहीं आते। वो हमेशा संगी/संगिनी की
तलाश में रहता है, कोई ऐसा जो उसे गले लगाए कहे ‘मुझे तुमसे प्यार है’।

उसकी बातें सुन कर मैं उसे गले लगा कर कहना चाहती थी ‘अंशुमन मैं हूँ
न...’ लेकिन हमदोनों के बीच दो व्हील चेयर की दूरी मुझे कभी ऐसा कहने
नहीं देगी।

अब अंशुमन ट्रेंड हो चुका है खुद ड्राइविंग करता है, अपने ज्यादातर काम
खुद करता है। अब वो यहाँ नहीं आता...
पता नहीं उसके सपने उसे कहाँ तक ले गए।

Sunday, 4 September 2016

भांति भांति के राधेश्याम



चित्र साभार गूगल से

भांति-भांति के राधे-श्याम 
ये आलेख फिल्मकार बुद्ददेब दासगुप्ता द्वारा बांग्ला में लिखी गयी है .....
पत्नी भाग जाये तो पुरुष का मान-सम्मान नहीं रह जाता, लेकिन पुरुष भी भाग जाते हैं दुसरे की पत्नियों के साथ. ईला का पति भाग कर जाता है बेला के पास बेला का पति पड़ोस की मुक्ति के साथ भाग जाता है दीघा, फिर लौट के नही आता. पिताजी के मित्र डॉ मंडल बहुत ही भले मानस थे, लेकिन पता नही कैसे एक दिन देखा उनके दादाजी के मोह्गनी की अलमारी में घुन लग गया है. ये कीड़े हजम कर गये डॉ की पैंट शर्ट बनियान उनकी पत्नी के ब्लाउज पेटीकोट सब. उनके घर के विपरीत दिशा में ही एक बढई की दूकान.थी. उसे बुला कर दिखाया गया उसने कहा सामने का पल्ला दोनों तरफ की लकड़ी और ताक सब बदलना पड़ेगा. डॉ. राज़ी हो गये आखिर दादाजी के स्मृति में रखी अलमारी का सवाल था. दुसरे दिन सवेरे ही अपनी थैली ले कर हाज़िर हो गया अधेढ़ उम्र का सूनी आँखों वाला एक लकड़ी का मिस्त्री.
करीब दो साल पहले ही डॉ. मंडल के बेटे की शादी हुई थी घर में आई एक सुंदर सी बहू और साल भर बाद ही एक प्यारा सा पोता. मैं तब क्लास टेंथ में पढता था. एक दिन सुबह उठ कर देखता हूँ पिताजी का मुंह लटका हुआ तनाव में माँ का चेहरा तो उनसे भी ज्यादा.... डॉ. मंडल की पुत्रवधू कहीं नही मिल रही और वो लकड़ी का मिस्त्री भी गायब है उसका थैला वहीँ पड़ा है जिसमे उसके सारे औजार है और बिस्तर पर पड़ा हुआ है डॉ. का छोटा सा पोता.
सारे मोहल्ले में थू थू होने लगी, चेम्बर और घर में ताला लगा कर डॉ, मंडल अपने बेटे पोता और पत्नी को को ले कर चले गये अपने पैतृक गाँव और फिर कभी लौट कर नहीं आये.
बहुत, बहुत साल बीत गये एक दिन किसी जगह से कोलकाता वापस लौट रहा था, रास्ते में एक छोटा सा बस्तीनुमा शहर पड़ा. वहां चाय पीने के लिए गाड़ी रोक दी. चाय और कुछ बिस्किट आर्डर करने जिस छोटे से दुकान जैसी जगह पर आया वहाँ एक औरत चाय बना रही थी उसे देखते ही मैं चौंक गया उसके पीछे एक बुढा बैठा हुआ बांसुरी बजा रहा था. मुझे चाय दे कर वो फिर से स्टोव पर चाय का पानी चढाने लगी वो महिला मतलब डॉ. मंडल के घर से भागी हुई उनकी पुत्रवधू. इतनी उम्र में भी , उस औरत का रूप लावण्य उसे छोड़ कर नहीं गया था इसका कारण शायद बांसुरी बजाता वो बुढा ही होगा, जो पेशे से बढई था. फिर चाय के लिए बोला, उसके बाद फिर एक कप उसके बाद और तीन कप चाय पीने के बाद मैंने अपना परिचय दिया. मैं बोला, पता है, बहुत कोशिश के बाद भी कोई ये कारण नहीं जान सका, सब कुछ छोड़छाड़ कर आप इस बूढ़े के साथ क्यों निकल गयी.
वो महिला धीरे धीरे बताने लगी, अलमारी ठीक करते समय ये काम के बीच बीच में बांसुरी निकाल कर बजाता था, बचपन से ही मुझे बांसुरी बजाने का शौक था लेकिन घर से किसी ने सिखने नहीं दिया. औरत जात बांसुरी क्या बजाएगी! शादी के बाद पति को बहुत मनाने की कोशिश करती रही की मुझे बांसुरी सीखने दो.. एक दिन थप्पड़ मार कर उसने भी सीखा दिया की बांसुरी मेरे लिए नहीं.
ये मिला तो इसने मुझे बांसुरी बजाना सिखाया. अभी तक सिखाता है. क्या होगा पक्का मकान और पेट भरने के तरह तरह के पकवानों से जबकि मेरा मन तो खाली ही रहता था. शाम को यहाँ हम दोनों मिल कर बांसुरी बजाते है, बहुत से लोग सुनने आते है, मन आनन्द से भरा रहता है.
पेरिस से लगभग चार घंटे लगते है वेसुल जाने में, अन्तराष्ट्रीय स्तर का फिल्म फेस्टिवल आयोजन होता है. जिसके संचालक मार्टिन और उसके पति जाँ-मार्क हैं. दोनों वेसुल में रहने के बावजूद एक दुसरे को बैंकोक में मिलने से पहले नहीं पहचानते थे. पटाया के समुद्र किनारे अकेली बैठी थी मार्टिन और वहीँ पास ही कहीं बैठा था अकेला जाँ- मार्क. उसके बाद पता नहीं कैसे विधाता की इच्छा से दोनों का परिचय हुआ. किससे शादी की जाए यही सोचते हुए दोनों के इतने सारे साल यूँ ही निकल गये थे. बातें करते करते दोनों को पता चला की वो दोनों ही पागलों की तरह सिनेमा से प्यार करते है. दोनों ही स्कूल में पढ़ाते हैं, सैलरी आदि जो मिलती है उससे किसी तरह चल जाता है लेकिन उससे ज्यादा नहीं. वेसुल लौट कर दोनों ने शादी कर ली, सिनेमा को साक्षी मान कर. उसके बाद हुआ एक सपने का जन्म. कोई सहारा नही सम्बल नही, अमीर यार दोस्त भी नही. है तो सिर्फ वो एक सपना.... वेसुल में फिल्म फेस्टिवल शुरू करना है. पता नहीं कैसे उन दोनों ने वेसुल में फेस्टिवल की शुरुआत कर ही दी. बहुत मान-अपमान,कहा-सुनी के बीच से भी फिल्म फेस्टिवल के सपने को उन्होंने आकार दे ही दिया.
उनके घर में ही फिल्म फेस्टिवल का ऑफिस था , एक दिन मैं इन्टरनेट पर काम कर रहा था वहीँ बैठ कर , देखा मार्टिन रोते हुए अंदर आई उसके आंसू थम नही रहे थे, पीछे पीछे जाँ भी आया. उसकी आँखों में भी पानी था लेकिन वो लगातार मार्टिन को सांत्वना दे रहा था. क्या हुआ? पता चला एक प्रसिद्ध म्यूजिशियन की रील अभी तक पेरिस से यहाँ नहीं पहुंची है. शो शुरू होने का टाइम साढ़े पांच था छह बजने को हैं. दोनों की आँखों के आंसू रुक नही रहे थे मैं चुपचाप बाहर चला गया.... उसी वक्त समझ गया था दोनों में से कोई किसी को छोड़ कर कभी नही जा सकेगा दोनों ही सिनेमाप्रेम के एक अद्भुत जंजीर से बंधे है.
करीब तीस साल पहले होनोलुलु में मेरी मुलाकात जेनेट पोलसन से हुई थी. जेनेट तब एयर होस्टेस थी लेकिन प्लेन में चढ़ते ही उसे रोना आने लगता. डर के कारण नही बल्कि जो करना चाह रही थी वो न कर पाने के दुःख में. उसने नाटक और सिनेमा से प्यार किया था. उसके घर जा कर देखा था नाटक कविता कहानी की किताबो और पोस्टर से घर भरा हुआ था. कुछ दिनों बाद सुना अपनी ये नौकरी छोड़ बैंक से लोन ले कर सिनेमा विषय पर यूनिवर्सिटी में पढाई करने गयी है जेनेट. जेनेट का पति था , बेटी थी पर कुछ था जो जेनेट का नहीं था.
विली, फिजी-आई लैंड का लड़का था. वहां से नाटक विषय पर पढने आया था होनुलुलू. होनुलुलू फिल्म फेस्टिवल से उस समय मैं भी जुड़ा हुआ था, करीब 6-7 बार जाना हुआ. जेनेट तब तक उस फिल्म फेस्टिवल की डायरेक्टर बन चुकी थी. हम दोनों ही अधेड़ उम्र के हो चुके थे, उसने मुझे बताया की वो विली से शादी कर रही है, पति से बहुत पहले ही separation हो चुका था. विली जेनेट से छब्बीस साल और जेनेट की बेटी से दो साल छोटा है. विली को तब जस्ट पढ़ाने का काम मिला था इस्ट वेस्ट यूनिवर्सिटी में और वो नाटक के लिए ग्रुप बनाने का काम भी कर रहा था.
आखरी बार जब होनुलुलू गया तब उनके घर पर ही ठहरा था. विली जब पढ़ाने चला जाता जेनेट तब अपने मन के डर की बात मुझसे कहती. विली तो अभी बहुत छोटा है एकदम जवान है कोई और लड़की आ कर उसे अगर मुझसे दूर ले जाएगी तो..... जेनेट की तो उम्र हो गयी है. एक शाम मैं और विली टहलने निकले. बहुत दूर तक हम निकल आये टहलते हुए, वहीँ एक पेड़ दिखा कर विली ने कहा था , जानते हो यही हमारी शादी हुई थी, और इसी पेड़ के नीचे हमने हमारा पहला नाटक खेला था.
अभी कुछ दिन हुए जेनेट ने इ-मेल कर के मुझे बताया की एक बिलकुल नया एक्सपेरिमेंटल काम शुरू किया है दोनों नें. जिसमे एकक अभिव्यक्ति के साथ घुलमिल गयी है सिनेमा के कुछ दृश्य, शब्द और उनके अपने जीवन की कुछ सत्य घटनाएं. जेनेट को अब और डर नहीं लगता.स्टेज उन दोनो को एक ऐसे मायाबंधन में बाँध रखा है जहाँ उम्र या दुसरे ऐसे किसी चीजों का कोई महत्व ही नहीं.
सपना प्यार खोजता है और प्यार सपने की तलाश में भटकता है. जो प्रेम, पसंदीदा काम के बीच पंख फैलाता है वो प्रेम सम्बन्ध स्मृति में रह जाता है हमेशा के लिए. यहाँ उम्र, रूप, समाज, देश कुछ भी फर्क नहीं ला सकता.
कुछ गलत कहा मैंने??

Thursday, 11 August 2016

डाइवर की डायरी से....


आज फिर गंगा में इस छोर से उस छोर तक गोता लगा कर खोज ही निकाला उस लाश को. काफी गल चुकी थी, निकालने में परेशानी भी हो रही थी लेकिन पार्टी ने कहा था अच्छे पैसे देगा. लाश बाहर आते ही घरवाले इस तरह पछाड़ खा कर रो रहे थे कि पैसा मांगने की हिम्मत ही नहीं हुई. आज फिर खाली हाथ ही घर लौटना पड़ा.

गोताखोर की भी कोई कहानी होती है क्या? नहीं, कोई कहानी नहीं होती, लेकिन कितने ही हत्या, आत्महत्या और साजिश की परिणति के हम साक्षी होते हैं. कितने ही केस पुलिस फाइल में दबे रह जाते अगर लाश नहीं मिली तो और कितने ही इंश्योरेंस क्लेम ना हो पाएं अगर हम डेड बॉडी पानी से निकाल कर नही ला पाए तो...

पेशा है अखबार बेचना, लेकिन पार्ट टाइम डिसास्टर मैनेजमेंट ग्रुप में स्वंयसेवी, नाम भोलानाथ. आज फिर से गंगा में डुबकी लगाना है. सच कहता हूँ गोताखोर का काम भी कम जोखिम भरा नहीं, कई बार मृत्यु से दो-चार हाथ कर के ही हम वापस ज़मीन देख पाते है. लेकिन कुछ लोगों को तो जोखिम लेना ही पड़ेगा न; ताकि बहुत से लोग चैन से जी सकें.

गंगा के पानी में जितना आप गहरे उतरते जायेंगे- उतना ही ज्यादा दबाव महसूस करेंगे, कभी-कभी तो नाक से खून भी निकल आता है. एक बार फेसबुक प्रेम में असफल हुई महिला ने ख़ुदकुशी करने के लिए गंगा को ही चुना. उसकी लाश खोजते-खोजते मैं खुद ही लाश हो जा रहा था.
नदी के पानी में जब सूरज की रौशनी पड़ती है तब उसका रंग मटमैला दिखता है, उस समय लाश खोजने में कम दिक्कत होती है; लेकिन गहरे पानी में एकदम अँधेरा होता है, हाथ मार-मार कर अंदाज़ा लगाना पड़ता है कि ये लाश हो सकती है. नदी का पानी रंगभेद भी नहीं करता, हर लाश जो कुछ घंटे पानी में डूबी रही हो सफ़ेद ही दिखाई देती है चाहे व्यक्ति कितना भी काला ही क्यों न रहा हो. स्त्री और पुरुष की लाश पहचानना भी आसान होता है. अगर लाश पुरुष की है तो वो चित्त पड़ा मिलेगा और महिला की लाश हो तो पीठ के बल पड़ी होगी. लेकिन फिर भी इतने समय तक लाश पानी में पड़ी रहने के बाद उसे बाहर ले कर आना कठिन हो जाता है कई बार तो लाश बाहर निकालने के बाद चार दिन तक ठीक से खाना भी नहीं खा पाता. पानी के अंदर लाश इतनी गल जाती है कि खींच कर निकालने की कोशिश में लाश की चमड़ी सहित आंतें हाथ में आ जाती हैं. या फिर देखा जाता है कि लाश के कुछ हिस्से पानी के जीवों ने खा लिए हैं, रस्सी से बाँध कर लाश उठाने के प्रयास में चमड़ी और मांस गल कर गिरते रहते है.

वैसे आप ये मत सोचिये कि हमें हमेशा ही लाश खोजने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, ऐसा नहीं. शीत ऋतु इस काम में बहुत सहायक है, इस मौसम में लाश बहुत जल्दी ही उभर कर सतह  के करीब आ जाती है उस समय एक बांस से ठेल कर या रस्सी बाँध कर तुरंत खींच कर ऊपर ले आता हूँ. ग्रीष्म काल बहुत मुश्किलें खड़ी करती है, सतह पर लाश जल्दी नहीं आती और पानी में इतने गहरे डूबी रहती है कि कई बार उसे निकालने में सर्प दंश का शिकार या मछली के काटे जाने का भी डर रहता है. लाश खोजते हुए हाथ कभी-कभी पत्थरों के नीचे भी आ जाता है.


आमतौर पर हम सांप के काटे जाने पर ज्यादा भयभीत होतें है लेकिन गंगा के पानी में इतने जहरीले साँप नही जितनी की काट खाने वाली मछलियां. कुछ ,मछलियाँ तो निशाना साध कर काँटों से वार करती हैं- उनका बस चले तो नाक नोच कर ले जाएं.

आप सोचते होंगे, लाश देर-सवेर मिल ही जाती होंगी. लेकिन ये हमेशा नहीं होता नदी के नीचे इतने बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते है कि एक बार लाश उसमें धंस गयी तो शायद कभी हाथ न आएगी.
एक बार एक परिवार अपने दो छोटे बच्चों के साथ घुमने आया था. दोनों बच्चे घाट पर ही पानी से खेल रहे थे. अचानक बड़े बच्चे का पांव फिसला और वो पानी में बह गया मैंने बहुत ढूंढा लेकिन वो नहीं मिला, उसकी माँ पछाड़ खा कर रो रही थी लेकिन मैं उसके बेटे को जिंदा तो क्या उसे यकीन दिलाने के लिए कि उसका बच्चा अब नहीं रहा, उसकी लाश तक नहीं दे सका.

ओह! एक बात का ज़िक्र करना तो भूल ही गया था, डाइवर्स का काम दो तरह का होता है.... एक लाइव और दूसरा रिकॉर्डिंग. चौंक गए!!  ( तो सुनिए.
मान लीजिये आप घाट पर या बीच पर हैं, अचानक आपके सामने ही कोई कूद पड़ा तो आपके पास और कोई चारा नहीं उसे बचाने के लिए तुरंत कूदना ही पड़ेगा ताकि समय पर बचाया जा सके, ये हुआ लाइव वर्क और रिकॉर्डिंग मतलब पुलिस जब खबर दे, कहीं पर कोई दुर्घटना घटी है तब वहाँ सारे इंतजाम के साथ जा कर नदी में डुबकी लगानी पड़ती है और ये सर्च कितनी देर में खत्म होगी कहा भी नहीं जा सकता. तो हुआ न ये रिकॉर्डिंग!
 एक बात और बताता हूँ- इतने साल से ये काम करते- करते अब तो किनारे बैठे हुए देख कर बता सकता हूँ कि कोई अपने-आप गिर गया या डाइव लगाया. वक्त रहते नजर पड़ जाए तो तुरंत समझ आ जाता है सामने वाला यूँ ही खड़ा है या ईरादा आत्महत्या का है.

बड़ी नदियों की धार बहुत तेज़ होती है और कहीं-कहीं करंट भी होता है, इसलिए तैरना जानते भी हों तो भी सावधानी रखनी चाहिए.

Tuesday, 2 August 2016

कहानी : इच्छापुरण , लेखक : रबिन्द्रनाथ टैगोर



 चित्र साभार गूगल 

सुबलचन्द्र के बेटे का नाम सुशीलचन्द्र है. लेकिन हमेशा नाम के अनुरूप व्यक्ति भी हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं. तभी तो सुबलचन्द्र दुर्बल थे और उनका बेटा सुशीलचन्द्र बिलकुल भी शांत नही बल्कि बहुत चंचल था.

उनका बेटा सुशील पुरे मोहल्ले को परेशान कर रखता था इसलिए कभी-कभी पिता, पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिए भाग कर आते लेकिन पिता के पैर में गठिया का दर्द और बेटा भागता था हिरन जैसा. नतीजा थप्पड़, लात, मार कुटाई कुछ भी सही जगह पर नहीं पड़ता था. लेकिन सुशीलचन्द्र जिस दिन पकड़ में आता उस दिन उसके पिता के हाथों से बचा पाना किसी के सामर्थ्य में नहीं रहता.

आज शनिवार के दिन स्कूल में दो बजे ही छुट्टी हो जाती है लेकिन आज सुशील का किसी भी तरह स्कूल जाने का मन नही हो रहा था. इसके बहुत सारे कारण थे. पहले तो आज स्कूल में भूगोल की परीक्षा है दूसरे, मोहल्ले के बोस निवास में आज पटाखे फोड़ने का कार्यक्रम तय है. सुबह से ही वहाँ धूमधाम चल रही है. सुशील की इच्छा है आज सारा दिन वहीँ बिताये.

बहुत सोचने के बाद सुशील स्कूल जाने के समय अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. उसके पिता ने आकर पूछा- ‘क्या रे, इस समय बिस्तर पर पड़ा है, आज स्कूल नही जाना क्या?’
सुशील बोला, ‘मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे है, आज मैं स्कूल नहीं जा पाऊंगा.’
पिता सुबल उसके झूठ को समझ गये, मन-ही-मन बोले, ‘रुक! आज तेरा कुछ उपाय करना ही होगा.’ सुशील से बोले, ‘पेट में मरोड़ उठ रहे है?’ फिर तो आज कहीं जाने की ज़रूरत नहीं. बोस निवास में पटाखे देखने हरि को अकेले ही भेज देता हूँ, तुम यहाँ चुपचाप पड़े रहो मैं अभी तुम्हारे लिए पाचक तैयार कर के लाता हूँ.’

सुशील के कमरे से निकल कर बाहर सांकल लगा दिया और बहुत कड़वा सा एक पाचक तैयार करने चले गये. सुशील तो अब भारी मुश्किल में पड़ गया. लेमनचूस खाना उसे जितना ही अच्छा लगता था उतना ही बुरा पाचक खाने में लगता था उसे तो अब मुसीबत नजर आने लगी थी. उधर बोस निवास जाने के लिए तो कल रात से ही उसका मन छटपटा रहा था, लेकिन....

सुबलचन्द्र जब एक बड़े से कटोरे में कड़वा पाचक ले कर कमरे में आये तो सुशील तुरंत बिस्तर से उतर गया और बोला, ‘मेरा पेट दर्द एकदम ठीक हो गया है. मैं आज स्कूल जाऊंगा.’

पिता बोलें, ‘न ना! आज जाने की ज़रूरत नहीं.तुम पाचक खा कर चुपचाप सोये रहो.’ ये बोल कर सुबलचन्द्र जबरदस्ती सुशील को पाचक खिला कर बाहर से कमरे में ताला लगा कर चले गये.

सुशील बिस्तर पर पड़े रोते-रोते सारा दिन केवल मन-ही-मन यही कहता रहा, ‘काश, मैं अगर बाबा के जितनी उम्र का होता तो कितना अच्छा होता जो मेरे इच्छा होती वही करता और कोई मुझे ऐसे कमरे में बंद कर के नहीं जा पाता.’

उसके पिता सुबल चन्द्र बाहर अकेले बठे बैठे सोच रहे थे, ‘मेरे माता पिता मुझे बहुत ज्यादा ही प्यार दुलार देते थे इसलिए मैं अच्छी तरह पढाई लिखाई कुछ भी नहीं कर पाया. काश, यदि फिर से बचपन मिल जाता तो फिर कुछ भी हो जाए पहले की तरह समय बर्बाद नही कर के , मन लगा कर पढाई करता.’

इच्छापूरण देव उस समय उनके घर के सामने से जा रहे थे. वो पिता और पुत्र के मन की इच्छा जान कर सोचने लगे. ‘अच्छा कुछ दिन इन लोगों की इच्छा पूरी कर के देखा जाये.’

ये सोच कर वो पिता से बोले, ‘तुम्हारी इच्छा पूरी होगी. कल होते ही तुम तुम्हारे बेटे की उम्र प्राप्त करोगे.’ बेटे से जा कर बोले, ‘कल होते ही तुम तुम्हरे पिता के उम्र के हो जाओगे.’ सुन कर दोनों ही बहुत खुश हो गए.

वृद्ध सुबलचन्द्र रात में ठीक से सो नहीं पाते थे भोर के वक्त थोड़ी नींद आ जाती थी. लेकिन आज पता नहीं क्या हुआ उन्हें भोर होते ही एकदम कूद कर बिस्तर से नीचे उतर आये . उन्होंने देखा कि वो बहुत छोटे हो गये है. उनके दांत जो गिर गये थे सब अपनी जगह पर आ गये हैं, दाढ़ी मूंछ सब गायब. रात में जो धोती और कुरता पहन कर सोये थे वो इतना बड़ा हो गया है की उसकी आस्तीन झूल कर ज़मीन छू रही थी. कुरते का गला छाती तक उठ आया है और धोती इतनी बड़ी की ज़मीन पर ठीक से पाँव रख कर चल भी नहीं पा रहे.
हमारे सुशील बाबू रोज उठते ही दुरात्मा की तरह दौड़ते फिरते है, लेकिन आज उनकी नींद ही नहीं टूट रही; जब अपने पिता सुबल चन्द्र के चिल्लाने की आवाज़ से उसकी नींद खुली तो देखा उसके पहने हुए कपड़े इस तरह छोटे हो कर चिपक गये हैं की उसके चीथड़े हो कर शरीर से अलग हो जायेंगे. पूरा शरीर बढ़ गया है, काले सफ़ेद दाढ़ी-मूंछ के कारण आधा चेहरा दिखाई ही नहीं देता; उसके सर पर कितने बाल थे लेकिन आज हाथ फेर कर देख रहा सामने से गंजा हो गया जो की दिन के उजाले में चमक रहा है. आज सुशील चन्द्र कई बार उठने के प्रयास में इस तरफ उस तरफ करते हुए बार बार सो जा रहा है लेकिन अंत में अपने पिता के इतनी चीख पुकार के मारे उसे उठना ही पड़ा.

दोनों के ही मन की इच्छा पूरी हुई लेकिन बहुत मुश्किलें भी खड़ी हो गयी. पहले ही बताया था कि सुशील चन्द्र की इच्छाएँ थी यदि अपने पिता की उम्र का हो जायेगा तो स्वाधीन होगा, पेड़ पर चढ़ कर तालाब में कूदेगा, कच्चे आम खायेगा, चिड़ियों के बच्चे पकड़ेगा, पूरी दुनियां घुमेगा- फिरेगा और जब इच्छा होगी घर में आ कर जो इच्छा हो वही खायेगा कोई उसे कुछ नहीं कहेगा. लेकिन आश्चर्य! उस दिन सवेरे से उसे पेड़ पर चढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई, पानी देख कर कूदने की इच्छा तो दूर उसे लग रहा था की अगर कूदा तो उसे बुखार आ जायेगा. वो चुपचाप बरामदे में एक चटाई बिछा कर बैठ सोचने लगा.

एकबार मन में आया खेल-कूद एकदम से छोड़ देना ठीक नहीं होता, एक बार कोशिश कर के ही देखा जाये. ये सोच कर पास ही एक आमड़ा पेड़ था उसी पर चढ़ने की कोशिश करने लगा. कल तक जिस पेड़ पर वो गिलहरी की तरह झटपट चढ़ जा रहा था आज इस बूढ़े शरीर के साथ किसी भी तरह संभव नहीं हो रहा था. पेड़ की एक नाजुक डाल पर शरीर का भार देते ही वो डाल भारी शरीर का भार वहन ना कर पायी और टूट कर ज़मीन पर गिर गयी, साथ में बूढा सुशील चन्द्र भी धड़ाम से गिर पड़ा. पास के सड़क पर लोग जा रहे थे उन्होंने जब एक बूढ़े को बच्चे की तरह पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते देखा तो हँसते हँसते बेहाल हो गये. सुशील शर्म से सर नीचा किये हुए फिर से उसी चटाई पर आ कर बैठ गया. नौकर से बोला, ‘सुनो, बाज़ार से एक रूपये  का लेमनचूस खरीद लाओ.’

लेमनचूस का सुशील चन्द्र को विशेष लोभ था. स्कूल के पास के दूकान में वो रंग बिरंगे लेमनचूस सजाया हुआ देखता; दो-चार पैसे जो भी मिलते उसी से लेमनचूस खाता था. सोचता था जब पिता के जितना बड़ा हो जायेगा तब पॉकेट भर भर कर लेमनचूस खरीदेगा और जी भर कर खायेगा. आज नौकर एक रुपये में ढेर सारा लेमनचूस खरीद कर ला दिया उसी में से एक उठा कर उसने अपने दन्त विहीन मुंह में डाल कर चूसने लगा लेकिन बूढ़े मुंह में बच्चों की पसंद का लोजेंस स्वाद मुताबिक नहीं बल्कि बेस्वाद लग रहा था. एक बार सोचा ; ये सब छोटे हो गये बाबा को खिलाया जाये, लेकिन दुसरे ही पल सोचा, ‘ ना! देना ठीक नहीं होगा, ये सब खा कर तबियत ख़राब हो जाएगी.

कल तक जो लड़के छोटे सुशील चन्द्र के साथ कबड्डी खेलने आते थे आज वो बूढ़े सुशील चन्द्र को देख छिटक कर दूर चले गये.

सुशील सोचा करता था पिता की तरह आज़ाद होने पर वो सारा दिन अपने लड़के-दोस्तों के साथ डू-डू आवाज़ करते हुए कबड्डी खेलता रहेगा. लेकिन आज राखाल, गोपाल, निवारण,अक्षय, हरीश को देख कर मन-ही
-मन खीज उठा, सोचा, अभी चुपचाप यहाँ बैठा हूँ  अभी लड़के आयेंगे और अचानक ही हुडदंग मचाने लगेंगे.

पहले ही बताया है, सुबलचन्द्र अपने बरामदे में बैठ कर रोज़ सोचा करते थे मैं जब छोटा था शैतानी कर-कर के केवल समय ही बर्बाद किया है, अगर बचपन दुबारा मिल जाये तो एक बार शांत और अच्छे बच्चे की तरह सारा दिन कमरे का दरवाज़ा बंद कर के सिर्फ पढाई-लिखाई करूँगा.यहाँ तक कि शाम को दादीमाँ के पास कहानी सुनने भी नहीं जाऊंगा, रात दस-ग्यारह बजे तक प्रदीप जला कर पढाई पूरी करूँगा.

लेकिन बचपन वापस पा कर वो किसी भी तरह स्कूल जाने को तैयार नही. सुशील तंग हो कर बोलता, ‘बाबा स्कूल नहीं जायेंगे क्या?’ सुबलचन्द्र मुंह नीचे कर सर खुजाते हुए धीरे-धीरे कहते, आज मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे हैं, आज स्कूल नही जा सकूँगा. सुशील चन्द्र नाराज़ हो कर बोला, जायेंगे कैसे नहीं? स्कूल जाते समय मेरा भी इस तरह खूब पेट दर्द हुआ है, मैं ये सब खूब जानता हूँ.’

छोटा सुशील नित नये उपाय निकाल कर स्कूल से अनुपस्थित रहता था कि इस वक्त सुबल चन्द्र का उसे झांसा देने का कोई भी उपाय व्यर्थ था.सुशील ज़बरदस्ती छोटे पिता को स्कूल भेजने लगा. स्कूल से लौट कर छोटा पिता खेलने-कूदने और उधम मचाने लग जाता लेकिन, उसी समय वृद्ध सुशील चन्द्र एक रामायण की किताब ले कर सस्वर पाठ करना आरम्भ कर देते. सुबल चन्द्र के उधम मचाने के कारण वृद्ध पुत्र के पढने में व्यवधान उत्पन्न होता था इसलिए छोटे पिता को नियंत्रण में रखने के लिए उसे एक स्लेट पकड़ा देता जिसमें बहुत कठिन-कठिन गणित के सवाल होते. इतने कठिन सवालों में से एक ही हल करने में छोटे पिता का एक घंटा निकल जाता. शाम को बूढ़े सुशीलचन्द्र के कमरे में और कई बूढ़े मिल कर शतरंज खेला करते. उस समय सुबलचन्द्र को ठंडा रखने के लिए सुशीलचन्द्र ने एक मास्टर रख दिया, मास्टर रात दस बजे तक उसे पढ़ाता रहता.

भोजन के विषय में सुशील बड़ा कडक था ,क्योंकि उसके पिता सुबलचन्द्र जब वृद्ध थे उन्हें अपना खाना ठीक से हजम नहीं होता था, थोडा सा भी ज्यादा खा ले तो खट्टे डकार आने लगते थे —ये बात सुशील चन्द्र को अच्छी तरह याद थी इसीलिए वो अपने पिता को कैसे भी अधिक खाने नहीं देता था. इधर सुबलचन्द्र के छोटे हो जाने के बाद से पेट में जैसे आग लगी रहती हमेशा ही भूख लगती जैसे पत्थर भी खाये तो हजम हो जाये ऐसी स्थिति हो गयी थी. सुशील उन्हें इतना कम खाने देता कि भूख के मारे वो छ्टपट करते. अंत में सूख कर उनके शरीर की हड्डियाँ बाहर दिखने लगी. सुशील सोचा, ज़रूर कोई गंभीर बीमारी हुई है इसलिए वो तरह-तरह की दवाइयां खिलाने लगा.

बूढ़े सुशील को भी रोज़ मुश्किलें आने लगीं. वो अपने पहले की आदत अनुसार जो भी करने जाता उसे सह्य नहीं हो रहा था. पहले मोहल्ले में कहीं भी नाटक-नौटंकी की खबर सुनता तो घर से भाग कर ठीक पहुँच जाता था, चाहे जाड़ा-बरसात कुछ भी हो. आज का सुशील ऐसा करते हुए सर्दी लग कर खांसी शरीर दर्द के साथ तीन सप्ताह के लिए बिस्तर पकड लिया. हमेशा से ही वो तालाब में नहाता है लेकिन आज भी वही करने से हाथ-पाँव में गठिया का दर्द और सुजन उभर आया, जिसकी चिकत्सा करने में छह महीने लग गये. उसके बाद से ही वो गर्म पानी से ही नहाता है और पिता सुबलचन्द्र को भी तालाब में नहाने जाने नहीं देता. पुरानी आदत मुताबिक भूल कर जब भी पलंग से कूद कर उतरने जाता तो हाथ पैर की हड्डियाँ टनटना जाती है. मुंह में एक पूरा पान ठूंस का उसे ध्यान आता है कि उसे दांत नहीं हैं, चबाने में बहुत ही कष्ट है. बाल सवांरने के लिए कंघी सर पर चलाते ही याद आता है कि सर पर तो बाल ही नहीं. जब कभी ये भूल जाता है कि वो अपने पिता की उम्र का हो गया है और पहले की तरह शैतानी करते हुए बूढी आनंदी बुआ की मटकी पर पत्थर मारने लगता तो लोग बूढ़े को बच्चों की तरह शरारत करते देख मारो-मारो, चिल्ला कर मारने दौड़ते. तब वो खुद ही संकोच में पड़ कर चुपचाप घर में घुस जाता.

सुबल चन्द्र भी कभी-कभी भूल जाता कि वो अब बूढ़ा से छोकरा हो गया है और जा कर वहां बैठ जाता जहाँ और बूढ़े लोग ताश-पासा खेल रहे होते और बूढों की तरह ही बातें करता तो वहाँ लोग उसे भगाने लगते कहते, ‘ जाओ-जाओ जा कर खेलो यहाँ बैठ कर बड़ों के बीच बड़ा बनने को चेष्टा मत करो.’ अचानक भूल कर मास्टर से भी बोल पड़ता, ‘ज़रा तम्बाकू दो तो, तलब लगी है’ सुन कर मास्टर जी उसे एक पाँव पर बेंच पर खड़ा कर देते. इसी तरह एक दिन नाई को बोला, ‘कितने दिन हो गये तू मेरी दाढ़ी बनाने नहीं आया?’नाई भी उसकी ओर देख कर जवाब दिया, ‘आऊंगा और 10 साल बीतने दो फिर आऊंगा.’ फिर कभी-कभी आदत मुताबिक जा कर अपने बेटे सुशील को पिटता तो सुशील उनसे कहता, ‘पढाई लिखाई कर के यही शिक्षा मिली है, एक रत्ती लड़का और बड़ों पर हाथ उठाना?’ वैसे आस-पास लोग जमा हो जाते और कोई थप्पड़ तो कोई डांट तो कोई समझाने लगता.

तब सुबल एकनिष्ठ हो कर प्रार्थना करने लगता, आहा! अगर मैं अपने बेटे सुशील की तरह बुढा हो जाऊं और आजाद रहूँ तो कितना ही अच्छा हो!’
इधर सुशील भी मन ही मन हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता, ‘ हे देवता, मुझे मेरे पिता की तरह छोटा कर दो कितना अच्छा होगा मैं पहले की तरह ही खेल-कूद, घूमना-फिरना कर सकूँगा!’
पिता जी जिस तरह शैतानी करने लगे हैं उन्हें अब और मैं संभाल नही सकता. पहले ही तो अच्छा था.

तब इच्छापूरण देव आ कर बोले, ‘कैसा लग रहा है, तुम दोनों की इच्छा पूरी हुई न! शौक मिटा या नहीं?’
दोनों ही साष्टांग हो कर देवता से बोले, ‘दुहाई हो! हम जैसे थे हमें फिर से वैसा ही बना दीजिये. सब शौक मिट गये.

देवता बोले, ‘ठीक है कल सुबह नींद से जागने पर तुम दोनों पूर्ववत हो जाओगे.’

दुसरे दिन सुबल चन्द्र फिर से बूढ़े और सुशील फिर से बच्चा बन गया. दोनों को लगा जैसे कोई सपना देख कर अभी नींद से जागे हों.
सुबल चन्द्र आवाज़ भारी कर के आवाज़ लगाये, ‘सुशील, व्याकरण याद नहीं करना है.’
सुशील सर खुजाते हुए मुंह नीचा कर के बोला, ‘पिताजी, मेरी व्याकरण की किताब खो गयी है.’