Thursday, 7 July 2016

सरवाईवर



दिसम्बर की कड़कड़ाती ठण्ड में आठ बजते ही होस्पिटल पहुँच जाना होता था. रोज़ की तरह अपने कमरे में बैग रख कर धूप सेंकने बाहर आ कर खड़ी हो गयी थी, राजू वहीँ मुझे चाय पकड़ा गया. चाय पीते हुए मैं चुपचाप आते जाते लोगों को देख रही थी. रोज़ का यही रूटीन था सुबह सुबह डॉक्टर से मिलने लोग आना शुरू कर देते. डिस्चार्ज ले कर जानेवाले भी सुबह सुबह ही निकल जाना चाहते थे. नया कैंसर हॉस्पिटल था इसलिए भीड़ ज्यादा नहीं होती थी बस कुछ उम्मीद से भरे और कुछ उम्मीद छोड़ वक्त और हालात से लड़ते चेहरे ही दिखाई देते. मैं इन्ही चेहरों के बीच ज़िन्दगी के फलसफे तलाशती रहती

तभी लगा मेरे पास आ कर कोई खड़ा हुआ. नजरें घुमा कर देखा तो एक लम्बा सा घने बालों वाला हैण्डसम लड़का खड़ा था. उम्र लगभग २०-२२ के बीच होगी. उसने मुस्कुरा कर कहा ... गुड मॉर्निंग मैडम. मैंने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया. आदतन स­वाल करना मैं ही शुरू करती हूँ लेकिन मेरे मुंह खोलने से पहले उसने सवालों की झड़ी लगा दी. एक के बाद एक सवाल.

कैंसर मरीज़ को क्या खाना चाहिए. कैसी कसरत करनी चाहिय. पूरी तरह ठीक होने में कितना टाइम लगता है. अगर ऐसा करे तो कैसा रहेगा वैसा करे तो कैसे परिणाम होंगे.... कितने सवाल लेकिन हर सवाल सकारात्मक थे एक भी सवाल ऐसा नहीं की लगे वो मरीज़ की हालत या कैंसर की वजह से निराश है. मैं उसके सवालों के जवाब देती रही.

मुझे अब अपने काम पर लगना था उससे बातें करते हुए ही कमरे की तरफ लौटने लगी तब उसने एक और सवाल किया... कैंसर क्यों होता है?

सवाल बहुत पीड़ादायक है क्योंकि इसका जवाब अभी तक मेडिकल साइंस के पास नहीं. कैंसर हॉस्पिटल में खड़े हो कर इस सवाल का जवाब बहुत सोच समझ कर देना पड़ता है, लेकिन अभी मैंने जवाब देना शुरू किया भी नही था कि उसने आगे अपने सवाल ही को विस्तार देना शुरू कर दिया. इतनी बातों के दौरान मैं उसके लिए मैडम से दीदी हो गयी थी.

शादाब बातें आगे बढ़ाते हुए कहा.. दीदी, मैंने तो कितने आर्टिकल्स और प्रचार में पढ़ा है की नशा करने से कैंसर होता है, मैं तो सिगरेट शराब या किसी भी तरह का नशा नहीं करता फिर मुझे क्यों हुआ?

अब जैसे मेरे पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे सच बताऊँ तो उसकी बातें सुन कर मैं अंदर तक काँप गयी थी. मेरी जुबान सुख गयी. इतनी ठंड में भी पसीना सा महसूस होने लगा.

इतनी देर की बातचित में उसने एक बार भी ये नहीं बताया था कि मरीज़ कौन है उसके सारे सवाल मरीज़ के घरवालों जैसे थे, मैंने भी उसे घरवालों की काउन्सेलिंग के दौरान कही जाने वाली बातें बताती गयी थी. उसे देख कर भी कोई नहीं कह सकता था वो कैंसर का मरीज़ है.

मेरे मुंह से बस इतना ही निकला ... ओह तुम पेशेंट हो! उसने सहजता से जवाब दिया -

हाँ....

मैं उसे वार्ड में भेज कर अपने काम में लग गयी. उस दिन ही उसका पहला किमो था. उड़ीसा से आया था इसलिए किमो के बाद ३ दिनों के लिए हॉस्पिटल में ही रुक गया था. उसके साथ सिर्फ उसके पापा थे.

15 दिनों बाद शादाब फिर आया अपने दुसरे किमो के लिए. इस बार चेहरा थोड़ा मुरझाया हुआ था कुछ थका सा मैं उससे मिलने उसके कमरे में गयी तो मुझे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गयी. बातों का सिलसिला फिर शुर हुआ... उसने कहा दीदी, आपने जैसी जीवन शैली अपनाने को कहा था आजकल मैं वैसे ही कर रहा हूँ. समय से दवा, खाना, रेस्ट सब कुछ. मैंने कहा.. वाह! तब तो जल्दी ही तुम ‘विजेता’ के लिस्ट में अपना नाम लिखाओगे. हर कैंसर पेशेंट को हम तुम्हारा ही उदहारण देंगे शादाब!

उसने कहा ... हाँ दीदी, इस बार मैं जीतना चाहता हूँ. पता है दीदी. पिछले महीने दो लेटर्स एक साथ एक ही दिन मेरे हाथ आये थे. एक में NDA में सिलेक्शन की खबर थी और दुसरे में कैंसर कन्फर्मेशन रिपोर्ट. इसी हफ्ते कॉलेज में फंक्शन भी था जिसमे मैं भी गाना गाने वाला था पर मुझे कुछ भी करने का मौका नही मिला ..... कैंसर ने मुझे चुन लिया था. मैं उसकी भीगती आँखों का सामना नही कर पायी. फिर आऊँगी कह कर उठ गई.

उसने और उसके परिवार ने बहुत संघर्ष कर पैसे जमा कर कर के किमो और दुसरे प्रोसेस पुरे किया. हर बार लड़का हँसते हुए आता ज़िन्दगी से भरी बातें करता. मैं मन ही मन उसके लिए दुआ करती और उससे कहती ... फिर मिलेंगे शादाब!

जिस दिन उसका आखरी किमो हुआ उसने बताया अब आगे का ट्रीटमेंट उड़ीसा के ही किसी दुसरे हॉस्पिटल में करवाने का तय किया है, अब शायद इस हॉस्पिटल आना नही होगा.

उसने कहा... दीदी आपके पास तो मेरा फोन नंबर है आप कभी कभी मुझे फोन कर लिया कीजियेगा. मैंने मुस्कुरा कर कहा .... हाँ ज़रूर!

हाँ तो कह दिया लेकिन कभी उसकी खबर नहीं ले पायी..... हिम्मत ही नहीं होती थी, ये ख्याल हमेशा रोक देता कि फोन करूँ और पता नहीं क्या सुनने को मिले. हॉस्पिटल का फोन नंबर तो उसके पास भी था उसने भी कभी फोन नहीं किया. पता नही आज वो है या ....



मेरे लिए शादाब हमेशा एक कैंसर सरवाईवर का चेहरा ही लिए रहेगा. उसकी सकारातमक बातें और जीवन के प्रति उत्साह प्रेरणा देती रहेगी. कैंसर से लड़ना है विजेता बनना है.



‘Cancer Survivor Day’ का दिन शादाब तुम्हारे नाम.....



11 comments:

  1. पर यह भी है कि किसी चिकित्सक की आशंका इस बीमारी की भयावहता दर्शाती है....

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    1. आशंका ही भयावहता ले कर आती है। जितना बीमारी से नहीं मरते उससे पहले हम भय से ही मर जाते हैं। :-(

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    1. मैंने पढ़ी बेहद पसंद आयी।

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  3. मेरा लिखा "ब्लू टिक" एक बार पढ़ सकती हैं।

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  4. मेरा लिखा "ब्लू टिक" एक बार पढ़ सकती हैं।

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